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    Home»जोहार ब्रेकिंग»जुलाई 11 साल 2006, आज भी हरे हैं मुंबई ब्लास्ट के जख्म, आखिर आरोपी कैसे बरी होते गए
    जोहार ब्रेकिंग

    जुलाई 11 साल 2006, आज भी हरे हैं मुंबई ब्लास्ट के जख्म, आखिर आरोपी कैसे बरी होते गए

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyJuly 11, 2026Updated:July 11, 2026No Comments7 Mins Read11
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    मुस्कान चौधरी

    11 जुलाई 2006…शाम के लगभग 6:24 बजे थे. मुंबई के स्टेशनों पर दफ्तर से लौट रहे लोगों की भारी भीड़ थी. मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेनें भी यात्रियों से खचाखच भरी थीं. तभी अचानक एक जोरदार ब्लास्ट हुआ. धमाके की आवाज सुनते ही स्टेशन पर भगदड़ मच गई. इससे पहले कि लोग कुछ समझ पाते, एक के बाद एक लगातार सात लोकल ट्रेनों में हुए बम ब्लास्ट ने पूरी मुंबई ही नहीं, भारत सहित दुनिया को हिलाकर रख दिया.

    पहला ब्लास्ट शाम 6:24 बजे हुआ, जिसके बाद महज 11 मिनट में लगातार 7 धमाके हुए. सभी धमाके लोकल ट्रेनों के फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट नें हुए थे. इस हादसे में 189 लोगों की जान चली गई. इसी के साथ मुंबई भी कुछ पलों के लिए थम सी गई थी. ये धमाके माटुंगा रोड, माहिम, बांद्रा, खार रोड, जोगेश्वरी, बोरीवली और मीरा रोड-भायंदर के बीच चलती ट्रेन में हुए. चारों तरफ चीख-पुकार, खून और तबाही का मंजर था.

    हमले के बाद मुंबई समेत देश के कई बड़े शहरों में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया. मुंबई के दोनों एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशनों पर सुरक्षा कड़ी कर दी गई. कुछ समय के लिए वेस्टर्न रेलवे की लोकल सेवाएं रोकी गईं, जबकि यात्रियों को घर पहुंचाने के लिए बेस्ट (BEST) ने अतिरिक्त बसें चलाईं. वहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री ने गृह मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ आपात सुरक्षा बैठक भी की.

    जांच में सामने आया कि धमाकों के लिए प्रेशर कुकर में बम तैयार किए गए थे. इनमें आरडीएक्स, अमोनियम नाइट्रेट और अन्य विस्फोटक सामग्री का इस्तेमाल किया गया था. बम बैग में रखकर ट्रेनों के प्रथम श्रेणी डिब्बों में छोड़े गए और टाइमर के जरिए विस्फोट किए गए.

    13 पाकिस्तानी नागरिकों की हुई थी पहचान

    मामले की जांच सबसे पहले मुंबई एंटी टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) ने शुरू की. जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया कि इस हमले की साजिश प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) ने मिलकर रची थी. कई लोगों को गिरफ्तार किया गया और उन पर साजिश, विस्फोटक जुटाने, बम बनाने और ट्रेनों में रखने के आरोप लगाए गए.

    एंटी टेररिज्म स्क्वैड ने 20 जुलाई, 2006 से 3 अक्टूबर, 2006 के बीच आरोपियों को गिरफ्तार किया. उसी साल नवंबर में आरोपियों ने कोर्ट को लिखित में जानकारी दी कि उनसे जबरन इकबालिया बयान लिए गए. चार्जशीट में 30 आरोपी बनाए गए. इनमें से 13 की पहचान पाकिस्तानी नागरिकों के तौर पर हुई. कोर्ट ने 13 आरोपियों में से 5 दोषियों को फांसी की सजा, 7 को उम्रकैद की सजा और एक आरोपी को बरी कर दिया था.

    पुलिस ने 10,667 पन्नों की चार्जशीट में बताया कि मार्च 2006 में लश्कर-ए-तैयबा के आजम चीमा ने अपने बहावलपुर स्थित घर में सिमी और लश्कर के दो गुटों के मुखियाओं के साथ इन धमाकों की साजिश रची थी. पुलिस ने कहा था कि मई 2006 में बहावलपुर के ट्रेनिंग कैंप में 50 युवकों को भेजा गया. उन्हें बम बनाने और बंदूकें चलाने का प्रशिक्षण दिया गया.

    वो 5 वजहें, जिनसे आरोपी ‘दोषी’ सिद्ध नहीं किए जा सके
    मामले में लंबी सुनवाई के बाद भी कई आरोपी बरी हो गए. कई तरह के कॉस्पिरेसी थ्योरी बाहर आती रही. जाहिर है, अदालत साक्ष्य के आधार पर फैसला देती है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस श्याम चंदक की बेंच ने कहा, “अभियोजन पक्ष अपना केस शक से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है.” इस फ़ैसले से 12 अभियुक्तों के परिवारों और 2015 में बरी हुए तेरहवें अभियुक्त अब्दुल वाहिद को राहत मिली है. कोर्ट ने कबूलनामों, गवाहों की पहचान, बरामदगी और फोरेंसिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए.

    अब्दुल वाहिद ने कहा, “ये बहुत बड़ी राहत है और मैं बहुत ख़ुश हूँ. इतने सालों से हम कह रहे थे कि सिर्फ़ मैं ही नहीं, बाक़ी अभियुक्त भी बेगुनाह हैं.”

    कैसा बम इस्तेमाल हुआ, नहीं बता पाए – आरडीएक्स, डेटोनेटर, कुकर, सर्किट बोर्ड, सोल्डरिंग गन, किताबें और नक्शे जैसे सबूत जब्त किए गए थे, लेकिन घटना से इन चीजों को सीधे तौर पर नहीं जोड़ पाए. इन चीजों को जब्त करते समय ठीक से सील नहीं किया गया था. इसके अलावा, यह भी स्पष्ट नहीं कर पाए कि हमले में किस प्रकार के बम का इस्तेमाल किया गया था.

    बिना अधिकार शिनाख्त परेड करवाई – वरिष्ठ जांच अधिकारी बर्वे ने शिनाख्त परेड करवाई थी. लेकिन उन्हें इसका अधिकार नहीं था. इसलिए आरोपी को पहचानने वाले गवाह की गवाही भी खारिज कर दी गई. आरोपियों के रेखाचित्र बनाने में मदद करने वाले गवाह को शिनाख्त परेड में नहीं बुलाया गया. इसके अलावा, सुनवाई के दौरान भी उससे पहचान के लिए नहीं कहा गया.

    सौ दिन बाद दिए बयान नहीं माने गए – पहला गवाह टैक्सी चालक था जिसने कहा था कि वह हमले वाले दिन चर्चगेट स्टेशन गया था. उसकी गवाही सौ दिन बाद ली, वो भी विश्वनीय नहीं लगती. टैक्सी ड्राइवर के पास सौ दिन बाद भी आरोपी का चेहरा याद रखने का कोई ठोस कारण नहीं था. उसे आरोपियों से बात करने और देखने का मौका नहीं मिला.

    गवाह के बयान में विरोधाभास दिखा – एक गवाह ने दावा किया कि आरोपी एक घर में बम बना रहा था. बाद में कहा, वह घर में दाखिल नहीं हुआ था। यह भी स्पष्ट नहीं कि गवाह ने पुलिस का यह बताया या नहीं. वह गवाह 100 दिन चुप क्यों रहा? यह भी नहीं बताया. अन्य गवाहों ने भी 100 या ज्यादा दिन चुप्पी के बाद बयान दर्ज कराए. 3 माह बाद भी सही पहचान कैसे कर ली गई?

    आरोपियों के कबूलनामे नहीं माने गए – कोर्ट ने आरोपियों के इकबालिया बयानों को भी खारिज किया. बयानों में बहुत समानताएं मिलीं, जो संदेहास्पद थीं. आरोपियों के बयान दर्ज करने से पहले आधिकारिक अनुमति लेने की प्रक्रिया पर भी कई गंभीर सवाल उठाए थे। सरकार अभियुक्तों के विरुद्ध कोई ठोस और प्रत्यक्ष साक्ष्य पेश करने में विफल रही. जांच प्रक्रिया में कई खामियां रहीं.

    मुंबई ने रफ्तार पकड़ लिया, पीड़ितों ने नहीं

    हाई कोर्ट के फैसले के बाद उन परिवारों का दर्द फिर सामने आ गया, जिन्होंने इस हमले में अपने अपनों को खोया था. एक ओर आरोपी बरी हो गए, दूसरी ओर कई परिवार अब भी इस सवाल का जवाब तलाश रहे हैं कि आखिर 189 लोगों की जान लेने वाले इस हमले के असली गुनहगार कौन थे.

    मुंबई ट्रेन ब्लास्ट के बाद रेलवे स्टेशनों पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया. सीसीटीवी कैमरे लगाए गए, यात्रियों की जांच बढ़ाई गई, बम निरोधक दस्तों की संख्या में इजाफा हुआ और खुफिया तंत्र को भी पहले से ज्यादा मजबूत किया गया. इसके बावजूद यह हमला आज भी भारत के सुरक्षा इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में शामिल है.

    बहरहाल मुंबई ने 2006 के बाद फिर से अपनी रफ्तार जरूर पकड़ ली, लेकिन 11 जुलाई की वह शाम आज भी हजारों लोगों के दिलों में जिंदा है. यह सिर्फ सात धमाकों की कहानी नहीं है, बल्कि उन 189 लोगों की अधूरी जिंदगी की कहानी है जो उस दिन घर लौटने निकले थे, लेकिन कभी अपने परिवार तक नहीं पहुंच सके. अब जब इस मामले में अदालत का फैसला आ चुका है, तब भी कई सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब देश आज भी तलाश रहा है.

    Also Read : “इट वाज़ गावस्कर द रियल मास्टर जस्ट लाइक अ वॉल”, सुनील गावस्कर के लिए किसने गाया था ये गाना

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