देश विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ रहा है, लेकिन मैनुअल स्कैवेंजिंग यानि की यानी हाथ से मैला ढोना, अस्वच्छ शौचालयों, खुले नालों, सीवर या सेप्टिक टैंकों से मानव मल को हाथ से साफ करने जैसी सामाजिक कुरीतियां अब भी चिंता का विषय हैं. सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतों को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है.
जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने मैनुअल स्कैवेंजिंग से जुड़े मामलों की सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र सरकार के 2019 और 2025 के सरकारी संकल्पों में शामिल उस प्रावधान को रद्द कर दिया, जिसमें निजी संस्थाओं, सोसायटियों और ठेकेदारों के जरिए नियुक्त सफाईकर्मियों की मौत पर मुआवजे की जिम्मेदारी संबंधित निजी संस्था पर डाल दी गई थी.
कोर्ट ने कहा कि मैनुअल स्कैवेंजिंग सिर्फ रोजगार या मजदूरी का मुद्दा नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा मामला है. खंडपीठ ने कहा, “21वीं सदी में हम चांद के दूसरे छोर तक पहुंचने का गौरव करते हैं लेकिन हमारे सामने यह कड़वी हकीकत है कि जाति व्यवस्था की सामाजिक बुराई आज भी हमारे देश में कायम है.”
अदालत ने कहा कि यही सामाजिक बुराई आज भी कुछ लोगों को ऐसे काम करने के लिए मजबूर करती है, जो उनकी गरिमा और जीवन दोनों के लिए गंभीर खतरा हैं.
निजी और सरकारी सफाईकर्मियों में भेदभाव पर सवाल
हाईकोर्ट ने निजी संस्थानों के लिए काम करने वाले सफाईकर्मियों और सरकारी या स्थानीय निकायों के कर्मचारियों के लिए मुआवजे की अलग-अलग व्यवस्था पर सवाल उठाया. कोर्ट ने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को कानून के सामने समानता और कानून का समान संरक्षण देता है. इसके बावजूद संविधान अपनाए जाने के 75 साल बाद भी देश उस सामाजिक बुराई से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है, जिसने सदियों से समाज को प्रभावित किया है.
अदालत ने मैनुअल स्कैवेंजिंग को इसी सामाजिक बुराई का उदाहरण बताते हुए कहा कि एक खास समुदाय के लोगों को पीढ़ियों से इस अमानवीय काम के लिए मजबूर किया जाता रहा है.
पहले राज्य देगा मुआवजा, बाद में कर सकेगा वसूली
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गायत्री सिंह ने बताया कि सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान जहरीली गैसों की चपेट में आने से सफाईकर्मियों की मौत के कई मामले सामने आते हैं. मुआवजे के लिए मृतक के परिवारों को सरकारी दफ्तरों और अलग-अलग संस्थाओं के चक्कर लगाने पड़ते हैं.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी मौतों के मामलों में परिवार को मुआवजे के लिए इंतजार नहीं कराया जा सकता. मृतक के परिवार को तत्काल मुआवजा दिया जाए. इसके बाद राज्य सरकार संबंधित कार्यालय, प्रतिष्ठान, निजी संस्था या उस व्यक्ति से रकम वसूल सकती है, जिसके लिए मृतक काम कर रहा था.
हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को छह महीने के भीतर खतरनाक सफाई के दौरान जान गंवाने वाले सभी लोगों की पहचान करने का निर्देश दिया है.
कोर्ट ने आदेश दिया कि ऐसे प्रत्येक मृतक के आश्रितों को 30 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए. राज्य सरकार और स्थानीय निकायों को मृत सफाईकर्मियों और मैनुअल स्कैवेंजर्स के आश्रितों के पुनर्वास के लिए भी जरूरी कदम उठाने होंगे. अदालत ने साफ किया कि पुनर्वास में सफाईकर्मी और मैनुअल स्कैवेंजर के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए. इन निर्देशों के साथ बॉम्बे हाईकोर्ट ने संबंधित याचिकाओं का निपटारा कर दिया.
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