“वंदे मातरम्…”
ये सिर्फ दो शब्द नहीं हैं. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में ये दो शब्द कभी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की आवाज बने, कभी क्रांतिकारियों के आखिरी शब्द बने और कभी देश की मातृभूमि के प्रति समर्पण का प्रतीक. करीब डेढ़ सदी पहले लिखे गए इस गीत ने भारतीयों के भीतर आजादी और राष्ट्रभक्ति की ऐसी भावना जगाई, जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती है.
आज 7 सितंबर यानी ‘वंदे मातरम् दिवस’ है और इसी खास मौके पर जब इस ऐतिहासिक गीत के 150 साल पूरे होने की चर्चा हो रही है, तो इसके इतिहास के साथ-साथ इससे जुड़ा मौजूदा विवाद भी समझना जरूरी हो जाता है. एक तरफ केंद्र सरकार की ओर से वंदे मातरम् के पूर्ण संस्करण को लेकर जोर दिया जा रहा है और इसे राष्ट्रगान के समान कानूनी संरक्षण दिया गया है, तो दूसरी तरफ इसके सभी पदों को गाने की अनिवार्यता, धार्मिक संदर्भों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
यानी जिस गीत ने कभी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोगों को एकजुट किया था, आज वही ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रवाद, धर्म, आस्था और राजनीतिक विचारधारा के बीच बहस का केंद्र बन गया है. आखिर 150 साल के इस सफर में वंदे मातरम् ने कैसे एक क्रांतिकारी गीत से राष्ट्रगीत तक का सफर तय किया और आज फिर इसके नाम पर सियासी संग्राम क्यों छिड़ा है?
1882 में लिखा गया गीत, जिसने आजादी की लड़ाई को आवाज दी
वंदे मातरम् की कहानी 19वीं सदी से शुरू होती है. बंकिमचंद्र चटर्जी ने संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण से इस गीत की रचना की और 1882 में इसे अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया. इसकी शुरुआती पंक्तियां मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और उसके प्रति श्रद्धा को व्यक्त करती हैं.
गीत का शुरुआती भाव है- जल, फल, हरियाली, ठंडी हवाओं और सुंदर रातों से समृद्ध मातृभूमि को नमन. यही वजह थी कि धीरे-धीरे यह गीत केवल साहित्य की दुनिया तक सीमित नहीं रहा. यह स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज बन गया.
1905 में बंगाल विभाजन के खिलाफ आंदोलन के दौरान “वंदे मातरम्” का इस्तेमाल राजनीतिक नारे के रूप में हुआ. हजारों छात्र जुलूसों में इसे गाते और नारे लगाते थे. ब्रिटिश सरकार ने इसकी लोकप्रियता को खतरे के रूप में देखा और कई जगहों पर इसके सार्वजनिक गायन और नारे पर रोक लगाने की कोशिश की.
रंगपुर में तो वंदे मातरम् गाने वाले करीब 200 छात्रों पर जुर्माना लगाए जाने का उल्लेख मिलता है. बारीसाल में भी ब्रिटिश प्रशासन ने इसके सार्वजनिक इस्तेमाल पर रोक लगाई, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने आदेश की परवाह नहीं की.
क्रांतिकारियों की जुबान पर था वंदे मातरम्
वंदे मातरम् सिर्फ राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रहा. लाला लाजपत राय ने लाहौर से प्रकाशित अपने जर्नल का नाम वंदे मातरम् रखा. 1907 में मैडम भीखाजी कामा ने जर्मनी के स्टुटगार्ट में जो तिरंगा फहराया, उसके मध्य में भी “वंदे मातरम्” लिखा था.
क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा के बारे में स्रोत में उल्लेख है कि 1909 में फांसी दिए जाने से पहले उनके आखिरी शब्द “बंदे मातरम्” थे. आजादी के आंदोलन के दौरान वंदे मातरम् का इस्तेमाल केवल एक समुदाय या एक संगठन तक सीमित नहीं था. अलग-अलग जगहों पर आंदोलनकारियों और छात्रों ने इसे ब्रिटिश शासन के विरोध और देशभक्ति के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया.
लेकिन विवाद की जड़ भी गीत के भीतर ही मौजूद थी
वंदे मातरम् की कहानी का दूसरा पहलू भी है. गीत के शुरुआती दो पदों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और उसके प्रति सम्मान का भाव है. लेकिन आगे के पदों में मातृभूमि की तुलना दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे देवी स्वरूपों से की गई है.
यहीं से धार्मिक आपत्तियों की शुरुआत होती है. कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों की आपत्ति यह रही कि इस्लाम में किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा की अनुमति नहीं है और वंदे मातरम् में भारत माता की वंदना का भाव आता है. इसके अलावा यह गीत जिस ‘आनंदमठ’ उपन्यास में शामिल था, उसके संदर्भ को लेकर भी आपत्तियां उठीं.
1937 में कांग्रेस को करना पड़ा था फैसला
यह विवाद इतना गंभीर हुआ कि 1937 में कांग्रेस ने इस पर विचार किया. जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति में मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे. समिति ने माना कि शुरुआती दो पद मातृभूमि की प्रशंसा करते हैं, जबकि बाद के पदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख आता है.
इसके बाद तय किया गया कि राष्ट्रगीत के रूप में शुरुआती दो पदों का ही इस्तेमाल किया जाएगा. यही फैसला आगे चलकर वंदे मातरम् के सार्वजनिक और आधिकारिक इस्तेमाल की परंपरा का महत्वपूर्ण आधार बना.
इस फैसले को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि आज जब पूरे गीत को लेकर बहस होती है, तो यह सिर्फ वर्तमान की राजनीतिक बहस नहीं है. इसके पीछे आजादी से पहले की वह बहस भी मौजूद है, जिसमें राष्ट्रवाद और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन खोजने की कोशिश की गई थी.
जन गण मन राष्ट्रगान बना, वंदे मातरम् राष्ट्रगीत
आजादी के बाद जब राष्ट्रीय प्रतीकों को औपचारिक रूप दिया गया, तब जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा मिला. 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किए जाने संबंधी वक्तव्य पढ़ा. इसमें वंदे मातरम् को जन गण मन के समान सम्मान और पद दिए जाने की बात कही गई.
यानी भारत ने दोनों गीतों को अपनी राष्ट्रीय पहचान में जगह दी. एक राष्ट्रगान बना, दूसरा राष्ट्रगीत. लेकिन दोनों की अपनी ऐतिहासिक यात्रा रही.
150 साल बाद फिर बहस के केंद्र में वंदे मातरम्
‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण को हाल ही में राष्ट्रगान के समान क़ानूनी संरक्षण दिया गया है. 80वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर शुक्रवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले और उसके समापन पर भी ‘वंदे मातरम’ बजाया गया था.
यह इसलिए अहम है क्योंकि राष्ट्रगान को संवैधानिक दर्जा हासिल है और आधिकारिक प्रोटोकॉल के तहत इसे गणतंत्र का सर्वोच्च संगीतमय प्रतीक माना जाता है. हालांकि, बीजेपी और संघ परिवार से जुड़े संगठन ‘वंदे मातरम’ की वकालत लंबे समय से करते रहे हैं. इसमें हिंदू धार्मिक संदर्भ भी हैं.
हाल ही में नरेंद्र मोदी सरकार ने क़ानून में संशोधन कर ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ के बराबर दर्जा दिया है. इससे पहले राष्ट्रगान को सरकारी और राजकीय समारोहों में बजाया जाता था, जबकि राष्ट्रीय गीत मुख्य रूप से सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित था. स्वतंत्रता दिवस समारोह की ज़िम्मेदारी संभालने वाले रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में घोषणा की थी कि ‘वंदे मातरम्’ के 150वें वर्ष को यादगार बनाने के लिए पहली बार इसे विशेष सम्मान दिया जाएगा.
वंदे मातरम को लेकर कई आलोचकों का तर्क रहा है कि यह संघ परिवार के बड़े हिंदुत्व एजेंडे का हिस्सा है, जिसके तहत भारत की विविधता और बहुलता का जश्न मनाने वाले राष्ट्रगान की जगह ‘वंदे मातरम’ के सभी छह पदों को प्रमुखता देने की कोशिश हो रही है. ‘वंदे मातरम’ के इन पदों में हिंदू देवी-देवताओं, जिनमें दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी संदर्भ शामिल हैं, और भारत को एक पूजनीय मातृ देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है.
संशोधित कानून में बड़ा बदलाव
संशोधित क़ानून के मुताबिक़, राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 जिसे संसद ने पारित किया और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद लागू हुए प्रावधान के तहत, राष्ट्रीय गीत का अपमान करने पर भी तीन साल तक की जेल की सज़ा हो सकती है, जैसा कि राष्ट्रगान के अपमान के मामले में होता है.
इसे लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सांसद शशि थरूर ने आपत्ति जताई थी. थरूर ने एक्स पर लिखा था, ”राष्ट्रपति ने वंदे मातरम संशोधन को मंज़ूरी दे दी है. इसे संसद में बिना चर्चा के पारित किया गया था. इसके तहत राष्ट्रगान के अलावा, हर आधिकारिक समारोह की शुरुआत और अंत में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का पूरा संस्करण गाना अनिवार्य होगा.”
”मैं दोनों का बहुत सम्मान करता हूँ और ‘वंदे मातरम’ के पहले दो पद गा सकता हूँ, लेकिन इसके बाक़ी चार पद नहीं, क्योंकि अब तक उन्हें गाना अनिवार्य नहीं था. मैं सिर्फ़ एक व्यावहारिक पहलू की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं, जिसे हमारे अति-उत्साही लोगों ने नज़रअंदाज कर दिया है: इंसानी स्वभाव.”
थरूर ने लिखा है, ”जन गण मन के दौरान लोगों को सम्मानपूर्वक खड़े होकर क़रीब 52 सेकंड तक ध्यान केंद्रित रखना होता है. वहीं ‘वंदे मातरम्’ का पूरा संस्करण तीन मिनट 10 सेकंड का है. तमिलनाडु ने अभी फ़ैसला किया है कि इन दोनों से पहले राज्य गीत ‘तमिल थाई वाज़्थु’ भी गाया जाएगा, जो क़रीब दो मिनट का है.”
”क्या हम सचमुच उम्मीद करते हैं कि हर समारोह की शुरुआत और अंत में लोग क़रीब छह मिनट तक स्थिर खड़े रहकर सम्मानपूर्वक इन गीतों को सुनेंगे? यानी हर समारोह में कुल 12 अतिरिक्त मिनट? क्या सम्मान और धैर्य को क़ानून बनाकर लागू किया जा सकता है? मुझे डर है कि विधेयक का मक़सद यानी राष्ट्रीय गीत के प्रति अधिक सम्मान पैदा करना, पूरा नहीं होगा. बल्कि इसका उल्टा असर हो सकता है.”
मुस्लिम नेताओं का विरोध
मुस्लिम संगठनों ने इस प्रावधान का विरोध किया है. उनका तर्क है कि इस्लाम की बुनियादी मान्यताओं के तहत अल्लाह के अलावा किसी और की पूजा नहीं की जा सकती.
हैदराबाद से लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इसका विरोध करते हुए कहा था, “जब आप ‘जन गण मन’ गाते हैं, तो उसमें आपको क्या दिखाई देता है? आपको यह देश और इसके लोग दिखाई देते हैं. जब आप ‘वंदे मातरम्’ गाते हैं, तो इसमें देवी-देवताओं की पूजा शामिल है.”
”अब आप उन स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में क्या कहेंगे, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी? ‘जन गण मन’ लोगों के लिए लिखा गया था. मेरा मानना है कि 1950 में राजेंद्र प्रसाद ने एक बड़ी ग़लती की. उन्होंने बिना किसी औपचारिक प्रस्ताव के इसे ‘राष्ट्रीय गीत’ घोषित कर दिया, जबकि इसके लिए एक प्रस्ताव पारित किया जाना चाहिए था. ‘राष्ट्रीय गीत’ की परिभाषा कहीं भी नहीं दी गई है. केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 का उल्लंघन कर रही है.” दरअसल, मोदी सरकार ने जब संसद में महज 15 मिनट की चर्चा के बाद यह विधेयक पारित कराया, तब भी विपक्षी सांसदों ने इसका विरोध किया था.
द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) की सांसद के. कनिमोई ने बीजेपी पर राष्ट्रवाद की आड़ में हिंदुत्व का एजेंडा लाने का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा था कि यह क़ानून “फ़ेडरलिज़म के ख़िलाफ़” है और राष्ट्रवाद को क़ानून के ज़रिए थोपा नहीं जा सकता.
1937 में जब कांग्रेस, जिसका नेतृत्व उस समय जवाहरलाल नेहरू कर रहे थे, ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाने को लेकर रवींद्रनाथ टैगोर से सलाह ली थी, तो टैगोर ने कहा था कि एकेश्वरवाद में विश्वास रखने वाले लोग, जैसे मुसलमान और ब्रह्म समाज के अनुयायी, इसके बाद के पदों पर आपत्ति कर सकते हैं, क्योंकि उनमें देवी दुर्गा का आह्वान किया गया है.
उन्होंने नेहरू को सलाह दी थी कि राष्ट्रीय गीत के रूप में केवल पहले दो पदों को रखा जाए, क्योंकि उनमें मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन है. इस बात का उल्लेख पत्रकार और लेखक नीलांजन मुखोपाध्यान ने फ्रंटलाइन में 14 अगस्त को प्रकाशित हुए अपने एक लेख में किया है.
ग़ैर बीजेपी शासित तमिलनाडु और केरल ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वे केंद्र सरकार के आदेश का पालन नहीं करेंगे. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने घोषणा की थी कि राज्य का आधिकारिक गीत ‘तमिल थाई वाज़्थु’ तमिलनाडु में सभी सरकारी कार्यक्रमों और आधिकारिक समारोहों में सबसे पहले गाया जाएगा. वहीं, केरल की कांग्रेस सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘वंदे मातरम’ के सभी छह पद नहीं गाए जाएंगे. पिछले वर्षों की परंपरा के मुताबिक़ राज्य में स्वतंत्रता दिवस समारोह समेत सभी कार्यक्रमों में केवल पहले दो पद ही गाए जाएंगे.

