भाजपा नेता और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर सरकार से स्थिति साफ करने की मांग की है. उनका कहना है कि आम लोगों को यह जानने का अधिकार है कि सरकार इस शब्द के जरिए किन लोगों या किस तरह की विचारधारा की बात कर रही है.
अमरिंदर सिंह ने एक लेख में कहा कि ‘नक्सल’ जैसे गंभीर शब्दों का इस्तेमाल सोच-समझकर किया जाना चाहिए. उनका तर्क है कि जब किसी बड़े राजनीतिक मंच से कोई शब्द सामने आता है और बाद में राजनीतिक दल, टीवी चैनल और सोशल मीडिया उसे बार-बार दोहराते हैं, तो उसका असर और मतलब मूल बयान से काफी आगे निकल सकता है.
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि देश की सुरक्षा और नागरिकों की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने की जरूरत नहीं है. दोनों के बीच संतुलन बनाकर चलना संभव है और यही लोकतंत्र की मजबूती का आधार भी होना चाहिए.
ज्ञात हो, प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से अपने संबोधन में कहा था कि हथियारबंद नक्सलवाद काफी कमजोर हुआ है, लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ अब भी मौके की तलाश में है. प्रधानमंत्री ने ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने की बात कही थी.
अमरिंदर सिंह का कहना है कि लाल किले से कही गई बातों का देश में खास महत्व होता है. इसलिए सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ‘दिमागी नक्सल’ की उसकी परिभाषा क्या है और इस श्रेणी में किन लोगों को रखा जा रहा है. प्रधानमंत्री ने युवाओं के हालिया प्रदर्शनों को सीधे तौर पर ‘दिमागी नक्सलवाद’ नहीं बताया था. हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि राजनीतिक बयानों का असर कई बार उनके मूल संदर्भ से आगे बढ़ जाता है.
उनके मुताबिक, अगर ‘दिमागी नक्सल’ का मतलब ऐसे लोग हैं जो जानबूझकर माओवादी हिंसा को बढ़ावा देते हैं, तो सरकार को इसे साफ तौर पर बताना चाहिए. ऐसे मामलों में कानून के तहत कार्रवाई भी होनी चाहिए.
सरकार से सवाल करना देश विरोधी नहीं
अमरिंदर सिंह ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना और उसकी आलोचना करना नागरिकों का अधिकार है. संविधान और कानून का पालन हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि लोगों को सरकार के हर फैसले का बिना सवाल किए समर्थन करना होगा.
उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति संगठित हिंसा को बढ़ावा देता है या हिंसक गतिविधियों में शामिल होता है, तो उसके खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन सरकार की तीखी आलोचना करने, अलग राय रखने या किसी अलोकप्रिय विचार को रखने मात्र से किसी व्यक्ति को उसी श्रेणी में रखना उचित नहीं है.
हिंसा और असहमति के बीच फर्क है
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में असली विभाजन सरकार और विपक्ष, वामपंथ और दक्षिणपंथ या राष्ट्रवादी और आलोचक के बीच नहीं होना चाहिए. असली फर्क उन लोगों के बीच होना चाहिए जो कानून के दायरे में रहकर अपनी असहमति जाहिर करते हैं और उन लोगों के बीच जो जानबूझकर हिंसा को बढ़ावा देते हैं.
उन्होंने साफ कहा कि नागरिक स्वतंत्रता का इस्तेमाल हिंसा को सही ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता. लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर वैध असहमति और सरकार की आलोचना की गुंजाइश भी खत्म नहीं की जानी चाहिए.
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