Joharlive Desk : झारखंड में कुछ गांव ऐसे हैं, जहां बड़ी संख्या में विधवा महिलाओं की मौजूदगी ने उन्हें एक अलग पहचान दे दी है। यह पहचान किसी उपलब्धि की नहीं, बल्कि उन सामाजिक और आर्थिक हालातों की कहानी है, जिन्होंने सैकड़ों महिलाओं से उनके जीवनसाथी छीन लिए। कहीं शराब की लत ने परिवारों को तबाह किया, तो कहीं बीमारी और पलायन ने घरों के चिराग बुझा दिए। हालांकि अब सरकारी योजनाओं, स्वयं सहायता समूहों और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से बदलाव की नई उम्मीद दिखाई देने लगी है।
ब्राम्बे: ‘विधवा गांव’ के नाम से मशहूर
रांची से महज 20 किलोमीटर दूर ब्राम्बे गांव की पहचान विकास, शिक्षा या खेती से नहीं, बल्कि एक ऐसे नाम से जुड़ गई जिसने पूरे गांव को परेशान कर रखा है। लोग इसे “विधवा गांव” कहकर पुकारते हैं। गांव में 200 से अधिक विधवा महिलाएं हैं। ग्रामीण मानते हैं कि वर्षों तक शराब की लत ने कई परिवारों को उजाड़ दिया और समय से पहले मौतों का कारण बनी। हालांकि अब तस्वीर बदल रही है। महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ रही हैं, रानी मिस्त्री का प्रशिक्षण ले रही हैं और आत्मनिर्भर बनने की राह पर हैं। ब्राम्बे आज अपनी पुरानी पहचान से बाहर निकलकर नई कहानी लिखने की कोशिश कर रहा है।
पलामू का धोदराही: बीमारी ने बढ़ाई विधवाओं की संख्या
पलामू जिले का धोदराही गांव आज एक दर्दनाक पहचान के साथ जी रहा है। गांव की गलियों में पुरुषों की मौजूदगी लगभग नदारद है। यहां ज्यादातर घरों में सिर्फ महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग नजर आते हैं। पिछले एक दशक में टीबी ने 20 से अधिक पुरुषों की जान ले ली, जिससे कई परिवार उजड़ गए। रोजगार की तलाश में पत्थर खदानों में गए मजदूर बीमारी की चपेट में आए और फिर कभी सामान्य जिंदगी में लौट नहीं सके। पति और बेटों को खो चुकी महिलाएं अब मजदूरी कर परिवार संभाल रही हैं। धोदराही की यह कहानी सिर्फ बीमारी की नहीं, बल्कि गरीबी, पलायन और टूटते परिवारों की भी कहानी है।
विधवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां
पति की मृत्यु के बाद अधिकांश महिलाओं के सामने आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं बचता। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य जैसी जरूरतें उनके लिए बड़ी चुनौती बन जाती हैं। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और कठिन हो जाती है, जहां रोजगार के अवसर सीमित हैं। ऐसे में सरकारी योजनाएं उनके लिए महत्वपूर्ण सहारा बनती हैं।
झारखंड सरकार की प्रमुख योजनाएं –
1. राज्य विधवा पुनर्विवाह प्रोत्साहन योजना : इस योजना के तहत पुनर्विवाह करने वाली पात्र विधवा महिला को 2 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है। योजना का लाभ लेने के लिए महिला का झारखंड की मूल निवासी होना और विवाह की तिथि से एक वर्ष के भीतर आवेदन करना जरूरी है। सरकारी कर्मचारी, पेंशनभोगी और आयकरदाता महिलाएं इस योजना के लिए पात्र नहीं हैं।
2. सर्वजन पेंशन योजना (विधवा पेंशन) : इस योजना के तहत पात्र विधवा महिलाओं को प्रति माह 1,000 रुपये पेंशन दी जाती है। योजना का लाभ 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र की झारखंड निवासी महिलाओं को मिलता है, बशर्ते वे किसी अन्य पेंशन योजना का लाभ नहीं ले रही हों।
3. बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर आवास योजना : इस योजना के तहत जरूरतमंद विधवा और बेसहारा महिलाओं को घर निर्माण के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है। मैदानी क्षेत्रों में 1.20 लाख रुपये और पहाड़ी क्षेत्रों में 1.30 लाख रुपये की मदद मिलती है। योजना का लाभ 21 वर्ष से अधिक उम्र की उन महिलाओं को मिलता है जिनकी मासिक आय 6,000 रुपये से कम हो और उनके पास पक्का मकान न हो।
विधवाओं के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कौन सी योजनाएं चल रही है –
1. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना (IGNWPS) : इस योजना केंद्र सरकार की एक महत्वपूर्ण योजना है, जिसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर विधवा महिलाओं को मासिक आर्थिक सहायता प्रदान करना है। इस योजना का लाभ 40 से 79 वर्ष आयु की गरीबी रेखा (बीपीएल) से नीचे जीवन यापन करने वाली विधवा महिलाओं को मिलता है। इसके तहत ₹300 से ₹500 प्रतिमाह पेंशन दी जाती है, जबकि कई राज्यों में सरकार अपनी ओर से अतिरिक्त राशि भी जोड़ती है।
2. राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना (NFBS) : इस योजना का उद्देश्य परिवार के मुख्य कमाऊ सदस्य की मृत्यु के बाद आश्रितों को आर्थिक सहायता प्रदान करना है। यदि 18 से 59 वर्ष आयु के कमाऊ सदस्य की मृत्यु हो जाती है, तो आश्रित विधवा या परिवार को सरकार की ओर से ₹30,000 की एकमुश्त सहायता राशि दी जाती है।
3. प्रधानमंत्री आवास योजना – ग्रामीण / शहरी (PMAY) : इस योजना का उद्देश्य बेघर और कच्चे मकानों में रहने वाली महिलाओं को पक्का घर उपलब्ध कराना है। इस योजना के तहत पात्र विधवा महिलाओं को घर निर्माण के लिए मैदानी क्षेत्रों में ₹1.20 लाख और पहाड़ी क्षेत्रों में ₹1.30 लाख तक की आर्थिक सहायता दी जाती है।
4. नारी आर्थिक सशक्तिकरण योजना : इस योजना का उद्देश्य अनुसूचित जाति (एससी) और एकल महिलाओं, विशेषकर विधवाओं को स्वरोजगार के लिए सक्षम बनाना है। इसके तहत महिलाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है और आय बढ़ाने वाली गतिविधियों के लिए आर्थिक एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
5. अन्नपूर्णा योजना : इस योजना का उद्देश्य ऐसी बुजुर्ग और बेसहारा विधवा महिलाओं को सहायता प्रदान करना है, जिन्हें किसी पेंशन योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है। इस योजना के तहत पात्र वृद्ध महिलाओं और अन्य लाभार्थियों को हर महीने 10 किलो खाद्यान्न (अनाज) निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है।
बदलाव की ओर बढ़ते कदम
ब्राम्बे और धोदराही जैसे गांवों की कहानियां यह बताती हैं कि विधवा महिलाओं की बढ़ती संख्या केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का परिणाम है। हालांकि सरकारी योजनाएं, स्वयं सहायता समूह और कौशल विकास कार्यक्रम इन महिलाओं को नया सहारा दे रहे हैं। चुनौती अभी भी बड़ी है, लेकिन झारखंड के कई गांवों में महिलाएं अब केवल मदद की प्रतीक्षा नहीं कर रहीं, बल्कि अपने दम पर नई पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
Also Read : दिल्ली जाने की अटकलों पर लगा विराम, शनि शिंगणापुर धाम गए सीएम हेमंत सोरेन

