स्कूल जाते बच्चों का हाथ कसकर पकड़ना, सुबह की सैर पर निकलने से पहले रास्ता बदल लेना और रात होते ही गलियों में निकलने से डरना… रांची के कई इलाकों में यह अब रोजमर्रा की हकीकत बन चुकी है. आवारा कुत्तों का डर सिर्फ लोगों के मन में नहीं, बल्कि अस्पतालों के रिकॉर्ड में भी साफ दिखाई दे रहा है. सदर अस्पताल में इस साल जनवरी से जून के बीच कुत्तों के काटने के 52,669 मामले दर्ज हुए हैं. इनमें बड़ी संख्या बच्चों और बुजुर्गों की है.
सदर अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी से जून 2026 के बीच 52,669 लोग कुत्तों के काटने के बाद इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे. यानी इन छह महीनों में हर दिन औसतन 290 मरीज डॉग बाइट का शिकार होकर अस्पताल पहुंचे.
हर महीने औसत देखें तो जनवरी में सबसे ज्यादा करीब 313 मरीज प्रतिदिन अस्पताल पहुंचे. इसके बाद फरवरी में औसतन 327, मार्च में 297, अप्रैल में 282, मई में 265 और जून में 264 मरीज प्रतिदिन इलाज के लिए पहुंचे.आंकड़े बताते हैं कि मामलों में कुछ कमी जरूर आई है, लेकिन हर दिन सैकड़ों लोगों का कुत्तों के काटने के बाद अस्पताल पहुंचना शहर में बढ़ते खतरे की ओर इशारा करता है. डॉक्टरों का कहना है कि कई दिनों से मरीजों की संख्या 250 के करीब पहुंच जाती है. अस्पताल में लगातार बढ़ रही भीड़ इस बात का संकेत है कि शहर में आवारा कुत्तों की समस्या तेजी से गंभीर होती जा रही है.
एंटी-रेबीज़ क्लिनिक के एक डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि शुक्रवार को ही क्लिनिक में 48 नए मामले दर्ज किए गए. उन्होंने कहा कि कई लोग ऐसे भी आते हैं जिन्हें पालतू और वैक्सीन लगे कुत्तों ने मामूली खरोंच मारी होती है. ऐसे हर मामले में एंटी-रेबीज़ वैक्सीन की जरूरत नहीं पड़ती.
डॉक्टर के मुताबिक लोगों में इस बात को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है कि किन परिस्थितियों में तुरंत अस्पताल जाना जरूरी होता है और कब सामान्य सावधानी ही काफी होती है. साथ ही उन्होंने कहा कि सिर्फ इलाज से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए भी प्रभावी व्यवस्था बनानी होगी.
सरकार बना रही है रेबीज़ खत्म करने का रोडमैप
बढ़ते मामलों को देखते हुए नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) के झारखंड चैप्टर ने हाल ही में राज्य स्तरीय बैठक आयोजित की. यह बैठक केंद्र सरकार के नेशनल रेबीज़ कंट्रोल प्रोग्राम के तहत हुई, जिसमें झारखंड के लिए रेबीज़ उन्मूलन का रोडमैप तैयार करने पर चर्चा की गई. इस योजना का मकसद वर्ष 2030 तक रेबीज़ से इंसानों की मौत को पूरी तरह खत्म करना है. इसके लिए राज्य स्तर पर विस्तृत एक्शन प्लान तैयार किया जा रहा है.
एनएचएम झारखंड के निदेशक शशि प्रकाश झा ने सभी जिलों के सिविल सर्जनों को निर्देश दिया है कि सरकारी अस्पतालों में एंटी-रेबीज़ वैक्सीन की कमी नहीं होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि हर अस्पताल में कम से कम तीन महीने का बफर स्टॉक रखा जाए. साथ ही यह भी निर्देश दिया गया है कि जैसे ही वैक्सीन का स्टॉक कम होने लगे, तुरंत नई खरीद की प्रक्रिया शुरू कर दी जाए ताकि किसी मरीज को दवा की कमी का सामना न करना पड़े.
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार, रेबीज़ नियंत्रण का राज्य स्तरीय एक्शन प्लान इसी महीने तैयार कर समीक्षा के लिए भेजा जाएगा. अगस्त में इसे अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है. इसके बाद 28 सितंबर, विश्व रेबीज़ दिवस के अवसर पर इस योजना को आधिकारिक तौर पर लॉन्च किया जाएगा.
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अस्पतालों में इलाज की व्यवस्था मजबूत करना काफी नहीं होगा. आवारा कुत्तों की नसबंदी, समय पर टीकाकरण, कचरा प्रबंधन और लोगों में जागरूकता बढ़ाने जैसे कदम भी उतने ही जरूरी हैं. तभी रांची में कुत्तों के बढ़ते हमलों पर लगाम लगाई जा सकेगी और रेबीज़ जैसी जानलेवा बीमारी से लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी.

