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    Home»जोहार ब्रेकिंग»संस्कृत कभी कंप्यूटर की भाषा क्यों नहीं बन सकती थी?
    जोहार ब्रेकिंग

    संस्कृत कभी कंप्यूटर की भाषा क्यों नहीं बन सकती थी?

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkJuly 11, 2026Updated:July 11, 2026No Comments5 Mins Read
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    यह दावा हर कुछ वर्षों में फिर सामने आ जाता है कि संस्कृत का व्याकरण इतना सटीक है कि नासा (NASA) ने इसे कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की भाषा बनाने पर विचार किया था. यह दावा गलत है. लेकिन यह मिथक जिस कारण से गलत साबित होता है, वह अपने आप में महत्वपूर्ण है. किसी भी प्रोग्रामिंग भाषा के लिए आवश्यक है कि हर प्रतीक (Symbol) का केवल एक निश्चित अर्थ हो, जिसे हर कोई समान रूप से समझे. संस्कृत में ऐसा कभी नहीं रहा। इसके अर्थ हर पीढ़ी के व्याख्याकारों के साथ बदलते रहे.

    सबसे पहले वेदांत के मतभेदों को देखें. आदि शंकराचार्य ने उपनिषदों की व्याख्या शुद्ध अद्वैतवाद (Non-dualism) के रूप में की—उनके अनुसार यह संसार माया है और केवल ब्रह्म ही परम सत्य है. रामानुजाचार्य ने इस व्याख्या को अस्वीकार कर कहा कि संसार वास्तविक है और ईश्वर का ही शरीर है. इसके बाद मध्वाचार्य ने इन दोनों मतों को खारिज करते हुए कहा कि जीव और ईश्वर सदा-सर्वदा अलग-अलग हैं. एक ही संस्कृत श्लोक, तीन अलग-अलग भाष्यकार और तीन परस्पर विरोधी दर्शन. आज तक इनमें कोई अंतिम सहमति नहीं बन सकी. तीनों परंपराएँ आज भी मौजूद हैं और अपने-अपने मत पर कायम हैं.

    फिर आते हैं 14वीं शताब्दी के विद्वान सायणाचार्य, जो विजयनगर साम्राज्य के प्रमुख आचार्य थे. ऋग्वेद पर उनकी टीका लगभग पाँच सौ वर्षों तक मानक मानी जाती रही. उनके अनुसार अग्नि में आहुति दी जाती थी, सोमरस अर्पित किया जाता था और वर्षा, पशुधन तथा पुत्र प्राप्ति के लिए पशुबलि दी जाती थी. यह कोई हाशिए की व्याख्या नहीं थी, बल्कि व्यापक रूप से स्वीकार की गई समझ थी.

    19वीं शताब्दी में स्वामी दयानंद सरस्वती ने इस पूरी व्याख्या को पलट दिया. उनके अनुसार ‘अश्व’ वास्तव में मन का प्रतीक था, कोई घोड़ा नहीं; ‘महिष’ वर्षा के बादल का प्रतीक था, भैंसा नहीं; और रक्तबलि वेदों की मूल शिक्षा नहीं, बल्कि बाद की विकृति थी. सायणाचार्य के समय में इस व्याख्या को पूरी तरह खारिज कर दिया जाता, लेकिन आगे चलकर यही आर्य समाज का सिद्धांत बनी और आज भी अनेक सुधारवादी हिंदू वेदों को इसी दृष्टि से पढ़ते हैं.

    इस तरह एक ही शब्द की दो अलग-अलग व्याख्याएँ, जिनके बीच पाँच सौ वर्षों का अंतर है, दोनों को ही प्रामाणिक कहा जाता है. गणित इस तरह काम नहीं करता. यदि आज 2+2=4 है, तो कोई नई गणितीय परंपरा आने पर यह 0 नहीं हो जाता. लेकिन वैदिक संस्कृत में एक शब्द का अर्थ समय के साथ अपने ठीक विपरीत भी हो सकता है, और दोनों अर्थों के समर्थक मिल जाते हैं.

    यही कारण है कि भगवद्गीता के अंग्रेज़ी में सैकड़ों अनुवाद उपलब्ध हैं. कोई भी भौतिकी के किसी समीकरण के सौ अनुवाद प्रकाशित नहीं करता. गीता के इतने अनुवाद इसलिए हैं क्योंकि कोई भी अनुवाद स्वयं को अंतिम और निर्विवाद नहीं कह सकता. यह तर्क कि वेदों को समझने के लिए संस्कृत सीखना अनिवार्य है, इसी बिंदु पर कमजोर पड़ जाता है. यदि भाषा जाने बिना अनुवाद वास्तव में असंभव होता, तो गीता के सभी अनुवाद समान रूप से निरर्थक होते. लेकिन ऐसा नहीं है, हर अनुवाद के अपने पाठक और समर्थक हैं. इसका अर्थ यह है कि अस्पष्टता कोई ऐसी बाधा नहीं है जिसे केवल विशेषज्ञता दूर कर दे; बल्कि वही अस्पष्टता वह आधार है, जिस पर विशेषज्ञता अपना अधिकार स्थापित करती है.

    वेदों को भी लगभग एक हजार वर्षों तक जानबूझकर मौखिक परंपरा में ही सुरक्षित रखा गया. यह मजबूरी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी व्यवस्था थी. मौर्यकाल में ब्राह्मी लिपि का प्रयोग राजकीय अभिलेखों में हो रहा था, उससे कई शताब्दियों बाद जाकर वेद लिखे गए. कंठस्थ पाठ के माध्यम से मौखिक परंपरा ने इन ग्रंथों को एक सीमित पुरोहित वर्ग के नियंत्रण में रखा. जब कोई लिखित पांडुलिपि ही नहीं थी, तब बाहरी व्यक्ति उसके पाठ की जांच या तुलना भी नहीं कर सकता था. यदि वेद पहले लिख दिए जाते, तो उन पर सवाल उठाना आसान हो जाता. मौखिक परंपरा ने व्याख्या और निर्णय का अधिकार पुरोहित वर्ग के भीतर ही सीमित रखा.

    इसी पुरोहित वर्ग ने राजपूत क्षत्रिय वंशों को भी संस्कृत शिक्षा देने से इनकार किया और उन्हें इसके योग्य नहीं माना. संस्कृत से वंचित रहने के कारण उन्हीं परंपराओं ने आगे चलकर ब्रज, अवधी और राजस्थानी जैसी लोकभाषाओं में समृद्ध भक्ति साहित्य रचा, जिसने उन लोगों तक पहुंच बनाई जहां संस्कृत कभी नहीं पहुंच सकी. आज संस्कृत के धाराप्रवाह वक्ताओं की संख्या कुछ हजार मानी जाती है, जबकि जिन जनभाषाओं से उसने स्वयं को अलग रखा, वे आज करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाती हैं.

    इस प्रकार क्रमशः तीन बड़ी विफलताएं सामने आती हैं—पहली, सदियों तक किसी शब्द या वाक्य का स्थिर अर्थ न रहना; दूसरी, लगभग एक सहस्राब्दी तक जानबूझकर मौखिक परंपरा बनाए रखना; और तीसरी, बाहरी लोगों को भाषा न सिखाने की नीति. इन तीनों ने मिलकर एक ऐसे पुरोहित वर्ग के व्याख्यात्मक एकाधिकार को सुरक्षित रखा, जो अर्थ का अंतिम निर्णायक बना रहा. लेकिन यही कारण था कि यह भाषा कभी ऐसी नहीं बन सकी जिसे कोई कंप्यूटर—या उस सीमित परंपरा के बाहर का कोई भी व्यक्ति—विश्वसनीय और एकरूप ढंग से समझ या विश्लेषित कर सके.

    देवदत्त पटनायक, पौराणिक कथाकार, प्रसिद्ध लेखक
    (नोटः यह लेखक के निजी विचार हैं.)

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