नीट–यूजी परीक्षा में धांधली के खिलाफ जब देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए, तो कई छात्रों और प्रदर्शनकारियों पर पुलिस केस (FIR) दर्ज हो गए थे. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के भविष्य और मामले की गंभीरता को देखते हुए इनमें से कई FIR को रद्द कर दिया. कोर्ट ने इसके लिए संविधान के आर्टिकल 142 की अपनी खास पावर का इस्तेमाल किया.
इसके बाद से ही सब जगह फिर से चर्चा शुरू हो गई है कि आखिर आर्टिकल 142 क्या है? कोर्ट के पास इसके तहत क्या शक्तियाँ हैं और नीट मामले से पहले इसका इस्तेमाल कहाँ-कहाँ हुआ है? सीधे शब्दों में कहें तो आर्टिकल 142 सुप्रीम कोर्ट की वह खास ताकत है, जिसके जरिए वह किसी भी मामले में पूर्ण न्याय करने के लिए कोई भी फैसला या आदेश दे सकता है.
कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ बन जाती हैं जहाँ पुराना कानून या सरकारी नियम पूरी तरह से न्याय नहीं कर पाते, या प्रक्रिया में मामला अटक जाता है. ऐसे वक्त में सुप्रीम कोर्ट सामान्य कायदे-कानूनों की परवाह किए बिना वह कदम उठाता है जो न्याय के हित में सबसे सही हो.
हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कोर्ट जब चाहे जो मर्जी करे. सुप्रीम कोर्ट ने खुद माना है कि वह इस पावर का इस्तेमाल करके किसी नागरिक के मौलिक अधिकार नहीं छीन सकता और न ही देश के बुनियादी कानूनों को पूरी तरह खत्म कर सकता है.
संविधान में यह कब आया?
यह कोई नया नियम नहीं है. जब हमारा संविधान बन रहा था, तब इसे ‘ड्राफ्ट आर्टिकल 118’ के नाम से लाया गया था. 27 मई 1949 को संविधान सभा ने इसे बिना किसी बड़े विरोध के पास कर दिया और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होते ही यह पावर सुप्रीम कोर्ट को मिल गई.
इतिहास में कब-कब हुआ इसका बड़ा इस्तेमाल?
शुरुआती दौर (1958 से 1962): शुरुआत में बिहार विधानसभा और एक अखबार के बीच हुए विवाद (M.S.M. शर्मा केस) और मशहूर नानावटी मर्डर केस में इस पर चर्चा हुई. साल 1962 के प्रेम चंद गर्ग केस में कोर्ट ने साफ कह दिया था कि आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करके आम लोगों के मौलिक अधिकार नहीं छीने जा सकते.
भोपाल गैस त्रासदी (1991): 1984 में हुए इस भयानक हादसे के पीड़ितों को मुआवजा दिलाने के लिए कोर्ट ने Article 142 का इस्तेमाल किया और यूनियन कार्बाइड कंपनी के साथ 470 मिलियन डॉलर का समझौता मंजूर कराया ताकि पीड़ितों को तुरंत राहत मिल सके.
विशाखा गाइडलाइंस (1997): उस समय ऑफिस और कामकाजी जगहों पर महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए कोई अलग से कानून नहीं था. तब सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करके ‘विशाखा गाइडलाइंस’ जारी कीं, जो 2013 में नया कानून बनने तक पूरे देश में लागू रहीं.
कोयला घोटाला और हाईवे पर शराब (2014 और 2016): 2014 में कोयला ब्लॉक आवंटन में गड़बड़ी पाए जाने पर कोर्ट ने कई आवंटन रद्द कर दिए थे. वहीं 2016 में सड़कों पर हादसों को रोकने के लिए नेशनल और स्टेट हाईवे के 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानें बंद करने का आदेश दिया गया था.
अयोध्या मामला (2019): अयोध्या जमीन विवाद में मुख्य फैसला सुनाने के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करते हुए सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को अलग से 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया था ताकि हर पक्ष के साथ न्याय हो सके.
पेरारिवलन की रिहाई (2022): पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्याकांड में करीब 30 साल से ज्यादा समय से जेल में बंद ए.जी. पेरारिवलन को कोर्ट ने इसी आर्टिकल 142 की पावर का इस्तेमाल करके रिहा किया था.
सीधे तलाक की मंजूरी (2023): सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अगर किसी पति-पत्नी की शादी पूरी तरह से टूट चुकी है और सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं बची है, तो कोर्ट 6 महीने या 1 साल के अनिवार्य वेटिंग पीरियड का इंतजार किए बिना सीधे तलाक की मंजूरी दे सकता है.
चंडीगढ़ मेयर चुनाव (2024): चंडीगढ़ मेयर चुनाव में जब वोट रद्द करने को लेकर धांधली की बात सामने आई, तो सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा चुनाव कराने के बजाय आर्टिकल 142 का इस्तेमाल किया और सही वोटों की गिनती के आधार पर हारे हुए प्रत्याशी को सीधे विजेता घोषित कर दिया.
आर्टिकल 142 को आप सुप्रीम कोर्ट का एक सेफ्टी वाल्व समझ सकते हैं. इसका मकसद बस इतना है कि कानूनी दांव-पेच या कागजी प्रक्रियाओं की वजह से किसी निर्दोष के साथ अन्याय न हो. नीट मामले में भी छात्रों का करियर और उनका भविष्य देखते हुए ही कोर्ट ने इस शक्ति का इस्तेमाल किया है.


