जोहार लाइव ब्यूरो
लाखों हिंदू परिवारों के लिए पितृपक्ष के दौरान गयाजी की यात्रा पूर्वजों को याद करने और उनकी शांति व मोक्ष के लिए धार्मिक अनुष्ठान करने से जुड़ी है. लेकिन गयाजी की अर्थव्यवस्था के लिए हर साल होने वाली यह तीर्थयात्रा कारोबार के लिहाज से साल का सबसे बड़ा सीजन साबित होता है.
गयाजी में पितृपक्ष शुरू होते ही शहर एक बार फिर बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं के स्वागत की तैयारी में जुट गया है. इस बाजार के आकार का अंदाजा पिछले साल के आंकड़ों से लगाया जा सकता है. वर्ष 2025 में स्थानीय कारोबारियों के अनुमान के मुताबिक, 16 दिनों के पितृपक्ष मेले से करीब 600 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ था. इसमें धार्मिक सामग्री, भोजन, ठहरने, परिवहन, दान-दक्षिणा और श्रद्धालुओं द्वारा की जाने वाली छोटी-बड़ी खरीदारी शामिल थी.
इस साल यह संभावित बाजार और बड़ा हो सकता है. पिछले चार वर्षों में पितृपक्ष के दौरान गयाजी आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या तेजी से बढ़ी है. साल 2022 में यह संख्या 9.40 लाख थी, जो 2023 में बढ़कर 29.89 लाख, 2024 में 30.59 लाख और 2025 में 34.79 लाख हो गई. इस साल प्रशासन और पर्यटन विभाग करीब 50 लाख श्रद्धालुओं के आने की तैयारी कर रहे हैं.
जाहिर है, पिंडदान के लिए आने वाला परिवार केवल धार्मिक अनुष्ठान पर ही खर्च नहीं करता, बल्कि उसे रहने की जगह, भोजन, स्थानीय परिवहन, पूजा सामग्री, कपड़े और दूसरी जरूरी चीजों की भी जरूरत होती है. कई परिवार पुजारी, वाहन और गाइड की सेवाएं लेते हैं और गयाजी व बोधगया के आसपास के अन्य धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर भी जाते हैं.
इससे एक अस्थायी लेकिन बड़ा स्थानीय आर्थिक तंत्र तैयार होता है, जिसमें होटल और रेस्तरां से लेकर फूल विक्रेता, बर्तन दुकानदार, पुजारी, ऑटो और ई-रिक्शा चालक, टैक्सी संचालक, टूर एजेंसियां, स्थानीय कारीगर और सड़क किनारे छोटे दुकानदार तक शामिल होते हैं.
2025 में 600 करोड़ रुपये का कारोबार बना बेंचमार्क
पितृपक्ष के बाजार के आकार का सबसे उपयोगी संकेत 2025 के मेले से मिलता है. स्थानीय व्यापारिक प्रतिनिधियों के अनुमान के मुताबिक, इस दौरान करीब 600 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ. यह अनुमान खर्च के कई अलग-अलग क्षेत्रों को मिलाकर तैयार किया गया था.
सबसे बड़े क्षेत्रों में भोजन भी शामिल था. स्थानीय व्यापारिक प्रतिनिधियों के मुताबिक, 2025 के मेले के दौरान श्रद्धालुओं ने भोजन पर करीब 90 से 100 करोड़ रुपये खर्च किए. रेस्तरां, छोटे भोजनालय, सड़क किनारे खाने की दुकानें, मिठाई की दुकानें, कैटरर और अन्य विक्रेताओं को बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं से फायदा हुआ.
पूजा सामग्री और बर्तनों के कारोबार का अनुमान 100 करोड़ रुपये से अधिक लगाया गया था. इसमें पिंडदान और श्राद्ध में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के साथ श्रद्धालु परिवारों द्वारा खरीदे जाने वाले बर्तन भी शामिल हैं. जौ का आटा, तिल, फूल, अगरबत्ती, मिट्टी के दीये और अन्य धार्मिक सामग्री की मांग बढ़ जाती है. पीतल के बर्तन भी काफी खरीदे जाते हैं. वर्ष 2025 में स्थानीय कारोबारियों ने पीतल की कीमत करीब 700 से 900 रुपये प्रति किलोग्राम बताई थी.
धार्मिक अर्थव्यवस्था केवल दुकानों तक सीमित नहीं रहती. पंडा और पंडित धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन और संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. उनकी सेवाओं में अलग-अलग वेदियों पर पिंडदान की व्यवस्था, पूजा-अनुष्ठान कराना और परिवारों को निर्धारित धार्मिक प्रक्रियाओं की जानकारी देना शामिल है. दक्षिणा और अन्य धार्मिक भुगतान भी इस मौसमी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.
स्थानीय व्यापारिक अनुमानों के मुताबिक, भोजन, पूजा सामग्री की खरीद और दान-दक्षिणा को मिलाकर इन क्षेत्रों का कुल कारोबार 200 करोड़ रुपये से अधिक रहा, हालांकि इन मदों का कोई आधिकारिक अलग-अलग हिसाब उपलब्ध नहीं है.
होटल, धर्मशाला और खाने-पीने के कारोबार को सीजन में बड़ा फायदा
ठहरने की व्यवस्था पितृपक्ष की अर्थव्यवस्था का एक और बड़ा हिस्सा है. 16 दिनों के इस दौरान होटल, गेस्ट हाउस, लॉज और धर्मशालाओं की मांग तेजी से बढ़ जाती है.
2025 में स्थानीय होटल और टूर एंड ट्रैवल क्षेत्र ने संयुक्त रूप से करीब 75 करोड़ रुपये के कारोबार का अनुमान लगाया था. हालांकि होटल कारोबार का आंकड़ा उद्योग की शुरुआती उम्मीद से कम रहा, क्योंकि बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्यावसायिक होटलों के बजाय धर्मशालाओं और सरकार की ओर से उपलब्ध कराई गई आवासीय सुविधाओं में ठहरे.
यहां मांग का स्वरूप सामान्य पर्यटन से अलग है. परिवार अक्सर समूह में यात्रा करते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों की पूरी अवधि तक साथ रहते हैं. कुछ परिवार एक दिन रुकते हैं, जबकि कई परिवार अपनी धार्मिक प्रक्रिया के अनुसार कई दिनों तक शहर में ठहरते हैं.
इस साल संभावित बढ़ी हुई भीड़ को संभालने के लिए आवास की व्यवस्था भी बढ़ाई गई है. रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 70 हजार श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए स्कूलों और कॉलेजों में 44 आवास केंद्र तैयार किए गए हैं. इसके अलावा अस्थायी आवास और टेंट की व्यवस्था भी की जा रही है.
राज्य पर्यटन विभाग परिवहन, आवास, भोजन और पिंडदान से जुड़ी सेवाओं को एक साथ जोड़कर संगठित तीर्थयात्रा पैकेज को भी बढ़ावा दे रहा है. बिहार पर्यटन के मौजूदा पैकेज बताते हैं कि यह तीर्थयात्रा अब एक व्यवस्थित ट्रैवल मार्केट का रूप ले चुकी है. इनमें एक दिन और दो दिन के पैकेज शामिल हैं, जिनमें गयाजी, पुनपुन, बोधगया, राजगीर और नालंदा जैसे स्थानों को शामिल किया जाता है.
रेल, सड़क, ऑटो और टैक्सी, खर्च की एक और बड़ी कड़ी
आर्थिक गतिविधि श्रद्धालुओं के गयाजी पहुंचने से पहले ही शुरू हो जाती है. दूसरे राज्य से आने वाले किसी परिवार के लिए यात्रा में ट्रेन टिकट, बस या निजी वाहन का खर्च शामिल हो सकता है. गयाजी पहुंचने के बाद ऑटो, ई-रिक्शा या टैक्सी की जरूरत पड़ती है. मेले के दौरान स्थानीय वाहनों की मांग में तेज बढ़ोतरी होती है.
मौसमी भीड़ को संभालने के लिए रेलवे की ओर से विशेष ट्रेनें भी चलाई जाती हैं. 2025 में रानी कमलापति, जबलपुर और सोगरिया या कोटा से गयाजी के लिए विशेष सेवाएं चलाई गई थीं. 2026 के लिए भी रानी कमलापति और जबलपुर से विशेष ट्रेनों की घोषणा की गई है. गयाजी रेलवे स्टेशन पर भी तीर्थयात्रा सीजन के दौरान अतिरिक्त टिकटिंग सुविधाओं की तैयारी की गई है.
हालांकि, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ऐसा कोई विश्वसनीय आंकड़ा नहीं है, जो यह बताता हो कि गयाजी की तीर्थयात्रा के लिए श्रद्धालु सामूहिक रूप से रेलवे और बस किराए पर कितना खर्च करते हैं. इसी तरह 2025 में रिपोर्ट किया गया 50 लाख रुपये का परिवहन कारोबार स्थानीय परिवहन कारोबार से जुड़ा था, न कि श्रद्धालुओं द्वारा रेल, बस, टैक्सी और निजी वाहनों पर किए गए कुल खर्च से. इसलिए इसे पूरे परिवहन बाजार का आंकड़ा मानना सही नहीं होगा.
हवाई यात्रा इस बाजार का छोटा लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा है. एयरपोर्ट निदेशक के अनुसार, जून 2026 से पहले के एक वर्ष में गयाजी एयरपोर्ट से करीब 3.3 लाख यात्रियों ने यात्रा की. दिल्ली और कोलकाता के लिए घरेलू कनेक्टिविटी उपलब्ध है, जबकि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का संचालन मौसमी है.
अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन के लिए भी एयरपोर्ट की भूमिका बढ़ सकती है. इंडिगो ने 26 अक्टूबर 2026 से गयाजी से बैंकॉक के लिए सीधी उड़ान शुरू करने की घोषणा की है. हालांकि यह सेवा इस साल के पितृपक्ष के बाद शुरू होगी.
गमछे से घी तक, छोटी दुकानों का भी बड़ा योगदान
पितृपक्ष की अर्थव्यवस्था सिर्फ बड़े कारोबार तक सीमित नहीं है. इसकी असली ताकत हजारों छोटी-छोटी खरीदारी में है. श्रद्धालु गमछा, धोती, बर्तन, फूल, फल, अगरबत्ती, मिट्टी के दीये, अनाज, धार्मिक किताबें और दूसरी पूजा सामग्री खरीदते हैं.
पारंपरिक गमछा और धोती के कारोबार के लिए मशहूर पटवा टोली बाजार में स्थानीय अनुमानों के मुताबिक 2025 के मेले के दौरान 5 करोड़ रुपये से अधिक की बिक्री हुई थी.
रेहड़ी-पटरी वाले, फूल विक्रेता, मिठाई की दुकानें, किराना स्टोर और छोटे भोजनालय भी इस सीजन में लाभ कमाते हैं. सफाई, सामान ढोने, कैटरिंग, परिवहन और अन्य सेवाओं के लिए अस्थायी कर्मचारियों की भी जरूरत बढ़ जाती है. कई छोटे कारोबारियों के लिए 16 दिनों का यह समय उनकी सालाना मौसमी आय का बड़ा हिस्सा तय करता है.
यही वजह है कि पितृपक्ष के बाजार को किसी एक उद्योग के तौर पर देखना सही नहीं होगा. यह एक पूरी स्थानीय आर्थिक श्रृंखला है. श्रद्धालु द्वारा होटल, टैक्सी चालक, भोजन सप्लायर, पूजा सामग्री की दुकान या किसी छोटे विक्रेता को दिया गया पैसा आगे उसके कर्मचारियों और गयाजी के बाहर मौजूद सप्लायरों तक भी पहुंचता है.
2026 में कितना बड़ा हो सकता है बाजार?
2025 में 600 करोड़ रुपये का अनुमान 2026 के लिए एक उपयोगी बेंचमार्क जरूर है, लेकिन इसे इस साल का तय आंकड़ा नहीं माना जा सकता. अगर पिछले साल के औसत खर्च के पैटर्न को इस साल आने वाले 50 लाख श्रद्धालुओं पर सीधे लागू किया जाए, तो आर्थिक गतिविधि का अनुमान करीब 860 करोड़ रुपये बैठता है. हालांकि यह केवल गणितीय अनुमान है, भविष्यवाणी नहीं.
वास्तविक खर्च इस बात पर निर्भर करेगा कि कितने श्रद्धालु रात में रुकते हैं, वे कितने दिनों तक शहर में रहते हैं, कितने लोग व्यावसायिक होटलों का इस्तेमाल करते हैं, धार्मिक अनुष्ठानों और भोजन पर कितना खर्च करते हैं और कितने लोगों के लिए धर्मशालाओं व सरकार की अन्य सुविधाओं में ठहरने की व्यवस्था होती है.
फिर भी यह गणना बताती है कि गयाजी का पितृपक्ष बिहार के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक आयोजन क्यों बन चुका है. पिछले साल 34.79 लाख श्रद्धालुओं और अनुमानित 600 करोड़ रुपये के कारोबार के आधार पर प्रति श्रद्धालु औसत आर्थिक गतिविधि करीब 1,725 रुपये बैठती है. अगर इस साल 50 लाख श्रद्धालु आते हैं और प्रति व्यक्ति खर्च का पैटर्न लगभग समान रहता है, तो बाजार करीब 860 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है.
बड़ी तस्वीर सिर्फ धार्मिक उत्सव के दौरान होने वाले पैसों के लेन-देन की नहीं है. गयाजी का पितृपक्ष यह दिखाता है कि किस तरह आस्था, पर्यटन, हॉस्पिटैलिटी, परिवहन, पारंपरिक व्यवसाय और छोटे कारोबार मिलकर एक बड़ी मौसमी अर्थव्यवस्था तैयार करते हैं.
अब गयाजी के सामने चुनौती यह है कि हर साल होने वाली इस बड़ी भीड़ को एक अधिक व्यवस्थित और टिकाऊ पर्यटन व्यवस्था में बदला जाए. ऐसी व्यवस्था, जिसमें श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिलें, स्थानीय कारोबारियों को स्थायी और अनुमानित अवसर मिलें और भारत की सबसे पुरानी तीर्थ परंपराओं में से एक से पैदा होने वाली आर्थिक गतिविधि का लाभ शहर को भी मिले.
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