Ranchi : झारखंड की पारंपरिक कला, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली है। राज्य के 11 उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग मिलने से झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को नया सम्मान मिला है। अब तक राज्य में केवल सोहराय पेंटिंग को ही जीआई टैग प्राप्त था, लेकिन अब कई अन्य पारंपरिक उत्पाद भी इस सूची में शामिल हो गए हैं। इससे हजारों कारीगरों, बुनकरों और किसानों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है।
जीआई टैग मिलने वाले उत्पादों में भगैया साड़ी और फैब्रिक, कुचाई सिल्क साड़ी, केसरिया कलाकंद, डोकरा क्राफ्ट, दुमका चादर और बडोनी पपेट्स, मुंडा ज्वेलरी, झारखंड बांस शिल्प, तसर सिल्क एवं साड़ियां, जादोपटिया पेंटिंग, पांची साड़ी और फैब्रिक तथा झारखंड के अन्य पारंपरिक हस्तशिल्प शामिल हैं।
कुचाई सिल्क को मिली विशेष पहचान
सरायकेला-खरसावां और संताल क्षेत्र के आदिवासी समुदायों द्वारा तैयार की जाने वाली कुचाई सिल्क को जीआई टैग मिलने को बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। झारक्राफ्ट ने वर्ष 2023 में इसके लिए आवेदन किया था। इसके बाद विशेषज्ञों की टीम ने उत्पाद की गुणवत्ता, इतिहास और भौगोलिक विशेषताओं का अध्ययन किया।
चेन्नई से आई विशेषज्ञ टीम ने रांची में प्रस्तुति लेकर पूरे दस्तावेजों की जांच की। लंबी प्रक्रिया और मूल्यांकन के बाद किसी भी पक्ष की ओर से आपत्ति दर्ज नहीं की गई, जिसके बाद इसे अंतिम मंजूरी मिल गई।
सदियों पुरानी कला को मिलेगा नया जीवन
विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग मिलने से झारखंड की कई पारंपरिक कलाएं और शिल्प फिर से जीवंत हो सकेंगे। वर्षों से इन उत्पादों को तैयार करने वाले कारीगरों को अब उनकी मेहनत की उचित पहचान मिलेगी। साथ ही इनकी मांग देश और विदेश के बाजारों में भी बढ़ने की संभावना है।
सोहराय पेंटिंग को सबसे पहले मिला था जीआई टैग
झारखंड में सबसे पहले सोहराय पेंटिंग को 14 सितंबर 2021 को जीआई टैग मिला था। यह सम्मान ट्राइफेड की पहल पर मिला था। सोहराय कला की पहचान देश-विदेश तक पहुंच चुकी है और अब अन्य उत्पाद भी इसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं।
पांच और उत्पाद कतार में
झारक्राफ्ट राज्य के पांच अन्य विशिष्ट उत्पादों को भी जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया में जुटा है। इनमें सिमडेगा की मीठी इमली, सरायकेला-कुचाई हल्दी और सिमडेगा का बिरू गमछा प्रमुख हैं। इन उत्पादों की जांच और मूल्यांकन प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। कई उत्पादों के लिए जर्नल प्रकाशन भी हो चुका है।
10 साल तक मान्य रहेगा जीआई टैग
जीआई टैग मिलने के बाद यह मान्यता 10 वर्षों तक प्रभावी रहती है। इसके बाद इसका नवीनीकरण कराया जा सकता है। टैग प्राप्त करने के लिए उत्पाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विशिष्टता और भौगोलिक संबंधों के प्रमाण प्रस्तुत करने होते हैं। सभी मानकों पर खरा उतरने के बाद ही यह मान्यता दी जाती है।
कारीगरों और किसानों को होगा सीधा फायदा
जीआई टैग मिलने से उत्पादों की ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी और नकली उत्पादों पर रोक लगेगी। इससे किसानों, बुनकरों और शिल्पकारों को उनके उत्पादों की बेहतर कीमत मिल सकेगी। साथ ही राज्य सरकार और विभिन्न एजेंसियां इन उत्पादों के प्रचार-प्रसार में भी मदद करेंगी, जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
देश में 650 से अधिक उत्पादों को मिल चुका है जीआई टैग
भारत में जीआई टैग पाने वाला पहला उत्पाद दार्जिलिंग चाय है। इसके अलावा मिथिला मखाना, बनारसी साड़ी, कांचीपुरम सिल्क, मैसूर सिल्क, तिरुपति लड्डू, रसोगुल्ला और कड़कनाथ मुर्गा जैसे 650 से अधिक उत्पादों को यह सम्मान मिल चुका है।
क्या होता है जीआई टैग?
जीआई यानी भौगोलिक संकेतक एक विशेष पहचान है, जो किसी ऐसे उत्पाद को दी जाती है जिसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशेषता किसी खास क्षेत्र से जुड़ी होती है। यह एक प्रकार का बौद्धिक संपदा अधिकार है, जो उत्पाद के नाम और पहचान की कानूनी सुरक्षा करता है। इससे कोई दूसरा व्यक्ति या संस्था उस उत्पाद के नाम का गलत उपयोग नहीं कर सकती।
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