10 अक्टूबर की ऐतिहासिक तारीख भारतीय खेल इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है, क्योंकि इसी ऐतिहासिक क्रम और संदर्भ में रोहिणी खाडिलकर ने राष्ट्रीय शतरंज चैंपियनशिप का खिताब अपने नाम कर देश की पहली महिला खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया था. हालांकि, उन्होंने अपना पहला राष्ट्रीय महिला खिताब 13 वर्ष की आयु (1976) में ही कोट्टायम में जीत लिया था, लेकिन उनके जीवन का सबसे क्रांतिकारी और विद्रोही अध्याय 15 वर्ष की आयु (1978) में जुड़ा, जब उन्होंने पुरुषों के बीच खुली (Open) राष्ट्रीय ‘बी’ शतरंज प्रतियोगिता में भाग लेकर उनके वर्चस्व को खुली चुनौती दी थी.
भारतीय खेल इतिहास में कई ऐसी असाधारण महिला खिलाड़ी हुई हैं, जिन्होंने अपनी अदम्य प्रतिभा के बल पर न केवल अपनी एक अलग पहचान बनाई, बल्कि अपने समय की रूढ़िवादी और पुरुष-प्रधान धारणाओं को भी गहरी चुनौती दी. इन अग्रदूतों में रोहिणी खाडिलकर का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है. उन्होंने एक ऐसे दौर में शतरंज के फलक पर कदम रखा, जब राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पूरी तरह पुरुषों का वर्चस्व था और महिला खिलाड़ियों की भागीदारी को लेकर कई तरह की अघोषित सीमाएं और संकीर्णताएं मौजूद थीं.
मुंबई, महाराष्ट्र में जन्मी रोहिणी खाडिलकर का पूरा परिवार ही खेल और बौद्धिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ था. उनके पिता नीलकंठ खाडिलकर मराठी पत्रकारिता के एक जाने-माने और प्रतिष्ठित संपादक थे, जो ‘नवाकाल’ अखबार से जुड़े हुए थे. घर का माहौल बौद्धिक और प्रगतिशील था. रोहिणी की बड़ी बहनें वासंती खाडिलकर और जयश्री खाडिलकर भी शतरंज खेलती थीं और 1970 के दशक में इन तीनों बहनों ने भारतीय महिला शतरंज जगत में अपनी एक अलग ही धाक जमा ली थी.
शुरुआती वर्षों में राष्ट्रीय महिला शतरंज चैंपियनशिप पर खाडिलकर परिवार का दबदबा सा था, जहां वासंती खाडिलकर ने 1974 में, जयश्री खाडिलकर ने 1975 में और रोहिणी खाडिलकर ने महज 13 वर्ष की कम उम्र में 1976 में कोट्टायम में यह प्रतिष्ठित खिताब जीतकर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. इसके बाद रोहिणी ने रुकना नहीं सीखा और 1977 में हैदराबाद, 1979 में मद्रास, 1981 में नई दिल्ली और 1983 में नई दिल्ली में जीत दर्ज करते हुए कुल पांच बार राष्ट्रीय महिला चैंपियनशिप का ताज अपने नाम किया.
पुरुषों के लिए आयोजित शतरंज में भाग लेने वाली महिला
रोहिणी खाडिलकर के करियर का सबसे चर्चित और क्रांतिकारी प्रसंग वर्ष 1977 का है, जब उन्होंने पुरुषों के लिए आयोजित खुली राष्ट्रीय ‘बी’ शतरंज प्रतियोगिता में भाग लिया. यह प्रतियोगिता ओपन थी, लेकिन जैसे-जैसे रोहिणी ने अपने बेहतरीन खेल के दम पर मुकाबले जीतने शुरू किए, उनकी भागीदारी पर आपत्तियां उठाई जाने लगीं.
कुछ लोगों को यह बात नागवार गुज़री कि एक महिला खिलाड़ी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खेल रही है और आगे चलकर राष्ट्रीय ‘ए’ प्रतियोगिता के लिए क्वालिफाई कर सकती है. इस विवाद ने खेल जगत में एक बुनियादी और तीखा सवाल खड़ा कर दिया कि यदि प्रतियोगिता के नियम सभी खिलाड़ियों को भाग लेने की अनुमति देते हैं, तो केवल महिला होने के आधार पर किसी खिलाड़ी को क्यों रोका जाए. इस विषम परिस्थिति में रोहिणी के पिता नीलकंठ खाडिलकर ने पीछे हटने के बजाय मामले को अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष मैक्स यूवे के समक्ष उठाया. उनके इस साहसिक कदम के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हस्तक्षेप हुआ और यह सुनिश्चित किया गया कि महिलाओं को केवल उनके लिंग के आधार पर खुली प्रतियोगिताओं से बाहर नहीं किया जा सकता. यह घटना भारतीय महिला खेल इतिहास का एक मील का पत्थर साबित हुई.
राष्ट्रीय स्तर पर अपनी लोहा मनवाने के बाद रोहिणी ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी भारत का मान बढ़ाया. वर्ष 1981 में हैदराबाद में आयोजित पहली एशियाई महिला शतरंज चैंपियनशिप में उन्होंने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए 12 में से 11.5 अंक हासिल किए और एशियाई चैंपियन बनीं, जिसके साथ ही उन्हें ‘इंटरनेशनल वुमन मास्टर’ का खिताब मिला. इसके बाद साल 1983 में कुआलालंपुर में आयोजित प्रतियोगिता में उन्होंने एक बार फिर शानदार प्रदर्शन कर दूसरी बार एशियाई महिला शतरंज चैंपियनशिप जीती. इसके अलावा उन्होंने 1978 से 1986 के बीच लगातार पांच शतरंज ओलंपियाड ब्यूनस आयर्स, वैलेटा, ल्यूसर्न, थेसालोनिकी और दुबई में भारतीय महिला टीम का प्रतिनिधित्व किया. खेल के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट और अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1980 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिसके साथ ही वह यह प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली भारत की पहली महिला शतरंज खिलाड़ी बनीं. इसके पहले 1977 में उन्हें महाराष्ट्र सरकार द्वारा छत्रपति पुरस्कार से भी नवाजा गया था.
शतरंज के बाद पत्रकारिता में रखा कदम
रोहिणी खाडिलकर का जीवन केवल 64 खानों के खेल तक सीमित नहीं रहा. वर्ष 1993 में प्रतिस्पर्धी शतरंज से संन्यास लेने के बाद उन्होंने पूरी तरह से शिक्षा और पत्रकारिता की ओर रुख किया. उन्होंने प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी की पढ़ाई में स्वर्ण पदक हासिल किया और अग्फा-गेवर्ट से प्रिंटिंग डिप्लोमा प्राप्त किया. इसके बाद उन्होंने परिवार की पत्रकारिता की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ‘नवाकाल’ में सहायक संपादक की भूमिका निभाई और बाद में ‘संध्याकाल’ अखबार के संपादन की कमान संभाली.
साल 16 दिसंबर 1998 को ‘संध्याकाल’ की संपादक बनने के साथ ही उन्होंने महाराष्ट्र के किसी संध्याकालीन अखबार की पहली महिला संपादक बनने का गौरव भी हासिल किया. रोहिणी खाडिलकर की जीवन यात्रा इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, असीमित प्रतिभा और कड़े संघर्ष के बल पर सामाजिक और लैंगिक रूढ़ियों की दीवारों को कैसे ढहाया जा सकता है और आज भी जब देश में महिला सशक्तिकरण की बात होती है, तो उनका नाम एक प्रेरणास्त्रोत के रूप में सबसे पहले लिया जाता है.

