सरकार की महत्वाकांक्षी एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल (EMRS) योजना का उद्देश्य आदिवासी बच्चों को मुफ्त आवासीय शिक्षा, पौष्टिक भोजन, सुरक्षित छात्रावास और बेहतर भविष्य देना है. लेकिन मणिपुर के चुराचांदपुर जिले के जेइखुलुआंग लोकतक प्रोजेक्ट स्थित EMRS से सामने आई तस्वीरों ने इस पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
आरोप है कि स्कूल में खाद्यान्न का स्टॉक खत्म हो गया, जिसके कारण छात्रावास में रहने वाले बच्चों को कई दिनों तक पर्याप्त भोजन नहीं मिला. कुछ दिनों में नाश्ता तक नहीं दिया जा सका. कई बच्चों की तबीयत बिगड़ने की खबरें सामने आईं, जबकि कुछ अभिभावक अपने बच्चों को हॉस्टल से वापस घर ले गए. शुरुआती रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि उपलब्ध खाद्यान्न वास्तविक छात्र और कर्मचारियों की संख्या के मुकाबले पर्याप्त नहीं था.
करोड़ों का बजट, फिर भी बच्चे भूखे क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब केंद्र सरकार एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूलों पर हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रही है, तो मणिपुर के इस स्कूल में बच्चों के सामने भोजन का संकट कैसे खड़ा हो गया?
जनजातीय कार्य मंत्रालय के तहत संचालित नेशनल एजुकेशन सोसाइटी फॉर ट्राइबल स्टूडेंट्स (NESTS) के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 से प्रत्येक छात्र पर ₹1.47 लाख प्रति वर्ष खर्च का प्रावधान किया गया है. यह राशि पहले ₹1.9 लाख थी, जिसे बढ़ाकर लगभग 35 प्रतिशत अधिक किया गया.
इस राशि में केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि भोजन, छात्रावास, यूनिफॉर्म, किताबें, स्वास्थ्य सुविधाएं, खेलकूद, बिजली, पानी और विद्यालय के संचालन तक का खर्च शामिल है.
NESTS के वित्तीय मानकों के अनुसार, प्रत्येक छात्र के भोजन (मेस) पर ही लगभग ₹25,279 प्रति वर्ष खर्च निर्धारित है. यानी सरकार ने कागजों पर यह सुनिश्चित किया है कि किसी भी छात्र को भोजन की कमी का सामना न करना पड़े.
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है. यदि प्रति छात्र भोजन के लिए अलग बजट निर्धारित है, तो आखिर स्कूल में खाद्यान्न का स्टॉक खत्म कैसे हो गया? क्या राशन की आपूर्ति समय पर नहीं हुई? क्या आवंटित राशि समय पर जारी नहीं हुई? क्या स्कूल प्रशासन ने समय रहते अतिरिक्त खाद्यान्न की मांग नहीं की? या फिर निगरानी व्यवस्था पूरी तरह विफल रही?
स्कूल बनाने पर करोड़ों, संचालन पर भी बड़ा खर्च
केंद्र सरकार एक नए EMRS के निर्माण पर सामान्य क्षेत्रों में लगभग ₹40 करोड़ और दुर्गम या विशेष क्षेत्रों में ₹48 करोड़ तक खर्च करती है. इसके बाद हर वर्ष विद्यालय के संचालन के लिए अलग से आवर्ती अनुदान दिया जाता है, ताकि विद्यार्थियों को भोजन, आवास और अन्य सुविधाएं निर्बाध मिलती रहें. यानी यह कोई संसाधनों की कमी वाली योजना नहीं है. सरकार लगातार बजट बढ़ा रही है.
बजट के आंकड़े क्या कहते हैं?
पिछले कुछ वर्षों में EMRS योजना का बजट लगातार बढ़ा है.
- 2022-23: लगभग ₹2,000 करोड़
- 2023-24: लगभग ₹2,472 करोड़
- 2024-25: लगभग ₹4,749 करोड़
- 2025-26: ₹5,300 करोड़ से अधिक का प्रावधान (संचालन मद)
इसके अलावा नए विद्यालयों के निर्माण के लिए अलग पूंजीगत बजट उपलब्ध कराया जाता है.
स्पष्ट है कि सरकार इस योजना पर बड़े पैमाने पर निवेश कर रही है. ऐसे में चुराचांदपुर की घटना यह सवाल खड़ा करती है कि समस्या बजट की नहीं, बल्कि बजट के प्रबंधन और जवाबदेही की है.
आदिवासी अभिभावकों का भरोसा दांव पर
EMRS की सबसे बड़ी ताकत उसका आवासीय मॉडल है. दूरदराज के गांवों से माता-पिता अपने बच्चों को इसलिए भेजते हैं क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि सरकार उनकी पढ़ाई के साथ-साथ भोजन और सुरक्षा की भी जिम्मेदारी निभाएगी.
लेकिन यदि किसी स्कूल में बच्चे भूख की शिकायत करें, अभिभावकों को उन्हें वापस घर ले जाना पड़े और भोजन का स्टॉक खत्म होने की बात सामने आए, तो यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं रहती. इससे पूरी योजना की विश्वसनीयता प्रभावित होती है.
अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल जांच पूरी करना नहीं, बल्कि यह विश्वास लौटाना है कि देश के किसी भी एकलव्य विद्यालय में दोबारा किसी बच्चे को भोजन के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा.
Also Read : झारखंड : JPSC-JSSC आंदोलन के बीच सोनम वांगचुक से देवेंद्र नाथ महतो की बात, आग्रह पर ग्रहण किया जल

