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    Home»जोहार ब्रेकिंग»फादर्स डेः झारखंड के इन पांच पिताओं में है कुछ खास, दो नाम चौंकाएंगे
    जोहार ब्रेकिंग

    फादर्स डेः झारखंड के इन पांच पिताओं में है कुछ खास, दो नाम चौंकाएंगे

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyJune 21, 2026Updated:June 21, 2026No Comments5 Mins Read9
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    Joharlive Desk : किसी भी बड़ी सफलता के पीछे सिर्फ मेहनत करने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि उसके साथ खड़े वे लोग भी होते हैं, जो हर मुश्किल में उसका हौसला बढ़ाते हैं। पिता भी ऐसी ही एक मजबूत नींव होते हैं, जिनके संस्कार, संघर्ष और मार्गदर्शन बच्चों को ऊंचाइयों तक पहुंचाते हैं। झारखंड की धरती ने ऐसे कई पिता दिए हैं, जिनके बच्चों ने देश-दुनिया में नाम कमाया और अपने राज्य का गौरव बढ़ाया। इनमें झारखंड आंदोलन के पुरोधा शिबू सोरेन और भारतीय क्रिकेट के महान कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के पिता पान सिंह धोनी प्रमुख हैं। आइए जानते हैं इन दोनों पिताओं की प्रेरणादायक कहानी।

    शिबू सोरेन : संघर्ष की विरासत देने वाले पिता

    झारखंड आंदोलन के सबसे बड़े चेहरों में शामिल शिबू सोरेन ने अपना पूरा जीवन आदिवासियों, वंचितों और झारखंड की पहचान के लिए संघर्ष करते हुए बिताया। राजनीति में उनके लंबे संघर्ष और जनसेवा की भावना का असर उनके परिवार पर भी पड़ा। उनके बेटे हेमंत सोरेन ने पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई और झारखंड के मुख्यमंत्री बने। शिबू सोरेन ने केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और संवेदनशील इंसान बनने की सीख अपने बेटे को दी। यही कारण है कि हेमंत सोरेन आज राज्य की राजनीति के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं। शिबू सोरेन की विरासत सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक संघर्ष और जनसेवा की भी विरासत है, जिस पर झारखंड को गर्व है।

    पान सिंह धोनी : सादगी और अनुशासन की मिसाल

    महेंद्र सिंह धोनी को दुनिया एवं भारत के सबसे सफल क्रिकेट कप्तानों में गिनती की जाती है, लेकिन उनकी सफलता की कहानी में उनके पिता पान सिंह धोनी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उत्तराखंड से रोजगार की तलाश में झारखंड आए पान सिंह ने एक साधारण नौकरी करते हुए परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा और सपनों से कभी समझौता नहीं किया। शुरुआती दिनों में क्रिकेट को लेकर उनके मन में संदेह जरूर था, लेकिन बेटे की लगन और प्रतिभा देखकर उन्होंने पूरा सहयोग दिया। पान सिंह धोनी ने अपने बेटे को अनुशासन, मेहनत और जमीन से जुड़े रहने का संस्कार दिया। यही वजह है कि विश्व क्रिकेट में अपार सफलता हासिल करने के बावजूद महेंद्र सिंह धोनी अपनी सादगी और विनम्रता के लिए जाने जाते हैं। उनकी सफलता के पीछे पिता के त्याग और संघर्ष की बड़ी भूमिका रही है।

    सलिमा टेटे के पिता : संघर्ष के बीच बेटी के सपनों को दिया सहारा

    सिमडेगा जिले के बड़कीछापर गांव में रहने वाले सलिमा टेटे के पिता एक साधारण किसान रहे हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, लेकिन उन्होंने अपनी बेटी की खेल प्रतिभा को बचपन में ही पहचान लिया था। गांव में उपलब्ध सीमित संसाधनों के बीच भी उन्होंने सलिमा को हॉकी खेलने के लिए प्रोत्साहित किया और कभी हिम्मत नहीं हारने दी। कई बार आर्थिक परेशानियां आईं, लेकिन उन्होंने बेटी के अभ्यास और खेल को रुकने नहीं दिया। पिता के इसी भरोसे और प्रोत्साहन ने सलिमा को राष्ट्रीय टीम तक पहुंचाया। आज जब सलिमा भारतीय महिला हॉकी टीम का नेतृत्व करती हैं, तब उनकी सफलता में पिता का संघर्ष और विश्वास साफ दिखाई देता है। उनकी कहानी बताती है कि सपनों को पूरा करने के लिए संसाधनों से ज्यादा जरूरी परिवार का साथ और विश्वास होता है।

    प्रेम गुप्ता : बेटी की खुशी को समाज से ऊपर रखने वाले पिता

    रांची के व्यवसायी प्रेम गुप्ता उस समय पूरे देश में चर्चा का विषय बन गए, जब उन्होंने अपनी बेटी साक्षी गुप्ता के तलाक के फैसले का खुले दिल से समर्थन किया। जहां समाज में तलाक को अक्सर असफलता माना जाता है, वहीं प्रेम गुप्ता ने बेटी की घर वापसी को उत्सव में बदल दिया। वे बैंड-बाजे के साथ बेटी को ससुराल से वापस घर लेकर आए और यह संदेश दिया कि बेटी की खुशी और सम्मान सबसे महत्वपूर्ण है। उनका मानना था कि गलत रिश्ते में रहने से बेहतर है कि बेटी आत्मसम्मान के साथ जीवन जिए। उनके इस कदम ने समाज में बेटियों के अधिकार और परिवार के समर्थन को लेकर नई बहस शुरू कर दी।

    रेप पीड़िता बेटी के लिए आठ साल तक केस लड़नेवाले पिता

    रांची के एक छोटे से गाँव बेड़ो में, रंजीत नाम के एक किसान ने बेटी के न्याय के लिए ऐसा साहस दिखाया, जो आज मिसाल बन चुका है। 13 वर्षीय बेटी के साथ हुए अपराध के बाद जब समाज ने समझौते का दबाव बनाया, तब रंजीत ने हर विरोध को नजरअंदाज कर न्याय की लड़ाई चुनी। साधारण किसान होने के बावजूद उन्होंने गांव के दबाव, बहिष्कार और धमकियों की परवाह नहीं की। वह अपनी बेटी के साथ चट्टान की तरह खड़े रहे और उसे सच बोलने का हौसला दिया। अदालत में बेटी ने बहादुरी से अपनी बात रखी और दोषियों को सजा मिली। रंजीत की कहानी साबित करती है कि एक पिता का साहस और भरोसा बेटी की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।

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