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    Home»जोहार ब्रेकिंग»‘गोली मारो सालों को’ भाषण मामला: SC ने अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा को क्लीन चिट के खिलाफ समीक्षा याचिका खारिज की
    जोहार ब्रेकिंग

    ‘गोली मारो सालों को’ भाषण मामला: SC ने अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा को क्लीन चिट के खिलाफ समीक्षा याचिका खारिज की

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyAugust 3, 2026No Comments5 Mins Read1
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    Anurag Thakur, Parvesh Verma
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    ‘गोली मारो सालों को’ जैसे कथित भड़काऊ भाषणों को लेकर भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के खिलाफ कार्रवाई की मांग से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने समीक्षा याचिका खारिज कर दी है. सीपीआई (एम) नेता बृंदा करात ने सुप्रीम कोर्ट के 29 अप्रैल के उस फैसले को चुनौती देते हुए समीक्षा याचिका दाखिल की थी, जिसमें अदालत ने कहा था कि 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए भाषणों के आधार पर दोनों नेताओं के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता. सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के फैसले पर दोबारा विचार करने का कोई आधार नहीं पाया. न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने चैंबर में समीक्षा याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे खारिज कर दिया.

    न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने पहले समीक्षा याचिका की खुली अदालत में सुनवाई की मांग करने वाली करात की अर्जी खारिज कर दी थी. 29 जुलाई को उसने समीक्षा याचिका भी खारिज कर दी.

    पीठ ने कहा,

    “हमने समीक्षा याचिका के साथ-साथ उसके समर्थन में आधारों का भी अध्ययन किया है. हमें लागू आदेश में कोई त्रुटि नहीं मिली, बहुत कम स्पष्ट, जिस पर पुनर्विचार की आवश्यकता हो”

    इससे पहले पीठ ने बृंदा करात की उस मांग को भी खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने समीक्षा याचिका की खुली अदालत में सुनवाई की मांग की थी. इसके बाद 29 जुलाई को अदालत ने समीक्षा याचिका भी खारिज कर दी.

    2020 के दिल्ली चुनाव प्रचार से जुड़ा है मामला

    यह पूरा मामला जनवरी 2020 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान दिए गए भाषणों से जुड़ा है. उस समय दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन चल रहा था और इसे लेकर देश की राजनीति में भी काफी तनाव था. सीपीआई (एम) नेता बृंदा करात ने भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के खिलाफ कथित भड़काऊ भाषण देने के आरोप में आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की थी.

    करात के मुताबिक, 27 जनवरी 2020 को तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने दिल्ली के रिठाला में एक चुनावी रैली को संबोधित किया था. आरोप है कि इस दौरान उन्होंने समर्थकों के साथ एक नारा लगवाया, जिसमें ‘देश के गद्दारों को… गोली मारो सालों को’ शब्द शामिल थे. इसके अगले दिन 28 जनवरी 2020 को तत्कालीन भाजपा सांसद परवेश वर्मा के एक बयान को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ था. आरोप था कि उन्होंने शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शन को लेकर चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर प्रदर्शनकारियों को नहीं रोका गया तो वे लोगों के घरों में घुस सकते हैं और उनके साथ बलात्कार और हत्या जैसी घटनाएं हो सकती हैं.

    बृंदा करात ने की थी FIR दर्ज करने की मांग

    इन बयानों को लेकर बृंदा करात ने सबसे पहले दिल्ली पुलिस से शिकायत की थी. उन्होंने अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A और 295A समेत अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज करने की मांग की थी. जब पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया, तो करात ने निचली अदालत का रुख किया. उन्होंने अदालत से पुलिस को दोनों नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की.

    हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी. अदालत ने माना कि सार्वजनिक पद पर रहे अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा शुरू करने से पहले आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 196 और 197 के तहत पूर्व अनुमति की जरूरत हो सकती है. इसके बाद बृंदा करात ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया. हाईकोर्ट ने भी 2022 में निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

    29 अप्रैल के फैसले में क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने?

    सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 29 अप्रैल को मामले पर फैसला सुनाया था. अदालत ने एफआईआर दर्ज करने का सीधा आदेश देने से इनकार कर दिया था. हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि कथित अपराधों की जांच का आदेश देने के लिए मजिस्ट्रेट को मामले के संज्ञान से पहले किसी पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं है.

    इसके बावजूद, अदालत ने अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के भाषणों की स्वतंत्र रूप से जांच करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर किसी संज्ञेय अपराध का खुलासा नहीं होता. इसी फैसले को चुनौती देते हुए बृंदा करात ने सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दाखिल की थी. अब शीर्ष अदालत ने उस याचिका को भी खारिज कर दिया है.

    क्या है अब स्थिति?

    सुप्रीम कोर्ट द्वारा समीक्षा याचिका खारिज किए जाने के बाद इस मामले में अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर कानूनी चुनौती फिलहाल समाप्त हो गई है.

    यह मामला एक बार फिर राजनीतिक भाषणों, कथित भड़काऊ बयानों और आपराधिक कार्रवाई के बीच कानूनी सीमाओं को लेकर चर्चा में है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मुख्य आधार यह रहा कि संबंधित भाषणों की जांच के बाद अदालत को कोई ऐसा संज्ञेय अपराध नहीं मिला, जिसके आधार पर एफआईआर दर्ज करने की कार्रवाई आगे बढ़ाई जा सके.

     

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