केरल हाईकोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों में राजनीतिक गतिविधियों को लेकर सख्त टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र में धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी गतिविधियों की जगह नहीं है, खासकर शिक्षण संस्थानों में. ऐसी गतिविधियों में शामिल छात्रों को निष्कासित या रस्टिकेट किया जा सकता है. कोर्ट ने दोहराया कि शिक्षण संस्थान पढ़ाई के लिए हैं, राजनीति के लिए नहीं.
जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्ण एस. की खंडपीठ ने श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय, कालडी के 16 निलंबित छात्रों के मामले में यह टिप्पणी की. कोर्ट ने एकल पीठ के 30 अक्टूबर के उस अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें छात्रों को 4 नवंबर से शुरू होने वाली सेमेस्टर परीक्षा में बैठने की अनुमति दी गई थी.
2017 के फैसले और आंबेडकर के भाषण का जिक्र
खंडपीठ ने 2017 के डॉ. एंटनी थॉमस बनाम वीएम मोहम्मद रफीक मामले का हवाला दिया. उस फैसले में भी कहा गया था कि शैक्षणिक संस्थानों में धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी राजनीतिक गतिविधियों की जगह नहीं है. राजनीतिक दल अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए शिक्षण संस्थानों को बंधक नहीं बना सकते और न ही दूसरे छात्रों के शिक्षा पाने के अधिकार में बाधा डाल सकते हैं.
कोर्ट ने संविधान सभा में 25 नवंबर 1949 को डॉ. भीमराव आंबेडकर के दिए भाषण का भी उल्लेख किया. आंबेडकर ने संवैधानिक रास्ते उपलब्ध होने के बावजूद सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह अपनाने को ‘Grammar of Anarchy’ यानी ‘अराजकता का व्याकरण’ बताया था.
क्या है पूरा मामला?
विश्वविद्यालय ने 13 अगस्त को कैंपस में हुई कथित घटनाओं की जांच लंबित रहने तक 1 सितंबर को 16 छात्रों को निलंबित कर दिया था. उनके कैंपस में प्रवेश पर भी रोक लगा दी गई थी. छात्रों ने निलंबन को चुनौती देते हुए कहा था कि इसके कारण उनकी कक्षाएं छूटीं और उपस्थिति कम हो गई. इसलिए उन्हें परीक्षा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए.
वहीं, विश्वविद्यालय ने दलील दी कि छात्र न्यूनतम उपस्थिति और आंतरिक परीक्षा सहित जरूरी पात्रता शर्तें पूरी नहीं करते हैं. उन्होंने उपस्थिति में कमी माफ कराने के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन भी नहीं किया था.
पात्रता साबित नहीं कर सके छात्र
खंडपीठ ने पाया कि छात्रों ने परीक्षा में शामिल होने की पात्रता साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज और आवेदन जमा नहीं किए थे. संबंधित विभागाध्यक्षों या केंद्र निदेशकों की अनुशंसा भी उपलब्ध नहीं थी.
कोर्ट ने कहा कि एकल पीठ ने पात्रता की जांच किए बिना ही छात्रों को परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी, जबकि अंतरिम आदेश से उन्हें याचिका में मांगी गई मुख्य राहत मिल गई थी. अदालतें विश्वविद्यालयों को उनके वैधानिक नियमों के विपरीत काम करने का निर्देश नहीं दे सकतीं. खंडपीठ ने एक अन्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि निलंबन के कारण उपस्थिति में आई कमी का खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ सकता है.
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