शतरंज की बिसात पर जब भी किसी बड़े खिलाड़ी का जिक्र होता है, अक्सर पुरुषों के नाम ही सामने आते हैं. लंबे समय तक इस खेल को भी पुरुषों के दबदबे वाला क्षेत्र माना जाता रहा. महिलाओं के लिए इस खेल में आगे बढ़ने के रास्ते आसान नहीं थे. लेकिन कुछ ऐसी भी खिलाड़ी रहीं, जिन्होंने सिर्फ इन धारणाओं को चुनौती नहीं दी, बल्कि अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराया. ऐसी ही एक नाम है भाग्यश्री साठे का.
आज भारतीय महिला शतरंज की उपलब्धियों की बात होती है तो भाग्यश्री साठे का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है. उन्होंने उस दौर में शतरंज की दुनिया में अपनी पहचान बनाई, जब महिलाओं के लिए इस खेल में आगे बढ़ना आज की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल था. उन्होंने लगातार बेहतर प्रदर्शन किया, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई उपलब्धियां हासिल कीं और आने वाली पीढ़ियों की लड़कियों के लिए एक मिसाल बन गईं.
भाग्यश्री साठे का सफर सिर्फ एक खिलाड़ी के जीतने की कहानी नहीं है. यह उस लड़की की कहानी है, जिसने बचपन में शतरंज को अपने शौक के तौर पर अपनाया और आगे चलकर उसी खेल को अपनी पहचान बना लिया.
12 साल की उम्र में शुरू हुआ शतरंज का सफर
भाग्यश्री साठे का जन्म 4 अगस्त 1961 को मुंबई में हुआ था. बचपन से ही वह तेज दिमाग और पढ़ाई में होशियार थीं. महज 12 साल की उम्र में उनका परिचय शतरंज से हुआ और देखते ही देखते इस खेल में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी.
उनके शतरंज खेलने की शुरुआत घर से ही हुई. वह अपने पिता के साथ शतरंज खेलती थीं. शुरुआत में शायद यह उनके लिए सिर्फ एक खेल था, लेकिन जब वह अपने पिता को हराने लगीं, तो इस खेल के प्रति उनका आत्मविश्वास और उत्साह दोनों बढ़ने लगा.
वह अपने भाई-बहनों के साथ भी शतरंज खेला करती थीं. यही छोटी-छोटी बाजियां आगे चलकर उनके बड़े सफर की नींव बनीं. हालांकि पढ़ाई और दूसरी जिम्मेदारियों के कारण वह शुरुआत में शतरंज को उतना समय नहीं दे पाती थीं. लेकिन धीरे-धीरे यह खेल उनके लिए महज मनोरंजन नहीं रहा. शतरंज उनके जीवन का हिस्सा बन गया और उन्होंने इसे अपने शौक के रूप में आगे बढ़ाना शुरू किया. यहीं से शुरू हुआ वह सफर, जिसने उन्हें भारतीय महिला शतरंज के इतिहास में एक खास मुकाम तक पहुंचाया.
पहली बड़ी परीक्षा और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान
भाग्यश्री ने अपने खेल को लगातार निखारा और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया. 1979 में मद्रास नेशनल विमेंस चेस चैंपियनशिप में उन्होंने हिस्सा लिया और आठवां स्थान हासिल किया. यह उनके लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव था. इस प्रतियोगिता ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमता दिखाने का अवसर दिया और आगे की बड़ी उपलब्धियों के लिए उनका आत्मविश्वास बढ़ाया.
इसके बाद भाग्यश्री ने पीछे मुड़कर नहीं देखा.
1985 में उन्होंने मद्रास नेशनल विमेंस चेस चैंपियनशिप का खिताब जीता. यह जीत उनके करियर के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई. इसके बाद उन्होंने लगातार राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई. उनकी उपलब्धियों की फेहरिस्त में 1985, 1986, 1988, 1991 और 1994 की इंडियन विमेंस चैंपियनशिप की जीत शामिल है. लगातार शानदार प्रदर्शन ने उन्हें भारत की शीर्ष महिला शतरंज खिलाड़ियों में स्थापित कर दिया. लेकिन भाग्यश्री की नजर सिर्फ राष्ट्रीय खिताबों तक सीमित नहीं थी. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया.
एशिया में भी लहराया भारत का परचम
राष्ट्रीय स्तर पर लगातार सफल होने के बाद भाग्यश्री ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी अपनी पहचान मजबूत की. 1991 में उन्होंने एशियन विमेंस चैंपियनशिप में जीत दर्ज की. यह उपलब्धि उनके करियर की बड़ी उपलब्धियों में शामिल रही. एशियाई स्तर पर मिली इस सफलता ने यह साबित कर दिया कि भारतीय महिला खिलाड़ी भी अंतरराष्ट्रीय शतरंज की बिसात पर बड़ी ताकत बन सकती हैं.
भाग्यश्री की सफलता का सबसे खास पहलू यह था कि वह ऐसे समय में आगे बढ़ रही थीं, जब महिला खिलाड़ियों को आज की तरह व्यापक मंच और सुविधाएं आसानी से उपलब्ध नहीं थीं. उनकी हर जीत सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी. वह भारतीय महिलाओं के लिए शतरंज के क्षेत्र में एक नए रास्ते का निर्माण भी कर रही थीं.

जब शतरंज की बिसात पर लिखा गया इतिहास
भाग्यश्री साठे के करियर में कई खिताब आए, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों से बनी. लगातार जीत और बेहतरीन प्रदर्शन के बाद उन्होंने इंटरनेशनल ग्रैंडमास्टर का खिताब अपने नाम किया. वह इस उपलब्धि तक पहुंचने वाली देश की पहली महिला खिलाड़ी बनीं.
उनकी यह उपलब्धि उस दौर में बेहद महत्वपूर्ण थी. जिस खेल में पुरुष खिलाड़ियों का दबदबा माना जाता था, उसी खेल में एक भारतीय महिला का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतनी बड़ी पहचान बनाना अपने आप में ऐतिहासिक था. भाग्यश्री ने यह साबित किया कि शतरंज सिर्फ पुरुषों का खेल नहीं है. अगर प्रतिभा को मेहनत, धैर्य और सही दिशा मिले तो महिलाएं भी इस खेल की सबसे ऊंची मंजिल तक पहुंच सकती हैं. उनकी कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने सिर्फ अपने लिए जीत हासिल नहीं की. उनकी सफलता ने दूसरी लड़कियों को भी यह भरोसा दिया कि शतरंज की बिसात पर उनके लिए भी जगह है.
पद्मश्री और अर्जुन अवॉर्ड से सम्मान
- सन् 1979 में भाग्यश्री ने मद्रास नेशनल वुमन्स चेस चैम्पियनशिप में भाग लिया। और 8 वां स्थान प्राप्त किया.
- सन् 1985 में भाग्यश्री ने मद्रास नेशनल वुमन्स चेस चैम्पियनशिप में जीत दर्ज की.
- 28 अगस्त 1986 को उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया. इसके अगले वर्ष 1987 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया.
- सन् 1985, 1986, 1988, 1991 और 1994 में इंडियन वुमन्स चैम्पियनशिप दर्ज की.
- सन् 1991 में एशियाई वुमन्स चैम्पियनशिप जीत दर्ज की.
आज भी क्यों याद किया जाता है भाग्यश्री का नाम?
आज महिला शतरंज पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा लोकप्रिय है. देश में कई महिला खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रही हैं. लड़कियां छोटी उम्र से ही शतरंज सीख रही हैं और प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रही हैं.
लेकिन इस बदलाव के पीछे उन खिलाड़ियों का योगदान भी है, जिन्होंने उस समय रास्ता बनाया जब रास्ते आसान नहीं थे. भाग्यश्री साठे उन्हीं खिलाड़ियों में शामिल हैं. उन्होंने अपने खेल से यह संदेश दिया कि किसी भी क्षेत्र में पहचान बनाने के लिए सिर्फ प्रतिभा काफी नहीं होती. उसके साथ लगातार अभ्यास, धैर्य, आत्मविश्वास और चुनौतियों से लड़ने का जज्बा भी जरूरी होता है.
उनका सफर खास तौर पर उन लड़कियों के लिए प्रेरणादायक है, जो शतरंज को अपना करियर बनाना चाहती हैं. भाग्यश्री की उपलब्धियां बताती हैं कि शुरुआत चाहे घर में पिता के साथ खेली गई छोटी-सी बाजी से क्यों न हो, अगर जुनून बरकरार रहे तो वही शौक एक दिन इतिहास रच सकता है.
एक बिसात, कई पीढ़ियों की प्रेरणा
शतरंज की बिसात पर मोहरों की चाल भले ही छोटी हो, लेकिन सही चाल पूरी बाजी का रुख बदल सकती है. भाग्यश्री साठे ने भी अपने दौर में कुछ ऐसी ही चाल चली थी- एक ऐसी चाल, जिसने न सिर्फ उनकी जिंदगी बदली, बल्कि भारतीय महिला शतरंज के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया.
भाग्यश्री साठे की कहानी को सिर्फ जीत और खिताबों के आंकड़ों में समेटना उनके योगदान को छोटा करना होगा. उनकी असली उपलब्धि यह भी है कि उन्होंने भारतीय महिला शतरंज के लिए एक ऐसा रास्ता तैयार किया, जिस पर आगे आने वाली पीढ़ियां चल सकें.


