आप कोई मजेदार किस्सा पढ़ रहे हैं. चेहरे पर मुस्कान है. बात बिल्कुल सहज लग रही है. लेकिन कुछ पंक्तियां आगे बढ़ते ही अचानक लगता है कि लेखक मजाक नहीं कर रहा. वह तो हमारे ही समाज की तस्वीर सामने रख रहा है. और सबसे ज्यादा चुभने वाली बात यह होती है कि उस तस्वीर में कहीं न कहीं हम खुद भी दिखाई दे रहे हैं.
हरिशंकर परसाई की कलम का जादू कुछ ऐसा ही था. वह हंसाते थे, लेकिन उनकी हंसी का मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं था. वह हंसी के रास्ते ऐसी जगह पहुंचते थे, जहां पाठक को व्यवस्था, समाज और अपनी ही सोच से सवाल करना पड़ता था.
परसाई का एक चर्चित कथन है. “व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार कराता है. जीवन की विसंगतियों को सामने लाता है.” उनकी पूरी रचना यात्रा इस बात को सच साबित करती है. उन्होंने जिस चीज को गलत देखा, उस पर लिखा. जिस पाखंड को महसूस किया, उसे उजागर किया. और जिस व्यवस्था में आम आदमी पिसता दिखा, उस पर सवाल उठाया.
वह लेखक जिसकी कलम से बचना मुश्किल था
22 अगस्त 1924 को हरिशंकर परसाई का जन्म हुआ था. आगे चलकर उनका नाम हिंदी साहित्य में व्यंग्य का पर्याय बन गया. लेकिन परसाई सिर्फ इसलिए बड़े लेखक नहीं बने क्योंकि उन्होंने बहुत व्यंग्य लिखा. उनकी असली ताकत यह थी कि उन्होंने व्यंग्य का मतलब ही बदल दिया.
एक समय था जब व्यंग्य को हल्की-फुल्की हंसी और मनोरंजन से जोड़कर देखा जाता था. परसाई ने उसे समाज के गंभीर सवालों के बीच ला खड़ा किया. उन्होंने बताया कि हंसी भी सवाल पूछ सकती है. व्यंग्य भी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर सकता है. और एक साधारण सा किस्सा भी समाज की पूरी मानसिकता खोल सकता है.
परसाई की जिंदगी शुरू से ही सिर्फ किताबों और साहित्य के आसपास नहीं रही. महज 18 साल की उम्र में उन्होंने वन विभाग में नौकरी की. खंडवा में अध्यापन किया. जबलपुर में शिक्षक प्रशिक्षण लिया. निजी स्कूलों में भी काम किया. लेकिन एक समय ऐसा आया जब उन्होंने नौकरी छोड़कर स्वतंत्र लेखन का रास्ता चुन लिया.
1947 में यह फैसला अपने आप में बड़ा जोखिम था. स्वतंत्र लेखन में न कोई तय वेतन था और न भविष्य की कोई गारंटी. लेकिन परसाई ने साहित्य को ही अपना रास्ता बना लिया. जबलपुर से उन्होंने ‘वसुधा’ नाम की साहित्यिक पत्रिका निकाली. वह सिर्फ लिखते नहीं थे. साहित्य के लिए जगह भी बना रहे थे.
हंसाते-हंसाते बेचैन कर देते थे परसाई
“व्यंग्यकार का काम केवल हंसाना नहीं, बल्कि समाज की विसंगतियों को सामने लाना भी है.”
परसाई की सबसे खास बात यह थी कि उनका व्यंग्य किसी एक व्यक्ति को निशाना बनाकर खत्म नहीं हो जाता था. वह व्यक्ति के बहाने मानसिकता पर हमला करते थे. अगर कोई भ्रष्ट था, तो सवाल सिर्फ उस भ्रष्ट व्यक्ति पर नहीं था. सवाल उस व्यवस्था पर भी था, जो भ्रष्टाचार को पैदा करती है.
अगर कोई अंधविश्वास में फंसा था, तो परसाई की चिंता सिर्फ उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती थी. वह उस सोच पर सवाल उठाते थे, जो अंधविश्वास को बढ़ावा देती है. अगर राजनीति में अवसरवाद दिखा, तो उन्होंने उसके पीछे छिपे स्वार्थ को पकड़ लिया. यही वजह है कि उनका व्यंग्य पढ़ते हुए कई बार लगता है कि लेखक किसी एक समय की बात नहीं कर रहा. वह इंसानी प्रवृत्तियों की बात कर रहा है.
‘भोलाराम का जीव’: एक कहानी और पूरी व्यवस्था का चेहरा
परसाई की चर्चित रचना ‘भोलाराम का जीव’ को ही देखिए. कहानी में एक साधारण आदमी है. उसके जीवन और मृत्यु के बीच सरकारी व्यवस्था की फाइलें खड़ी हैं. कहानी पढ़ते हुए हंसी आती है. लेकिन यह हंसी उस व्यवस्था पर है, जहां आदमी से ज्यादा जरूरी कागज हो जाते हैं. यही परसाई की ताकत थी. वह एक साधारण घटना से व्यवस्था की असाधारण विडंबना निकाल लेते थे. ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’ में पुलिस व्यवस्था पर व्यंग्य है. ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ में लोकतंत्र के दावों और वास्तविकता के बीच का फर्क है. ‘प्रेमचंद के फटे जूते’ में दिखावे और सच्चाई का फर्क दिखाई देता है. और ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ में श्रद्धा, पाखंड और सामाजिक मानसिकता पर उनकी तीखी नजर दिखाई देती है.

शायद यही उनकी सबसे बड़ी सफलता थी. उनके पात्र किसी दूर की दुनिया के लोग नहीं लगते. वे हमारे आसपास दिखाई देते हैं. वह मध्यमवर्गीय आदमी, जो महीने की शुरुआत में सपने देखता है और महीने के अंत में हिसाब लगाता है. वह व्यक्ति, जो भ्रष्टाचार को कोसता है लेकिन अपना काम निकलवाने के लिए उसी व्यवस्था का सहारा भी लेता है. वह समाज, जो वैज्ञानिक सोच की बातें करता है लेकिन अंधविश्वास छोड़ नहीं पाता. परसाई ने इन विरोधाभासों को पकड़ा. उन्होंने पाठक को यह महसूस कराया कि समस्या सिर्फ बाहर नहीं है. हमारे भीतर भी है.
परसाई की भाषा में भारीपन नहीं था. वह सीधे पाठक से बात करते थे. उनके वाक्यों में अपनापन था. व्यंग्य में सहजता थी. और बात में ऐसी धार थी कि पाठक चाहकर भी उसे नजरअंदाज नहीं कर पाता था. यही वजह है कि उनकी रचनाएं सिर्फ साहित्य के विद्यार्थियों के लिए नहीं रहीं. आम पाठक भी उनसे जुड़ गया. वह कठिन बात को आसान भाषा में कहते थे. लेकिन आसान भाषा का मतलब आसान सवाल नहीं था.
साहित्य से सम्मान भी मिला, लेकिन सवाल पूछना नहीं छोड़ा
अखबार में उनका कॉलम ‘परसाई से पूछें’ भी इसी अंदाज का उदाहरण था. शुरुआत में पाठकों के सवाल हल्के-फुल्के और फिल्मी होते थे. लेकिन धीरे-धीरे बातचीत समाज और राजनीति तक पहुंच गई. यहां परसाई सिर्फ जवाब देने वाले लेखक नहीं थे. वह पाठकों की सोच को एक दिशा देने की कोशिश कर रहे थे. उन्होंने सवालों को छोटा नहीं होने दिया. एक सवाल से दूसरा सवाल पैदा किया. निजी चिंता से सामाजिक चिंता तक पहुंचाया. यही उनके लेखन की खासियत थी.
‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ के लिए 1982 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. यह सम्मान उस लेखक के लिए महत्वपूर्ण था, जिसने व्यंग्य को साहित्य की मुख्यधारा में गंभीर स्थान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. परसाई ने साबित किया कि व्यंग्य किसी को हंसाकर भूल जाने की चीज नहीं है. व्यंग्य समाज को आईना दिखा सकता है.
10 अगस्त 1995 को हरिशंकर परसाई इस दुनिया से चले गए. लेकिन उनकी रचनाएं नहीं गईं. आज भी जब कोई सरकारी दफ्तर में छोटी सी फाइल के लिए महीनों चक्कर लगाता है. जब कोई नेता बड़ी-बड़ी बातें करता है और जमीन पर तस्वीर अलग होती है. जब समाज पाखंड को परंपरा का नाम देता है. जब हम दूसरों की गलतियों पर हंसते हैं और अपनी सुविधा के लिए वही गलती दोहराते हैं. तब परसाई याद आते हैं. क्योंकि उन्होंने सिर्फ अपने समय की खबर नहीं लिखी थी. उन्होंने समाज की आदतों को लिखा था. और आदतें जल्दी नहीं बदलतीं. यही वजह है कि 22 अगस्त को हरिशंकर परसाई को याद करना सिर्फ एक लेखक की जयंती मनाना नहीं है. यह अपने समय को उनकी नजर से देखने का मौका भी है. परसाई की कलम हमें पहले हंसाती है. फिर चुप कर देती है. और आखिर में एक सवाल छोड़ जाती है. ” जिस व्यवस्था पर हम हंस रहे हैं. कहीं उसका हिस्सा हम खुद तो नहीं हैं.”
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