Palamu : झारखंड के पलामू जिले के छतरपुर प्रखंड के डाली गांव में एक ऐसा मंदिर बनकर तैयार हुआ है, जिसकी चर्चा अब देश-विदेश में हो रही है। इसका नाम है “पर्यावरण धर्म ज्ञान मंदिर”। निर्माण कार्य साल 2022-23 में शुरू हुआ था और 2026 में यह पूरी तरह बनकर तैयार हो गया। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां सिर्फ देवी-देवताओं की प्रतिमाएं ही नहीं, बल्कि देश की महान विभूतियों के साथ “वृक्ष देवता” की भी प्रतिमा स्थापित की गई है। यानी यहां प्रकृति को ही पूजा का दर्जा दिया गया है।
सुंदरलाल बहुगुणा के नाम पर रखा गया मंदिर का नाम
इस मंदिर का नाम प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा और उनकी पत्नी के सम्मान में रखा गया है। मंदिर के निर्माण और पूरे प्रोजेक्ट की देखरेख मशहूर पर्यावरणविद कौशल किशोर जायसवाल ने की है, जो पिछले कई दशकों से पर्यावरण संरक्षण की मुहिम से जुड़े हुए हैं।
अमेरिका और कर्नाटक से पहुंचे बड़े पर्यावरणविद
गुरुवार को इस मंदिर का विधिवत उद्घाटन किया गया। उद्घाटन समारोह में अमेरिका के पर्यावरणविद और लेखक जॉर्ज जेम्स और कर्नाटक के प्रसिद्ध एपिको आंदोलन के प्रणेता पांडुरंग हेगड़े शामिल हुए। जॉर्ज जेम्स लंबे समय से भारत के पर्यावरण पर रिसर्च कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि पर्यावरण बचाने का मजबूत संदेश है। वहीं पांडुरंग हेगड़े ने कहा कि आज के समय में जब जंगल और प्रकृति खतरे में हैं, ऐसे में इस तरह का मंदिर लोगों को जागरूक करेगा और पर्यावरण संरक्षण को एक जन आंदोलन बना सकता है।
दुनिया का पहला ‘पर्यावरण को धर्म’ मानने वाला मंदिर
पर्यावरणविद कौशल किशोर जायसवाल का कहना है कि यह दुनिया का पहला ऐसा मंदिर है, जो पर्यावरण को धर्म मानने की सोच पर बना है। उनका मानना है कि जब तक लोग प्रकृति को पूजा के रूप में नहीं अपनाएंगे, तब तक उसकी रक्षा की भावना मजबूत नहीं होगी।
मंदिर परिसर में 200 से ज्यादा दुर्लभ पौधे
मंदिर परिसर भी अपने आप में एक जीवित संग्रहालय जैसा है। यहां देश-विदेश के 200 से ज्यादा तरह के पेड़-पौधे लगाए गए हैं। कई पौधे ऐसे हैं जो अब दुर्लभ हो चुके हैं या खत्म होने की कगार पर हैं। यहां जापान का मशहूर मियाजाकी आम, कोहिनूर, वियतनाम का मोसांड, ऑस्ट्रेलिया का आम, नाइजीरिया का सागवान, श्रीलंका का नारियल, न्यूज़ीलैंड की कॉफी, नेपाल का सिंदूर और मलेशिया का सुखवा जैसे पेड़-पौधे मौजूद हैं। इसके अलावा कई औषधीय पौधे भी लगाए गए हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान और संरक्षण दोनों का काम करेंगे।
50 साल पुरानी ‘वन राखी’ मुहिम से जुड़ा नाम
कौशल किशोर जायसवाल ने करीब 50 साल पहले ‘वन राखी मूवमेंट’ की शुरुआत की थी। इस अभियान में लोग पेड़ों को राखी बांधकर उनकी रक्षा का संकल्प लेते थे। वे पिछले छह दशकों से पर्यावरण संरक्षण की इस मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं। उद्घाटन कार्यक्रम में छतरपुर जिला परिषद सदस्य अमित जायसवाल, डाली पंचायत की मुखिया पूनम जायसवाल समेत कई स्थानीय लोग मौजूद रहे।
डाली गांव का यह मंदिर अब सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि पर्यावरण जागरूकता का नया केंद्र बन गया है। यहां से दिया जा रहा संदेश साफ है — अगर प्रकृति बचेगी, तभी भविष्य सुरक्षित रहेगा।
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