एक वकील, जिसने कलम को हथियार बनाया. एक समाज सुधारक, जिसने गांव-गांव जाकर लोगों को जगाया. एक नेता, जिसने अलग झारखंड के लिए आंदोलन को आवाज दी. और एक शिक्षक, जिसने पूरी पीढ़ी को सिर्फ एक बात सिखाई – ‘पढ़ो और लड़ो’. यह कहानी है बिनोद बिहारी महतो की, जिन्हें झारखंड की राजनीति में आज भी ‘बिनोद बाबू’ के नाम से याद किया जाता है. धनबाद के बड़ादाहा गांव से शुरू हुआ उनका सफर विधानसभा से लोकसभा तक पहुंचा, लेकिन उनकी असली पहचान किसी पद या सत्ता से नहीं, बल्कि शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और झारखंड के अधिकारों की लड़ाई से बनी.
आज 23 सितंबर है, यानी बिनोद बिहारी महतो की जयंती. 1923 में धनबाद के बलियापुर के बड़ादाहा गांव में जन्मे बिनोद बाबू ने जिस दौर में आंखें खोलीं, उस समय गांवों में शिक्षा की पहुंच सीमित थी और समाज कई कुरीतियों और शोषण से जूझ रहा था. उन्होंने इन हालात को सिर्फ देखा नहीं, बल्कि उन्हें बदलने की कोशिश की. कभी शिक्षक बनकर बच्चों को पढ़ाया, कभी वकील बनकर विस्थापितों और जरूरतमंदों की आवाज उठाई और कभी आंदोलनकारी बनकर झारखंड के हक की लड़ाई लड़ी.
झारखंड के राजनीतिक इतिहास में उन्हें जेएमएम के संस्थापक अध्यक्ष के तौर पर याद किया जाता है. लेकिन बिनोद बिहारी महतो की कहानी सिर्फ राजनीति की कहानी नहीं है. यह उस इंसान की कहानी है जिसने समझ लिया था कि जिस समाज के हाथ में शिक्षा होगी, उसके पास अपने अधिकारों के लिए लड़ने की ताकत भी होगी. इसी सोच से निकला उनका संदेश ‘पढ़ो और लड़ो’ आगे चलकर उनकी पहचान बन गया.
आज उनकी जयंती पर आइए जानते हैं उस बिनोद बाबू की कहानी, जिसने धनबाद के एक गांव से निकलकर झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी.
किसान परिवार में जन्म, संघर्षों के बीच हासिल की शिक्षा
बिनोद बिहारी महतो का जन्म बलियापुर के बड़ादाहा गांव में पिता किसान माहिंदी महतो व माता मंदाकिनी के घर 23 सितंबर 1923 को हुआ था. परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वह मैट्रिक तक की ही पढ़ाई कर पाये. इसके साथ ही, दैनिक मजदूर के तौर पर उन्होंने धनबाद कोर्ट में काम शुरु किया. इसके बाद वह कलेक्टरेट के आपूर्ति विभाग में किरानी(clerk) की नौकरी करने लगे.
इसी बीच एक ऐसा वाकया हुआ, जिसने उनकी जिंदगी बदल कर रख दी. कौन जानता था कि ये शख्स आगे चलकर तत्कालीन बिहार के इतिहास को नया मोड़ देगा. एक वकील ने बिनोद बाबू से कह दिया कि तुम कितना भी होशियार क्यों न बनो, रहोगे किरानी ही. इसलिये संभल कर बात करो. और ये बात बिनोद बाबू को इस कदर चुभी कि उन्होंने उसी वक्त वकील बनने की ठान ली. नौकरी करते हुए भी उन्होंने आगे की पढ़ाई शुरु कर दी. पहले पीके राय मेमोरियल कॉलेज से इंटर, फिर रांची कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री लेने के बाद उन्होंने पटना लॉ कॉलेज से वकालत की डिग्री हासिल की.

अब कहते हैं न, जहां चाह वहां राह, इसका सटीक उदाहरण हमारे बिनोद बाबू हैं. वकालत की दुनिया में उन्होंने महज़ कुछ ही वर्षों में प्रतिष्ठित अधिवक्ताओं के बीच अपना नाम बना लिया. उनके वकालत से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा है, जिसने वाकई उन्हें वकालत की दुनिया में प्रतिष्ठा दी.
बताया जाता है कि बोकारो स्टील प्लांट के लिये जमीन अधिग्रहण के दौरान रैयतों को सरकारी अधिकारी बहुत परेशान करते थे. कौड़ी के भाव में जमीन ले ली जाती थी. रैयतों के पास केस लड़ने के लिये पैसे नहीं होते थे. तब बिनोद बाबू उनका केस अदालत तक लेकर जाते थे, और उचित मुआवजा दिलाते थे. केस का फैसला होने के पहले एक पैसा रैयतों से नहीं लेते थे. जब मुआवजा मिल जाता था तब उसका एक छोटा सा हिस्सा ही फीस के तौर पर लेते थे. इस फीस का ज्यादातर हिस्सा वह स्कूल कॉलेज को दान कर देते थे.
पढ़ाई के साथ उन्होंने जीवन की कठिनाइयों को भी करीब से देखा. उन्होंने शिक्षक के तौर पर काम किया, धनबाद में आपूर्ति विभाग में क्लर्क की नौकरी की और बाद में पटना लॉ कॉलेज से वकालत कर उसी को अपना पेशा बनाया. 1956 में उन्होंने वकालत शुरू की. कुछ ही दिनों में वे धनबाद के प्रतिष्ठित अधिवक्ताओं में गिने जाने लगे. अधिवक्ता के रूप में भी उनका जुड़ाव आम लोगों से रहा. पंचेत डैम, मैथन डैम और सिंदरी जैसे औद्योगिक और विकास परियोजनाओं से विस्थापित लोगों के लिए उन्होंने कई मामले लड़े. यही वह दौर था जिसने उनके भीतर सामाजिक संघर्ष की जमीन तैयार की.
धनबाद जिले के सुदूर बलियापुर बड़ादाहा गांव में जन्मे शिक्षाविद् बिनोद बिहारी महतो पढ़ो और लड़ो का नारा देकर अमर हो गए.चार फरवरी 1973 को अलग झारखंड राज्य निर्माण के लिए दिशोम गुरु शिबू सोरेन, प्रसिद्ध मजदूर नेता एके राय, टेकलाल महतो आदि के साथ मिलकर उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया. वर्षों अलग झारखंड राज्य के लिए आंदोलन कर इसे मुकाम तक पहुंचाया. वर्ष 2000 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने अलग झारखंड राज्य की घोषणा की.

बिनोद बिहारी महतो का मानना था कि समाज को बदलना है तो सबसे पहले लोगों को शिक्षित करना होगा. वह गांवों में जाते, बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते और शिक्षा को अधिकारों की समझ से जोड़ते थे. इसी सोच से उनका सबसे चर्चित संदेश सामने आया – ‘पढ़ो और लड़ो’.
यह नारा सिर्फ किताब पढ़ने तक सीमित नहीं था. इसके पीछे उनका विचार था कि शिक्षित व्यक्ति अपने अधिकारों को समझ सकता है और अन्याय के खिलाफ आवाज उठा सकता है. इसी वजह से उन्होंने ग्रामीण इलाकों में शिक्षण संस्थानों की स्थापना और शिक्षा के प्रसार पर जोर दिया.
नारा देने के साथ सामाजिक कुरीतियों के अलावा महाजनी शोषण का भी तीव्र विरोध कर बिनोद बिहारी ने लोगों के साथ आंदोलन चलाया. यही कारण है कि धनबाद और इसके आसपास जिलों के ग्रामीण जागरूक हुए.अपने अधिकार के लिए आवाज उठानी शुरू की.
आज उनके नाम पर धनबाद में बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय समेत कई शिक्षण संस्थान और स्कूल-कॉलेज हैं. उनके नाम की प्रतिमाएं भी झारखंड के अलग-अलग हिस्सों में दिखाई देती हैं.
‘शिवाजी समाज’ से सामाजिक बदलाव की शुरुआत
बिनोद बिहारी महतो सिर्फ राजनीतिक आंदोलन तक सीमित नहीं रहे. 1960 के दशक में उन्होंने ‘शिवाजी समाज’ का गठन किया. इसका उद्देश्य समाज में मौजूद कुरीतियों और समस्याओं के खिलाफ जागरूकता पैदा करना था. संगठन ने दहेज प्रथा, बाल विवाह और दूसरी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अभियान चलाए. साथ ही कुड़मी समाज की भाषा, संस्कृति और त्योहारों को बढ़ावा देने की दिशा में भी काम किया.
बिनोद बाबू सामाजिक चेतना को शिक्षा से जोड़ते थे. वह मानते थे कि जब तक ग्रामीण समाज जागरूक नहीं होगा, तब तक महाजनी शोषण और सामाजिक बुराइयों से लड़ना मुश्किल होगा. इसीलिए उनका संघर्ष केवल सत्ता हासिल करने का संघर्ष नहीं था. वह समाज के भीतर बदलाव की कोशिश भी था.
झारखंड की भाषा और संस्कृति से भी गहरा जुड़ाव
बिनोद बिहारी महतो की पहचान सिर्फ राजनेता के रूप में नहीं थी. वह झारखंड की स्थानीय भाषा, लोक परंपराओं और संस्कृति को लेकर भी गंभीर थे. कुड़माली भाषा और झारखंड की लोक संस्कृति को बढ़ावा देने के प्रयासों का भी उनके जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रहा. टुसू, करम, सोहराय, जितिया और दूसरे स्थानीय पर्वों से जुड़े आयोजनों में उनकी भागीदारी का जिक्र मिलता है.
उनकी सोच साफ थी कि किसी समाज की पहचान केवल उसकी राजनीति से नहीं बनती. उसकी भाषा, संस्कृति, परंपराएं और शिक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं.
लाल झंडे से झारखंड आंदोलन तक
बिनोद बिहारी महतो लंबे समय तक कम्युनिस्ट राजनीति से जुड़े रहे. 1967 में कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन के बाद वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से जुड़े. 1971 में उन्होंने धनबाद लोकसभा सीट से चुनाव भी लड़ा और दूसरे स्थान पर रहे.
लेकिन इसी दौरान अलग झारखंड राज्य का आंदोलन भी आकार ले रहा था. बिनोद बाबू ने महसूस किया कि झारखंड के सवाल को राजनीतिक ताकत के साथ आगे बढ़ाने की जरूरत है. 4 फरवरी 1973 को धनबाद के गोल्फ ग्राउंड में बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन, ए.के. राय, टेकलाल महतो आदि के साथ मिलकर उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया. वर्षों अलग झारखंड राज्य के लिए आंदोलन कर इसे मुकाम तक पहुंचाया. वर्ष 2000 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने अलग झारखंड राज्य की घोषणा की.
विधायक से सांसद तक का सफर

राजनीतिक जीवन में उन्हें चुनावी सफलता भी मिली. वह 1980 में टुंडी से बिहार विधानसभा पहुंचे. इसके बाद 1985 और 1990 में भी विधानसभा की राजनीति में सक्रिय रहे. 1991 में वह गिरिडीह लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए. लेकिन संसद तक पहुंचने के बाद भी उनकी पहचान एक ऐसे नेता की रही जो गांव और आम लोगों से अपना रिश्ता नहीं तोड़ता था. हालांकि उनका राजनीतिक जीवन लंबा नहीं रहा, लेकिन उसका असर लंबे समय तक दिखाई दिया.
अलग झारखंड का सपना, लेकिन उसे देखने के लिए नहीं रहे
जिस अलग झारखंड राज्य के लिए बिनोद बिहारी महतो ने दशकों तक संघर्ष किया, उसका गठन उनके निधन के करीब नौ साल बाद हुआ. वर्ष 2000 में अलग झारखंड राज्य अस्तित्व में आया. लेकिन बिनोद बाबू इस ऐतिहासिक क्षण को अपनी आंखों से नहीं देख सके. 18 दिसंबर 1991 को दिल्ली के एक अस्पताल में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया. उस समय उनकी उम्र 68 वर्ष थी.
उनके निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को उनके परिवार और सहयोगियों ने आगे बढ़ाया. उनके बड़े बेटे राजकिशोर महतो भी सक्रिय राजनीति में रहे और सांसद तथा विधायक बने.
आज भी जिंदा है ‘बिनोद बाबू’ का विचार
बिनोद बिहारी महतो की सबसे बड़ी विरासत शायद कोई चुनावी जीत या कोई राजनीतिक पद नहीं, बल्कि वह विचार है जिसे उन्होंने बार-बार गांवों तक पहुंचाया – शिक्षा हासिल करो, अपने अधिकार समझो और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाओ.
धनबाद के बड़ादाहा गांव से शुरू हुई यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है. यह उस दौर की कहानी है, जब एक शिक्षक ने शिक्षा को हथियार बनाया, एक वकील ने विस्थापितों के लिए आवाज उठाई, एक समाज सुधारक ने कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया और एक आंदोलनकारी ने अलग झारखंड के सपने को राजनीतिक आवाज देने में भूमिका निभाई.
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