महंगाई ने आम आदमी के घर का पूरा बजट गड़बड़ा दिया है. सुबह दूध लेने से लेकर बाइक में पेट्रोल भराने तक और महीने का गैस सिलेंडर खरीदने तक, हर जरूरी चीज के लिए जेब पहले से ज्यादा ढीली करनी पड़ रही है.
रसोई का खर्च बढ़ रहा है, पेट्रोल-डीजल महंगा है और गैस सिलेंडर करीब 1,000 रुपये तक पहुंच चुका है. सितंबर की शुरुआत में ही 19 किलो वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर के दाम में करीब 9.50 से 11.50 रुपये तक की बढ़ोतरी हुई है. विमान ईंधन यानी ATF के दाम भी बढ़े हैं.
महंगाई की यह मार सिर्फ दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े शहरों तक सीमित नहीं है. झारखंड की राजधानी रांची में भी इसका सीधा असर लोगों की जेब पर दिख रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि मनमोहन सिंह सरकार के आखिरी दौर में जिन रोजमर्रा की चीजों पर आम आदमी कितना खर्च करता था और आज उन्हीं चीजों के लिए कितना पैसा देना पड़ रहा है?
पेट्रोल : 72 रुपये से बढ़कर रांची में 105-106 रुपये तक
मनमोहन सिंह सरकार के आखिरी दौर, यानी मई 2014 में दिल्ली में पेट्रोल की कीमत करीब 72 रुपये प्रति लीटर थी. आज रांची में पेट्रोल की कीमत करीब 105 से 106 रुपये प्रति लीटर के आसपास है. यानी जिस पेट्रोल के लिए 12 साल पहले करीब 72 रुपये खर्च करने पड़ते थे, उसके लिए आज 100 रुपये से ज्यादा देने पड़ रहे हैं. बाइक हो या कार, पेट्रोल का खर्च अब सीधे घर के महीने के बजट पर असर डाल रहा है.
डीजल: 55 रुपये से बढ़कर रांची में 100.89 रुपये
मई 2014 में दिल्ली में डीजल की कीमत करीब 55 रुपये प्रति लीटर थी. अब रांची में 1 सितंबर 2026 को डीजल की कीमत 100.89 रुपये प्रति लीटर दर्ज की गई. डीजल महंगा होने का असर सिर्फ गाड़ी मालिकों तक सीमित नहीं रहता.
ट्रक और मालवाहक गाड़ियों का खर्च बढ़ता है तो माल ढुलाई महंगी होती है. और जब माल ढुलाई महंगी होती है तो उसका असर सब्जी, अनाज, फल और दूसरी जरूरी चीजों की कीमतों तक पहुंचता है. यानी डीजल की बढ़ती कीमत का बिल आखिरकार आम आदमी ही चुकाता है.
दूध: 30-34 रुपये से बढ़कर 60 रुपये के पार
महंगाई की कहानी सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं है. इसका असर सुबह घर आने वाले दूध पर भी दिखता है. मनमोहन सरकार के आखिरी दौर के आसपास रांची में पैकेट दूध की कीमत करीब 30 से 34 रुपये प्रति लीटर के बीच थी. आज ब्रांड और वैरायटी के हिसाब से लोगों को करीब 60 रुपये या उससे अधिक प्रति लीटर खर्च करना पड़ रहा है. यानी एक सामान्य परिवार के लिए दूध का मासिक खर्च भी पहले के मुकाबले काफी बढ़ चुका है.
घरेलू गैस: रांची में करीब 1,000 रुपये का सिलेंडर
एलपीजी के दाम की तुलना करते समय सब्सिडी के अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है. साल 2014 में सब्सिडी वाले सिलेंडर 414 रुपये में मिलती थी.
फिलहाल रांची में 14.2 किलो वाले घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत करीब 1000 रूपये से अधिक है. यानी एक सामान्य परिवार के लिए रसोई चलाने का खर्च भी अब हजार रुपये के आसपास पहुंच गया है.
कमर्शियल LPG भी महंगा, होटल-ढाबों का खर्च बढ़ने की आशंका
सितंबर से 19 किलो वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमत में करीब 9.50 से 11.50 रुपये तक की बढ़ोतरी हुई है.
कमर्शियल सिलेंडर होटल, रेस्तरां और ढाबों में इस्तेमाल होता है. ऐसे में गैस महंगी होने का असर बाहर खाने-पीने के खर्च पर भी पड़ सकता है. आज कई जगहों पर 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमत 3,000 रुपये से अधिक पहुंच चुकी है. यह मनमोहन सरकार में करीब 1200 रूपये में मिलती थी.

झारखंड में भी महंगाई का जोरदार झटका
महंगाई का असर झारखंड में भी साफ दिखाई दिया है. मई 2026 में रांची समेत झारखंड के कई शहरों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई थी. रिपोर्ट के मुताबिक महज 11 दिनों के भीतर रांची में पेट्रोल करीब 7.38 रुपये और डीजल करीब 7.76 रुपये प्रति लीटर तक महंगा हुआ था.
इसका असर सिर्फ रांची तक सीमित नहीं रहा. धनबाद, जमशेदपुर, दुमका और देवघर समेत दूसरे शहरों में भी लोगों को बढ़ती कीमतों का सामना करना पड़ा.
एक नजर में तब और अब
चीज मनमोहन सरकार का आखिरी दौर – आज की स्थिति
पेट्रोल करीब 72 रुपये प्रति लीटर – करीब 105-106 रुपये प्रति लीटर या अधिक
डीजल करीब 55 रुपये प्रति लीटर – 100.89 रुपये प्रति लीटर या अधिक
दूध करीब 30-34 रुपये प्रति लीटर – करीब 50 रुपये या उससे अधिक
घरेलू LPG करीब 414 रुपये – करीब 1000 या अधिक रुपये
कमर्शियल LPG करीब 1,200 रुपये – 3,000 रुपये से अधिक, सितंबर में नई बढ़ोतरी
खर्च बढ़ा, लेकिन क्या कमाई भी उतनी बढ़ी?
रांची में पेट्रोल 100 रुपये के पार है. डीजल भी 100 रुपये प्रति लीटर के आसपास पहुंच चुका है. घरेलू गैस सिलेंडर करीब 1,000 रुपये का है और दूध के लिए भी पहले से कहीं ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है.
लेकिन असली सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि चीजें कितनी महंगी हुईं. सवाल यह है कि पिछले 12 साल में आम आदमी की कमाई उतनी बढ़ी भी है या नहीं, जितना उसका रोजमर्रा का खर्च बढ़ गया है?
क्योंकि महंगाई का असली आंकड़ा सरकारी रिपोर्ट में नहीं दिखता. वह उस घर के महीने के बजट में दिखता है, जहां महीने की शुरुआत में सैलरी आती है और सबसे पहले राशन, दूध, गैस, बच्चों की पढ़ाई और बाइक की टंकी में चली जाती है. और महीने के आखिर में सवाल सिर्फ एक बचता है—
खर्च तो लगातार बढ़ रहा है, लेकिन बचत आखिर बचेगी कितनी?
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