नेमरा गांव की मिट्टी से उड़ती धूल, दूर-दूर तक फैले जंगल और एक छोटे से घर के बाहर जुटी लोगों की भीड़…
इसी माहौल में एक बच्चा अपने पिता का हाथ थामे अक्सर एक सवाल पूछा करता था, “बाबा, लोग आपको दिशोम गुरु क्यों कहते हैं?
पिता मुस्कुराते और सहज भाव से समझाते कि उन्होंने लोगों के दर्द को अपना दर्द समझा है और उनकी लड़ाई को अपनी लड़ाई बनाया है.
उस वक्त शायद उस बच्चे के लिए दिशोम गुरु सिर्फ एक सम्मानजनक नाम था. लेकिन समय बदला, बच्चा बड़ा हुआ और उसने महसूस किया कि उसके पिता शिबू सोरेन की जिंदगी महज राजनीति का हिस्सा नहीं थी—वह जल, जंगल और जमीन की हिफ़ाज़त के लिए छेड़े गए एक महाआंदोलन की गाथा थी.
वह बच्चा था हेमंत सोरेन
दिन 10 अगस्त 1975 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे हेमंत सोरेन का बचपन आम बच्चों जैसा ही था. साल 2022 में यूनिसेफ के एक कार्यक्रम में बच्चों से बात करते हुए उन्होंने खुद मुस्कुराते हुए कहा था कि बचपन में मैंने कभी मुख्यमंत्री बनने का सपना नहीं देखा था. मेरी अपनी छोटी सी दुनिया थी किताबें, बैडमिंटन और साइकिल का सफर.

हेमंत सोरेन ने अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा इंटरमीडिएट तक पटना हाई स्कूल, पटना (बिहार) से पूरी की, उसके बाद उन्होंने रांची स्थित बीआईटी मेसरा से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए एडमिशन लिया था.
लेकिन ज़िंदगी हमेशा तय रास्तों पर नहीं चलती.
साल 2009 में हेमंत के बड़े भाई दुर्गा सोरेन का असमय निधन हो गया. दुर्गा सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के एक ऊर्जावान और जन-प्रिय नेता थे. भाई के जाने से परिवार ही नहीं, पूरी पार्टी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. परिस्थितियों ने मोड़ लिया और हेमंत को अनचाहे ही सही, सक्रिय राजनीति के मैदान में उतरना पड़ा.
साल 2009 में राज्यसभा से शुरू हुआ उनका सफर जल्द ही विधानसभा तक पहुँचा. और फिर आया साल 2013 महज़ 38 साल की उम्र में हेमंत सोरेन पहली बार झारखंड के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने.

रोशनी के पीछे की छांव: मुख्यमंत्री और एक पिता
राजनीति की चकाचौंध के पीछे एक आम पारिवारिक इंसान भी छुपा होता है. साल 2006 में हेमंत की शादी कल्पना सोरेन से हुई. दो बेटों के पिता हेमंत के लिए सत्ता के भारी दबाव के बीच परिवार के लिए वक्त निकालना हमेशा एक चुनौती रहा.
एक आत्मीय बातचीत में उन्होंने अपनी इस कसक को साझा करते हुए कहा था: कई बार स्थिति ऐसी होती है कि जब मैं सुबह घर से निकलता हूँ, तब बच्चे स्कूल के लिए निकल चुके होते हैं… और जब देर रात लौटता हूँ, तो वे सो चुके होते हैं.
यह मुख्यमंत्री की ज़िंदगी का वह मानवीय पहलू है, जो रैलियों के भाषणों और प्रशासनिक फाइलों के बीच अक्सर गुम हो जाता है.
पथलगड़ी आंदोलन और आदिवासी अस्मिता की लड़ाई
साल 2017-18 का पथलगड़ी आंदोलन हेमंत सोरेन के राजनीतिक करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. संविधान की 5वीं अनुसूची, ग्रामसभा की स्वायत्तता और आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन के अधिकार झारखंड की राजनीति के केंद्र में आ चुके थे.
उस समय विपक्ष में रहते हुए हेमंत ने इन सवालों पर बेहद आक्रामक और स्पष्ट रुख अपनाया. यही वह दौर था जब उनकी पहचान सिर्फ ‘शिबू सोरेन के बेटे’ के रूप में नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता के एक बड़े पैरोकार के रूप में स्थापित हुई. साल 2019 में जब वे दोबारा सत्ता में आए, तो उनकी सरकार ने आंदोलनकारियों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने का ऐतिहासिक निर्णय लिया.
31 जनवरी 2024: सत्ता, सलाखें और जन-समर्थन
दिन 31 जनवरी 2024 को झारखंड ने एक अभूतपूर्व राजनीतिक मोड़ देखा. केंद्रीय एजेंसी ED की कार्रवाई के बीच हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और उन्हें जेल भेज दिया गया.
लगभग पाँच महीने सलाखों के पीछे बिताने के बाद, जून 2024 में हाई कोर्ट से ज़मानत मिलते ही उनका भव्य स्वागत हुआ. जुलाई में वे दोबारा झारखंड के मुख्यमंत्री बने.
इस दौर ने हेमंत की राजनीतिक छवि को बदल कर रख दिया. विरोधियों के आरोपों के बीच समर्थकों की नज़र में वे प्रतिरोध और संघर्ष का प्रतीक बनकर उभरे.
हेमंत के जेल जाने के बाद सोरेन परिवार और JMM के सामने एक बड़ा नेतृत्व संकट था. इसी संकट के बीच कल्पना सोरेन पहली बार सीधे जनता के बीच आईं. मंच पर उनकी सधी हुई भाषा, संवेदनशीलता और तीखे राजनीतिक हमलों ने उन्हें रातों-रात एक मुख्यधारा की कद्दावर नेता के रूप में स्थापित कर दिया. बाद में उन्होंने चुनाव जीता और विधानसभा पहुँचीं. संकट के उसी दौर में परिवार की राजनीतिक यात्रा का एक नया अध्याय लिखा जा चुका था.
पिता का जाना और बचपन की वापसी
साल 2025 में हेमंत के जीवन में सबसे भावुक क्षण आया, जब ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन का निधन हो गया. जिस पिता को हेमंत ने बचपन से आंदोलनों की अगुआई करते देखा था, जिनके साए में उन्होंने राजनीति की वर्णमाला सीखी थी—वे अब साथ नहीं थे. पिता के जाने के बाद हेमंत की स्मृतियों में फिर से नेमरा गांव कौंध गया. पिता का संघर्ष, लोगों के बीच बैठना और बचपन का वह सवाल फिर से ज़हन में तैरने लगा—
बाबा, लोग आपको दिशोम गुरु क्यों कहते हैं?
बचपन में पूछे गए उस सवाल का जवाब किसी एक वाक्य में मुमकिन नहीं था.
‘दिशोम गुरु’ होना सिर्फ एक पद या उपाधि नहीं थी; वह लोगों के आंसुओं को पोंछने और उनके अधिकारों के लिए बेखौफ खड़े होने का नाम था. वही विरासत हेमंत को अपने पिता से मिली थी.
लेकिन हेमंत की यह कहानी सिर्फ पिता के नाम की छांव की कहानी नहीं है. यह उस लड़के की कहानी है जिसने कभी सत्ता के शिखर का सपना नहीं देखा था, लेकिन जब परिस्थितियाँ आईं तो वह खड़ा हुआ, लड़ा, जेल गया और फिर लौटकर नेतृत्व किया.
नेमरा का वह बच्चा आज 51 वर्ष का हो चुका है. सालों पहले पूछा गया वह मासूम सवाल आज हेमंत सोरेन के अपने संघर्षों, फैसलों और राजनीति के गलियारों में गूंज रहा है. क्योंकि कुछ विरासतें कागजों पर नहीं लिखी जातीं… उन्हें अपनी ज़िंदगी से जीना पड़ता है.
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