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    Home»जोहार ब्रेकिंग»14 जुलाई 2012: जब भारत में भेजा गया आखिरी टेलीग्राम, खत्म हुआ 163 साल पुराने संचार युग का सफर
    जोहार ब्रेकिंग

    14 जुलाई 2012: जब भारत में भेजा गया आखिरी टेलीग्राम, खत्म हुआ 163 साल पुराने संचार युग का सफर

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyJuly 14, 2026No Comments5 Mins Read6
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    टेलीग्राम
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    मुस्कान  चौधरी 

    एक वक्त था जब डाकिया अगर हाथ में पीले रंग का टेलीग्राम लेकर घर के दरवाजे पर पहुंचता था, तो पूरे परिवार की धड़कनें बढ़ जाती थीं. लोग घबराते भी थे और उत्सुक भी रहते थे कि आखिर उसमें क्या खबर होगी. कभी नौकरी लगने की खुशी होती थी, तो कभी किसी अपने के बीमार होने या निधन की सूचना. कुछ ही शब्दों में लिखा एक टेलीग्राम लोगों की जिंदगी बदल देने की ताकत रखता था. लेकिन 14 जुलाई 2012 को भारत में आखिरी टेलीग्राम भेजे जाने के साथ ही इस ऐतिहासिक सेवा का सफर हमेशा के लिए खत्म हो गया. अगले दिन यानी 15 जुलाई 2012 से देश में टेलीग्राम सेवा बंद कर दी गई और संचार के एक सुनहरे अध्याय का अंत हो गया.

    कभी सबसे तेज था संदेश भेजने का जरिया

    आज मोबाइल फोन और इंटरनेट के दौर में किसी भी व्यक्ति तक कुछ ही सेकंड में संदेश पहुंच जाता है. लेकिन एक समय ऐसा भी था जब टेलीग्राम ही सबसे तेज और सबसे भरोसेमंद संचार माध्यम माना जाता था. शादी का निमंत्रण हो, नौकरी मिलने की सूचना, परीक्षा परिणाम, किसी परिजन के बीमार होने की खबर या कोई सरकारी संदेश, हर जरूरी सूचना टेलीग्राम के जरिए ही भेजी जाती थी.

    उस दौर में लोग चिट्ठियों का इंतजार दिनों तक करते थे, लेकिन अगर मामला बेहद जरूरी होता था तो टेलीग्राम ही पहला विकल्प होता था. यही वजह थी कि टेलीग्राम सिर्फ एक सेवा नहीं, बल्कि लोगों की भावनाओं का हिस्सा बन गया था.

    163 साल पहले हुई थी शुरुआत

    भारत में टेलीग्राम सेवा की शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी. वर्ष 1851 में कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) और डायमंड हार्बर के बीच पहली बार टेलीग्राफ लाइन के जरिए संदेश भेजा गया. यह स्थान कोलकाता से करीब 50 किलोमीटर दूर है. सफल प्रयोग के बाद इस सेवा का तेजी से विस्तार हुआ और कुछ ही वर्षों में यह देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंच गई.

    आजादी के आंदोलन के दौरान भी टेलीग्राम ने अहम भूमिका निभाई. सरकारी विभाग, सेना, रेलवे, व्यापारिक संस्थान और आम नागरिक लंबे समय तक इसी माध्यम पर निर्भर रहे. युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं और प्रशासनिक सूचनाओं के आदान-प्रदान में भी इसकी बड़ी भूमिका रही.

    कैसे भेजा जाता था टेलीग्राम?

    टेलीग्राम भेजने के लिए लोग टेलीग्राफ कार्यालय जाते थे और अपने संदेश को कम से कम शब्दों में लिखवाते थे, क्योंकि शुल्क शब्दों की संख्या के हिसाब से लिया जाता था. इसके बाद संदेश को मोर्स कोड में बदला जाता था और तारों के जरिए दूसरे शहर के टेलीग्राफ कार्यालय तक भेजा जाता था. वहां इसे फिर सामान्य भाषा में लिखकर डाक कर्मचारी संबंधित व्यक्ति के घर तक पहुंचाता था.

    सैमुअल मोर्स ने दी दुनिया को नई तकनीक

    टेलीग्राम सेवा को लोकप्रिय बनाने का श्रेय अमेरिकी वैज्ञानिक और आविष्कारक सैमुअल मोर्स को दिया जाता है. उन्होंने ही मोर्स कोड विकसित किया, जिसके जरिए छोटे और लंबे संकेतों की मदद से संदेश भेजे जाते थे. यही तकनीक कई दशकों तक दुनिया की सबसे आधुनिक संचार व्यवस्था बनी रही.

    तकनीक बदली और खत्म हो गया टेलीग्राम का दौर

    समय के साथ संचार तकनीक तेजी से बदलने लगी. पहले टेलीफोन आया, फिर मोबाइल फोन, एसएमएस, ई-मेल और उसके बाद व्हाट्सएप जैसे इंटरनेट आधारित मैसेजिंग प्लेटफॉर्म ने लोगों की जिंदगी बदल दी. अब संदेश भेजने में न समय लगता था और न ही अतिरिक्त खर्च. इसी वजह से टेलीग्राम का इस्तेमाल लगातार घटता गया. जिस सेवा के जरिए कभी लाखों संदेश रोज भेजे जाते थे, उसकी जरूरत धीरे-धीरे खत्म होने लगी.

    14 जुलाई 2012 को भेजा गया आखिरी टेलीग्राम

    लगातार घटते उपयोग और बढ़ते घाटे को देखते हुए भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) ने टेलीग्राम सेवा बंद करने का फैसला लिया. 14 जुलाई 2012 को देशभर के टेलीग्राफ कार्यालयों से आखिरी टेलीग्राम भेजे गए. इस ऐतिहासिक पल का हिस्सा बनने के लिए कई लोगों ने खुद को और अपने परिजनों को अंतिम टेलीग्राम भेजे, ताकि यह याद हमेशा उनके पास रहे. 15 जुलाई 2012 से भारत में टेलीग्राम सेवा आधिकारिक तौर पर बंद हो गई और इसके साथ ही 163 साल पुराना एक गौरवशाली अध्याय इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया.

    आज भी जिंदा हैं टेलीग्राम की यादें

    आज नई पीढ़ी शायद टेलीग्राम को केवल किताबों या फिल्मों में ही देखती है, लेकिन जिन लोगों ने इसका दौर देखा है, उनके लिए यह सिर्फ एक संचार सेवा नहीं, बल्कि जिंदगी की अनगिनत यादों का हिस्सा है. किसी के लिए यह नौकरी मिलने की पहली खुशखबरी थी, तो किसी के लिए किसी अपने की आखिरी सूचना.

    भले ही आज स्मार्टफोन ने दुनिया को मुट्ठी में समेट दिया हो, लेकिन भारतीय संचार इतिहास में टेलीग्राम का स्थान हमेशा खास रहेगा. यह उस दौर की निशानी है, जब कुछ शब्दों में लिखा गया एक संदेश हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों के दिलों को जोड़ देता था.

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