वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के बीच हाल ही में हुई एक उच्च स्तरीय मुलाकात के साथ ही राज्य में एक बार फिर बड़े विवाद की आहट सुनाई दे रही है. इस मुलाकात के बाद वेदांता की तरफ से यह बात सामने आई है कि 13 साल पहले बंद हो चुकी विवादित नियमगिरि बॉक्साइट खनन परियोजना को दोबारा खोलने पर चर्चा हुई है.
मुख्यमंत्री कार्यालय के हवाले से यह भी कहा गया है कि राज्य सरकार निवेश और रोजगार पैदा करने वाली ऐसी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए हरसंभव सहयोग देगी. लेकिन यह मुलाकात और चर्चा डोंगरिया कोंध समुदाय के लिए उनके अस्तित्व पर एक बहुत बड़ा हमला है, क्योंकि जिस नियमगिरि पहाड़ को अपनी आस्था, संस्कृति और ‘नियम राजा’ का घर मानने वाले आदिवासियों ने अपनी अटूट एकता से बचाया था, वहाँ एक बार फिर इस कंपनी की काली नजरें गड़ चुकी हैं.
नियमगिरि संघर्ष
नियमगिरि और डोंगरिया कोंध आदिवासियों का यह संघर्ष न्याय और अधिकारों की एक लंबी दास्तान है. साल 2003 में वेदांता ने कालाहांडी के लांजीगढ़ में अपनी एल्युमिना रिफाइनरी चलाने के लिए नियमगिरि की पहाड़ियों में मौजूद करीब 8 करोड़ टन बॉक्साइट पर अपनी नजरें गड़ाई थीं.
कंपनी और ओडिशा माइनिंग कॉरपोरेशन ने मिलकर आदिवासियों के इस पवित्र स्थल को उजाड़ने की पूरी योजना बना ली थी. लेकिन साल 2010 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इस विनाशकारी परियोजना की वन मंजूरी देने से इनकार कर दिया था.
इसके बाद मामला देश की सर्वोच्च अदालत में पहुँचा, जहाँ 18 अप्रैल 2013 को एक ऐतिहासिक फैसला आया. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदिवासियों के धार्मिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक अधिकारों का फैसला करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ वहाँ की ग्राम सभाओं को है.
अदालत के इस आदेश के बाद रायगढ़ा और कालाहांडी जिलों की 12 की 12 ग्राम सभाओं ने एकजूट होकर एकमत से वेदांता के खनन प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया था. ग्राम सभाओं के इस कड़े विरोध के बाद जनवरी 2014 में केंद्र सरकार को मजबूरन इस परियोजना की वन मंजूरी रद्द करनी पड़ी थी. यहाँ तक कि 2016 में जब कंपनी ने ओडिशा माइनिंग कॉरपोरेशन के जरिए दोबारा ग्राम सभाएं कराने की साजिश रची, तो सुप्रीम कोर्ट ने उस मांग को भी खारिज कर आदिवासियों के हक पर मुहर लगाई थी.
आदिवासियों के अस्तित्व पर नया खतरा?
अब एक बार फिर वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल और राज्य सरकार की मिलीभगत से नियमगिरि को दोबारा खोलने की सुगबुगाहट तेज हो गई है. वेदांता ओडिशा में करीब 1 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश का ढिंढोरा पीट रही है, जिसमें ढेंकनाल और रायगढ़ा की परियोजनाएं शामिल हैं. इसी मुनाफे की हवस के चलते कंपनी आदिवासियों के जीवन, उनके जल-जंगल-जमीन और संस्कृति को दांव पर लगाने के लिए फिर से सक्रिय हो गई है.
मुख्यमंत्री से मुलाकात के दौरान रोजगार के नाम पर आदिवासियों को बरगलाने की पुरानी चाल चली जा रही है, जबकि हकीकत यह है कि यह परियोजना डोंगरिया कोंध समुदाय के अस्तित्व को ही जड़ से मिटा देगी.
सवाल यह उठता है कि क्या 13 साल पहले 12 ग्राम सभाओं द्वारा नकारे गए और सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बंद हो चुके इस प्रस्ताव को कंपनी और सरकार मनमाने तरीके से फिर थोपना चाहती है? क्या आदिवासियों के पवित्र ‘नियम राजा’ और उनकी धार्मिक आस्था को उजाड़ने की साजिश फिर से रची जा रही है?
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