झारखंड में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है. इसी बीच रांची कैथोलिक आर्चडायसिस की ओर से जारी एक पत्र सामने आया है, जिसमें आगामी 30 अगस्त को परिसीमन के विरोध में जुलूस निकालने और आदिवासी समाज के लोगों से बड़ी संख्या में इसमें शामिल होने की अपील की गई है.
15 अगस्त 2026 को जारी पत्र में आर्चडायसिस ने परिसीमन को आदिवासी समाज के लिए संभावित रूप से नुकसानदेह बताया है. पत्र में कहा गया है कि प्रस्तावित परिसीमन से ST आरक्षित सीटों में कमी, आदिवासी बहुल क्षेत्रों के विभाजन, पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों की राजनीतिक शक्ति कमजोर होने और आदिवासी नेतृत्व सीमित होने जैसे खतरे पैदा हो सकते हैं.
प्रतिनिधित्व कम नहीं होने देने की मांग
आर्चडायसिस ने पत्र में कहा है कि झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर पलायन होता रहा है और जनसंख्या वृद्धि में भी कमी आई है. इसके चलते वन एवं पहाड़ी क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व प्रभावित हुआ है. ऐसे में परिसीमन के दौरान केवल जनसंख्या को आधार बनाने के बजाय पांचवीं अनुसूची, ऐतिहासिक अधिकार, भौगोलिक स्थिति, आदिवासी जनसंख्या का घनत्व और पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखने की मांग की गई है. पत्र में कहा गया है कि आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रतिशत में कमी नहीं होनी चाहिए.
30 अगस्त को जुलूस, पल्लियों में केवल सुबह की मिस्सा
आर्चडायसिस ने अपने पत्र में 30 अगस्त को बड़ी संख्या में लोगों से जुलूस में शामिल होने की अपील की है. पत्र के मुताबिक, उस रविवार को हर पल्लि में केवल सुबह की मिस्सा रखी जाएगी और मिस्सा के बाद अन्य कार्यक्रम नहीं रखने की बात कही गई है, ताकि लोग जुलूस में हिस्सा ले सकें. पल्लि पुरोहितों से भी पत्र को पढ़कर सुनाने और पल्लिवासियों की जुलूस में अधिक से अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने को कहा गया है.
पत्र के सामने आने के बाद राजनीतिक बहस तेज
आर्चडायसिस के इस आह्वान के सामने आने के बाद झारखंड में परिसीमन और आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर राजनीतिक चर्चा और तेज होने की संभावना है. खास तौर पर यह सवाल उठ रहा है कि परिसीमन के संभावित प्रभावों को लेकर आदिवासी समाज की चिंताओं को किस तरह संबोधित किया जाएगा.
वहीं, इस पूरे मामले में राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया भी अहम होगी. एक तरफ आदिवासी क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों की चिंता जताई जा रही है, तो दूसरी तरफ परिसीमन की प्रक्रिया, उसके आधार और उसके राजनीतिक प्रभाव को लेकर बहस का मुद्दा बन सकता है.


