मुस्कान चौधरी
“मैं जल्दी लौटूंगा…”
“बच्चों और परिवार का ध्यान रखना…”
“दुश्मन पर तिरंगा लहराकर आऊंगा या फिर उसी में लिपटकर…”
ये सिर्फ कुछ वाक्य नहीं हैं. ये उन भारतीय सैनिकों के आखिरी शब्द हैं, जिन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध में देश की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए. किसी ने बीमार पत्नी को छोड़कर रणभूमि का रास्ता चुना, किसी ने जन्मदिन पर परिवार को जीत का भरोसा दिया, तो कोई दुश्मन का बंकर फतह करने के बाद भी साथियों की मदद के लिए दोबारा मौत के मुंह में उतर गया.
कारगिल की लड़ाई दुनिया के सबसे कठिन युद्धों में गिनी जाती है. समुद्र तल से 16 से 18 हजार फीट की ऊंचाई, माइनस तापमान, ऑक्सीजन की कमी और सामने ऊंची चोटियों पर बैठे दुश्मन. भारतीय सैनिकों को खड़ी चट्टानों पर चढ़ते हुए हमला करना था. हालात ऐसे थे, जहां एक छोटी सी चूक मौत बन सकती थी. इसके बावजूद भारतीय सेना ने असंभव दिखने वाले मिशन को संभव कर दिखाया.
26 जुलाई को पूरा देश कारगिल विजय दिवस मनाता है. यह दिन सिर्फ एक सैन्य जीत का नहीं, बल्कि उन वीरों के अदम्य साहस और उनके परिवारों के त्याग को नमन करने का अवसर है, जिन्होंने देश की खातिर अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया.
कैसे शुरू हुआ कारगिल युद्ध?
1999 की शुरुआत में भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते बेहतर बनाने की कोशिशें चल रही थीं. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘लाहौर बस यात्रा’ के जरिए शांति का संदेश दिया था. लेकिन इसी दौरान पाकिस्तानी सेना और घुसपैठियों ने नियंत्रण रेखा (LoC) पार कर कारगिल, द्रास, बटालिक और मशकोह सेक्टर की ऊंची चोटियों पर कब्जा जमा लिया.
शुरुआत में इन्हें आतंकवादी समझा गया, लेकिन जल्द ही स्पष्ट हो गया कि इनके पीछे पाकिस्तान की नियमित सेना थी. उनका मकसद श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग को बाधित करना और सियाचिन क्षेत्र में भारत की रणनीतिक बढ़त को कमजोर करना था. घुसपैठ का पता चलने के बाद भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया. भारतीय वायुसेना ने ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ के तहत अभियान चलाया. इसके बाद एक-एक चोटी को दुश्मन से वापस लेने की लड़ाई शुरू हुई. हर कदम पर गोलियों की बारिश थी और हर चढ़ाई मौत को चुनौती देने जैसी.
टाइगर हिल और तोलोलिंग: जीत जिसने युद्ध की दिशा बदल दी
कारगिल युद्ध की सबसे बड़ी उपलब्धियों में तोलोलिंग और टाइगर हिल पर दोबारा कब्जा शामिल है. तोलोलिंग पर जीत ने भारतीय सेना का मनोबल बढ़ाया, जबकि टाइगर हिल पर तिरंगा फहराना पूरे युद्ध का निर्णायक क्षण साबित हुआ. इस जीत ने दुनिया को दिखा दिया कि भारतीय सैनिक किसी भी चुनौती के सामने झुकना नहीं जानते.
देश के इन वीरों ने लिखी शौर्य की अमर गाथा
लांस नायक केवलानंद द्विवेदी: बीमार पत्नी को छोड़ मातृभूमि की रक्षा में निकले
मार्च 1999 में लांस नायक केवलानंद द्विवेदी छुट्टी पर घर आए थे. पत्नी कमला द्विवेदी बीमार थीं. तभी सेना से तार आया कि बिना देरी यूनिट में रिपोर्ट करें. एक तरफ बीमार पत्नी और दो छोटे बच्चे थे, दूसरी तरफ देश का बुलावा. उन्होंने परिवार को देखा, आदेश पत्र उठाया और तुरंत रवाना हो गए.
30 मई 1999 को पत्नी से उनकी आखिरी बार फोन पर बात हुई. उन्होंने कहा, “मैं कारगिल के अग्रिम मोर्चे पर जा रहा हूं. बच्चों और परिवार का ध्यान रखना.” 6 जून 1999 की रात दुश्मन से आमने-सामने की लड़ाई में वह वीरगति को प्राप्त हो गए. उनका बलिदान इस बात का प्रतीक है कि एक सैनिक के लिए देश हमेशा सबसे पहले होता है.
कैप्टन आदित्य मिश्र: जीत के बाद भी नहीं रुके, संचार नेटवर्क जोड़ते हुए शहीद हुए
19 जून 1999 को लद्दाख स्काउट्स के साथ बटालिक सेक्टर पहुंचे कैप्टन आदित्य मिश्र ने प्वाइंट 5203 को दुश्मनों के कब्जे से मुक्त कराने में अहम भूमिका निभाई.
मिशन पूरा होने के बाद भी वह नहीं रुके. आगे की कार्रवाई आसान हो सके, इसके लिए वह दोबारा कब्जे में आए बंकर में संचार नेटवर्क स्थापित करने पहुंचे. इसी दौरान वहां छिपे पाकिस्तानी सैनिकों ने उन पर हमला कर दिया. कैप्टन आदित्य ने बहादुरी से जवाबी मोर्चा संभाला और लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गए. उनके पिता लेफ्टिनेंट जनरल जी.एस. मिश्र भी भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी रहे.
कैप्टन मनोज पांडेय: परमवीर बनने का सपना सच कर गए
26 जून 1999 को, अपने जन्मदिन पर कैप्टन मनोज पांडेय ने खराब सैटेलाइट नेटवर्क के बीच परिवार से कुछ सेकेंड बात की. उन्होंने कहा, “चिंता मत करना, दुश्मन पर तिरंगा लहराकर आऊंगा या फिर तिरंगे में लिपटकर.”
बचपन से ही सेना में जाने का सपना देखने वाले मनोज ने सर्विस सिलेक्शन बोर्ड के इंटरव्यू में कहा था कि वह परमवीर चक्र जीतने के लिए सेना में शामिल होना चाहते हैं. 3 जुलाई 1999 को खालूबार की पहाड़ियों पर उन्होंने दुश्मन के तीन बंकर ध्वस्त कर दिए. चौथे बंकर पर हमला करते समय दुश्मन की गोली उन्हें लगी, लेकिन मिशन पूरा हो चुका था. उनके अदम्य साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. आज यूपी सैनिक स्कूल उनके नाम से जाना जाता है.
मेजर रीतेश शर्मा: छुट्टी अधूरी छोड़ फिर लौटे मोर्चे पर
मई 1999 में मेजर रीतेश शर्मा महू में विशेष सैन्य प्रशिक्षण पूरा कर 15 दिन की छुट्टी पर लखनऊ आए थे. तभी सूचना मिली कि कारगिल क्षेत्र में जाट रेजीमेंट की एक पेट्रोलिंग टुकड़ी का संपर्क टूट गया है.
उन्होंने बिना समय गंवाए छुट्टी अधूरी छोड़ी और अपनी यूनिट 17 जाट रेजीमेंट लौट गए. 6 और 7 जुलाई 1999 की रात प्वाइंट 4875 और मश्कोह घाटी में हुए भीषण ऑपरेशन के दौरान वह गंभीर रूप से घायल हो गए. इस अभियान में उनकी यूनिट ने असाधारण साहस का परिचय दिया, जिसके लिए उसे बाद में “मश्कोह सेवियर” का सम्मान मिला.
राइफलमैन सुनील जंग: ‘जल्दी लौटूंगा’ कहकर गए, फिर तिरंगे में लौटे
राइफलमैन सुनील जंग को बचपन से फौजी वर्दी का शौक था. स्कूल की फैंसी ड्रेस प्रतियोगिताओं में वह हमेशा सैनिक की भूमिका निभाते थे. महज 16 साल की उम्र में वह सेना में भर्ती हो गए. कारगिल युद्ध से कुछ दिन पहले घर आए थे. वापस लौटते समय मां से कहा था, “जल्दी लौटूंगा.”
लेकिन वह वादा अधूरा रह गया. 15 मई 1999 को वह कारगिल युद्ध में लखनऊ के पहले शहीद बने. आज भी उनकी मां बीना महत कहती हैं, “इस जन्म में उसने धरती मां का फर्ज निभाया. अगले जन्म में वह फिर मेरा बेटा बनकर आए, मैं आज भी उसी दिन का इंतजार कर रही हूं.”
527 वीरों ने दिया सर्वोच्च बलिदान
कारगिल युद्ध में भारत के 527 सैनिक शहीद हुए, जबकि 1,300 से अधिक जवान घायल हुए. इन वीरों ने अपने प्राणों की आहुति देकर देश की सीमाओं की रक्षा की.
इस युद्ध के कई नायक आज भी हर भारतीय के दिल में बसे हैं.
- कैप्टन विक्रम बत्रा का “ये दिल मांगे मोर” आज भी युवाओं को प्रेरित करता है.
- लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय ने अद्भुत साहस का परिचय दिया.
- ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव और राइफलमैन संजय कुमार ने जीवित रहते हुए परमवीर चक्र प्राप्त किया.
- कैप्टन अनुज नैय्यर, मेजर विवेक गुप्ता और कैप्टन विजयंत थापर जैसे अनेक वीरों ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया.
कारगिल की जीत सिर्फ सेना की रणनीति या हथियारों की जीत नहीं थी. यह उन सैनिकों के साहस, उनके परिवारों के त्याग और तिरंगे के प्रति उनके अटूट समर्पण की जीत थी. आज, 26 जुलाई को जब पूरा देश कारगिल विजय दिवस मना रहा है, तब इन अमर वीरों की कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि आजादी और सुरक्षा की कीमत सीमा पर खड़े जवान हर दिन अपने साहस और बलिदान से चुकाते हैं. उनके कारण ही तिरंगा आज भी उतनी ही शान से लहरा रहा है.

