जेएसएससी-सीजीएल को लेकर सरकार के हाईकोर्ट में दिए नए हलफनामे ने अब एक पुराना सवाल फिर खड़ा कर दिया है. सवाल ये है कि अगर पूरी परीक्षा प्रक्रिया ही दूषित थी, तो यह बात पहले की जांच में क्यों नहीं सामने आई?
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सरकार के इसी बदले हुए रुख को लेकर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि सरकार अब हाईकोर्ट में पूरी परीक्षा प्रक्रिया के दूषित होने की बात कह रही है, लेकिन पहले जांच के दौरान गड़बड़ी से इनकार क्यों किया गया था? अदालत के सामने तब क्या तथ्य रखे गए थे और अब तस्वीर इतनी अलग कैसे हो गई?
सरकार ने 18 सितंबर को हाईकोर्ट में दाखिल जवाबी हलफनामे में कहा है कि परीक्षा की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो चुकी थी. सरकार का तर्क है कि ऐसी स्थिति में ईमानदारी से चयनित और कथित गड़बड़ी से फायदा उठाने वाले अभ्यर्थियों को अलग-अलग करना मुश्किल था. इसी आधार पर परीक्षा और नियुक्तियां रद्द करने के फैसले का बचाव किया गया है.
सवाल सिर्फ परीक्षा का नहीं, जांच का भी है
बाबूलाल ने कहा है कि अब जब सरकार खुद पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है, तो उन लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए जो उस वक्त व्यवस्था और जांच से जुड़े थे. उन्होंने सुधीर गुप्ता, अनुराग गुप्ता, प्रशांत कुमार और मनोज कौशिक की भूमिका पर सवाल उठाते हुए पूछा कि अगर शुरुआत में ही गड़बड़ी इतनी व्यापक थी, तो जांच उस दिशा में क्यों नहीं गई?
यही बात इस पूरे विवाद को सिर्फ ‘परीक्षा रद्द होगी या नहीं’ के सवाल से आगे ले जाती है. असली सवाल यह भी है कि गड़बड़ी हुई तो हुई कैसे और उसे पकड़ने में इतनी देर क्यों लगी?
उनका सवाल है कि अगर आज सरकार कह रही है कि परीक्षा की नींव ही खराब थी, तो पहले अदालत के सामने क्या बताया गया था? क्या उस वक्त पूरी जानकारी सामने नहीं थी या जांच किसी दूसरी दिशा में जा रही थी?
सीआईडी पर भी उठे सवाल
बाबूलाल ने सीआईडी की जांच को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं. उनका कहना है कि जब अब इतने बड़े स्तर पर गड़बड़ी की बात सामने आ रही है, तो शुरुआती जांच में इसकी तस्वीर क्यों नहीं दिखी.
उन्होंने आशंका जताई कि जांच कहीं सिर्फ उन लोगों तक सीमित न रह जाए जो नीचे के स्तर पर पकड़े जा रहे हैं. उनके मुताबिक, अगर पूरी भर्ती व्यवस्था में गड़बड़ी थी तो उस व्यवस्था को चलाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए.
हाईकोर्ट ने 18 सितंबर को सीआईडी जांच की निगरानी के लिए रिटायर्ड हाईकोर्ट जज गौतम कुमार चौधरी को मॉनिटर/ऑब्जर्वर नियुक्त किया है. अदालत ने नियुक्तियां रद्द करने के फैसले पर लगी अंतरिम रोक भी जारी रखी है.
नीचे वाले पकड़े जाएं, ऊपर वाले बच जाएं
बाबूलाल ने इसी बात को लेकर सरकार पर सीधा हमला बोला है. उनका सवाल है कि अगर भर्ती प्रक्रिया में इतना बड़ा खेल हुआ, तो सिर्फ गिरफ्तारियों और निचले स्तर के आरोपियों तक मामला क्यों सीमित रहे?
उनका कहना है कि जिस व्यवस्था में परीक्षा हुई, उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए ऊपर तक जाना होगा. अध्यक्ष, सचिव और दूसरे जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी जांचनी होगी. यानी मरांडी का सवाल सीधा है – अगर परीक्षा की पूरी व्यवस्था दूषित थी, तो फिर उस व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी थी?
बाबूलाल ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की जवाबदेही पर भी सवाल उठाया है. उन्होंने पूछा कि इतनी बड़ी भर्ती प्रक्रिया में अगर गड़बड़ी हुई तो सरकार की निगरानी व्यवस्था कहां थी?
उन्होंने दो सवाल रखे हैं. अगर सरकार को जानकारी नहीं थी, तो निगरानी तंत्र ने काम क्यों नहीं किया? और अगर जानकारी थी, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
मरांडी ने पूरे मामले की CBI से स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है. साथ ही उन्होंने प्रशांत कुमार और सुधीर गुप्ता को JSSC से हटाने तथा मनोज कौशिक को CID ADG के पद से हटाने की मांग की है. उन्होंने अनुराग गुप्ता समेत उन अधिकारियों की भूमिका की भी स्वतंत्र जांच की मांग की है, जिनके कार्यकाल में भर्ती प्रक्रिया या उससे जुड़ी जांच हुई.
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