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    Home»जोहार ब्रेकिंग»झारखंड: 11 उत्पादों को मिला GI टैग, क्या और किसको होगा फायदा ?
    जोहार ब्रेकिंग

    झारखंड: 11 उत्पादों को मिला GI टैग, क्या और किसको होगा फायदा ?

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyJuly 2, 2026Updated:July 2, 2026No Comments3 Mins Read3
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    मुस्कान चौधरी

    झारखंड की पारंपरिक कला, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों को अब राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल रही है. पहले राज्य की सिर्फ सोहराय पेंटिंग को जीआई टैग मिला था, लेकिन अब 11 उत्पाद इस सूची में शामिल हो चुके हैं. इनमें से चार उत्पादों को जीआई टैग दिलाने में नाबार्ड ने अहम योगदान दिया है. इससे राज्य के कारीगरों, शिल्पकारों और स्थानीय उत्पादों को नए बाजार और बेहतर आर्थिक अवसर मिलने की उम्मीद है.

    जीआई टैग मिलने वाले उत्पादों में भगैया साड़ी और फैब्रिक, कुचाई सिल्क साड़ी, केसरिया कलाकंद, डोकरा क्राफ्ट, दुमका चादर और बडोनी पपेट्स, मुंडा ज्वेलरी, झारखंड बांस शिल्प, तसर सिल्क एवं साड़ियां, जादोपटिया पेंटिंग, पांची साड़ी और फैब्रिक तथा झारखंड के अन्य पारंपरिक हस्तशिल्प शामिल हैं.

    क्या होता है जीआई टैग?

    जीआई यानी भौगोलिक संकेतक एक विशेष पहचान है, जो किसी ऐसे उत्पाद को दी जाती है जिसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशेषता किसी खास क्षेत्र से जुड़ी होती है. यह एक प्रकार का बौद्धिक संपदा अधिकार है, जो उत्पाद के नाम और पहचान की कानूनी सुरक्षा करता है. इससे कोई दूसरा व्यक्ति या संस्था उस उत्पाद के नाम का गलत उपयोग नहीं कर सकती. इसे चेन्नई में स्थित भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री द्वारा वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय (DPIIT) के अंतर्गत जारी किया जाता है. जीआई टैग के कई फायदे होते हैं : 

    • उत्पाद की कानूनी सुरक्षा: यह टैग सुनिश्चित करता है कि कोई अन्य व्यक्ति या क्षेत्र उस विशेष उत्पाद के नाम का गलत इस्तेमाल या नकल न करे. इसका उल्लंघन करने वालों पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है.
    • बाज़ार में विश्वसनीयता और प्रीमियम कीमत: उपभोक्ता प्रमाणित मूल उत्पाद पर भरोसा करते हैं, जिससे उत्पादकों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में अपने उत्पाद की बेहतर कीमत मिल पाती है. 
    • स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार को बढ़ावा: यह ग्रामीण आय को बढ़ाता है, पारंपरिक कौशल को संरक्षित करता है और स्थानीय स्तर पर कारीगरों को सशक्त बनाता है.
    • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में आसानी: टैग मिलने से उत्पाद के निर्यात को बढ़ावा मिलता है और विश्व स्तर पर उसकी विशिष्ट पहचान बनती है.

      GI टैग किसी उत्पाद को पहचान और कानूनी सुरक्षा देता है, लेकिन इसके कुछ नुकसान भी हैं जैसे कि महंगी व जटिल प्रक्रिया, बिचौलियों का बोलबाला, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की कमी एवं नियमों की सख्ती तथा निगरानी का अभाव होना.

    देश में 650 से अधिक उत्पादों को मिल चुका है जीआई टैग

    जीआइ टैग की अवधारणा विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा 1994 में शुरू की गई थी. ओडिशा की काई चटनी भारत में जीआई टैग पाने वाले नवीनतम खाद्य पदार्थों में से एक है. भारत में जीआई टैग पाने वाला पहला उत्पाद दार्जिलिंग चाय है. खाद्य पदार्थों में मिथिला मखाना, पश्चिम बंगाल का रसोगुल्ला, मध्य प्रदेश का कड़कनाथ मुर्गा, बनारसी साड़ी, चंदेरी साड़ी, महाराष्ट्र सोलापुर की चद्दर, कर्नाटक का मैसूर सिल्क, तमिलनाडु का कांचीपुरम सिल्क, आंध्र प्रदेश के तिरुपति का लड्डू जैसे करीब देश के 650 से ज्यादा उत्पादों को जीआइ टैग मिल चुका है.
    जीआई टैग मिलने के बाद यह मान्यता 10 वर्षों तक प्रभावी रहती है.  इसके बाद इसका नवीनीकरण कराया जा सकता है.  टैग प्राप्त करने के लिए उत्पाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विशिष्टता और भौगोलिक संबंधों के प्रमाण प्रस्तुत करने होते हैं. सभी मानकों पर खरा उतरने के बाद ही यह मान्यता दी जाती है.

    सिर्फ देसी नहीं, विदेशी उत्पादों को भी मिला है जीआई टैग

    भारत में जीआई टैग सिर्फ अपने राज्यों के खास उत्पादों को ही नहीं, बल्कि कई मशहूर विदेशी उत्पादों को भी दिया गया है. इनमें स्कॉटलैंड की स्कॉच व्हिस्की, फ्रांस की शैम्पेन और कॉन्यैक, इटली का प्रोसियुट्टो डी परमा, मेक्सिको की टकीला और पेरू का पिस्को शामिल हैं.

    Also Read : ज़ूडियो-वेस्टसाइड के आर्किटेक्ट नोएल टाटा, अब वोल्टास को कहेंगे अलविदा

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