मुस्कान चौधरी
छठ के घाट पर जब शारदा सिन्हा की आवाज गूंजती है, तो लगता है जैसे कोई अपना ही लोकगीत सुना रहा हो. उनकी आवाज में बिहार की मिट्टी, लोक परंपरा और छठ की आस्था बसती थी. आज 1 अक्टूबर को उनकी जयंती पर जब हाल ही में आई फिल्म ‘Vvaan’ में उनका छठ गीत फिर सुनाई दे रहा है, तो उनकी यादें एक बार फिर ताजा हो गई हैं.
लेकिन शारदा सिन्हा की कहानी में रांची का एक ऐसा रिश्ता भी है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं. बिहार की इस मशहूर लोकगायिका का जन्म रांची जिले के मांडर स्थित मिशन नर्सिंग होम में हुआ था. उनके पिता उस समय रांची में एजुकेशन इंस्पेक्टर थे और परिवार रांची कचहरी स्थित डीएसी कार्यालय के पास रहता था. दिलचस्प बात यह है कि शारदा सिन्हा का नाम तब ‘विजया’ था.
इस रांची कनेक्शन का खुलासा खुद शारदा सिन्हा ने किया था. खलारी में एक कार्यक्रम के दौरान उनसे हुई बातचीत और इंटरव्यू में उन्होंने अपने बचपन की ये बातें साझा की थीं. यह इंटरव्यू 8 दिसंबर 1991 को ‘प्रभात खबर’ की रविवारीय पत्रिका में प्रकाशित हुआ था.
आज उनकी जयंती पर उनकी आवाज को याद करते हुए यह जानना भी दिलचस्प है कि बिहार की लोकगायिकी की जिस आवाज ने दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई, उसकी शुरुआती कहानी रांची से भी जुड़ी हुई है.
‘मेरा जन्म मांडर में हुआ था… मेरा नाम विजया था’
शारदा सिन्हा के जीवन की आधिकारिक और सार्वजनिक जीवनी में उनका जन्म बिहार के सुपौल जिले के हुलास गांव से बताया जाता है. उनके पैतृक गांव में आज भी उनके बचपन और परिवार से जुड़ी स्मृतियां मौजूद हैं. लेकिन उनकी जिंदगी से जुड़ा एक दूसरा महत्वपूर्ण संदर्भ भी सामने आता है.
शारदा सिन्हा ने खुद एक बातचीत में बताया था कि उनका जन्म झारखंड के रांची जिले के मांडर स्थित एक मिशन अस्पताल में हुआ था. उस समय उनके पिता शिक्षा विभाग में अधिकारी थे. उन्होंने यह भी बताया था कि बचपन में उनका नाम विजया था. यही वह बात है, जिसे पत्रकार मुक्ति नाथ गिरी आज भी बेहद भावुक होकर याद करते हैं.


गिरी बताते हैं कि शारदा सिन्हा के पिता उस समय रांची में एजुकेशन इंस्पेक्टर थे. उनका परिवार रांची कचहरी स्थित डीएसी कार्यालय के पास रहता था. यानी रांची सिर्फ उनके पिता की पोस्टिंग की जगह नहीं थी, बल्कि उनके शुरुआती जीवन की स्मृतियों का भी एक हिस्सा थी. और इस कहानी को सिर्फ किसी सुनी-सुनाई बात के तौर पर नहीं देखा जा सकता. क्योंकि इसे खुद शारदा सिन्हा ने एक बातचीत में साझा किया था.
1991… खलारी में हुई वह मुलाकात
साल था 1991. खलारी में एक कार्यक्रम के दौरान पत्रकार मुक्ति नाथ गिरी ने शारदा सिन्हा का इंटरव्यू किया. बातचीत सामान्य सवाल-जवाब से कहीं आगे चली गई. सामने बैठी गायिका सिर्फ अपने संगीत की कहानी नहीं बता रही थीं, बल्कि अपने बचपन, परिवार और जीवन के उन हिस्सों को भी याद कर रही थीं, जो शायद मंच की चमक से दूर रह गए थे. गिरी ने उस बातचीत को शब्दों में दर्ज किया.
फिर 8 दिसंबर 1991 को प्रभात खबर की रविवारीय पत्रिका में वह इंटरव्यू प्रकाशित हुआ. यह वह दौर था जब आज की तरह मोबाइल कैमरे, सोशल मीडिया और डिजिटल आर्काइव नहीं थे. किसी कलाकार से हुई बातचीत को बचाए रखने का सबसे भरोसेमंद तरीका अखबार के पन्ने ही हुआ करते थे.
शारदा सिन्हा को उस इंटरव्यू की प्रकाशित प्रतिलिपि मिली. उन्होंने उसे पढ़ा. और फिर पत्र लिखकर उसकी सराहना भी की. यह छोटी-सी बात आज बहुत बड़ी स्मृति बन चुकी है. क्योंकि वह सिर्फ एक इंटरव्यू की तारीफ नहीं थी. वह एक कलाकार का अपने बारे में लिखे गए शब्दों को स्वीकार करना था. एक पत्रकार के लिए इससे बड़ी उपलब्धि शायद यही होती है कि उसकी लिखी हुई बात उस व्यक्ति तक पहुंचे, जिसके जीवन को उसने दर्ज किया है.
‘विजया’ से ‘शारदा’ बनने तक
शारदा सिन्हा की पहचान बाद में जिस ऊंचाई तक पहुंची, उसकी शुरुआत बेहद सहज थी. शादी के बाद शारदा सिन्हा के सामने पहली बड़ी चुनौती संगीत को लेकर ही आई. उनकी सास को उनका बाहर जाकर गाना पसंद नहीं था. लेकिन पति ब्रजकिशोर सिन्हा ने उनका साथ दिया. शारदा सिन्हा ने खुद कई मौकों पर बताया था कि उनके पति उनके संगीत के सबसे बड़े समर्थकों में थे.
एक वक्त था जब लोग यह तक पूछते थे कि पत्नी को गाने-बजाने की अनुमति देने वाला पति कैसा है. फिर जब शारदा सिन्हा की आवाज लोगों तक पहुंची और उनके गीत लोकप्रिय हुए, वही नजरिया बदलता गया. यानी जिस आवाज को रोकने की कोशिश हो रही थी, वही धीरे-धीरे लोगों की आवाज बनने लगी.
19 की उम्र में बेगम अख्तर से मुलाकात
शारदा सिन्हा का संगीत सफर भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था. करीब 19 साल की उम्र में वह लखनऊ में HMV के टैलेंट ऑडिशन के लिए पहुंची थीं. संयोग से उस ऑडिशन में महान गायिका बेगम अख्तर बतौर अतिथि निर्णायक मौजूद थीं. शारदा सिन्हा ने मैथिली का विवाह गीत सुनाया.
बेगम अख्तर उनकी आवाज से प्रभावित हुईं और उन्हें रियाज जारी रखने की सलाह दी. यही मौका उनके संगीत सफर की एक बड़ी सीढ़ी बना. आगे चलकर यही आवाज 1500 से ज्यादा गीतों तक पहुंची और मैथिली, भोजपुरी, मगही, हिंदी समेत कई भाषाओं में अपनी पहचान बनाई.
जिस विदाई में गाया, वही पहचान बनी
अपनी शादी की विदाई से कुछ घंटे पहले शारदा सिन्हा ने पिता के कहने पर विदाई गीत गाया था. वह खुद याद करती थीं कि माहौल बेहद भावुक था और सभी रो रहे थे, फिर भी उन्होंने गीत गाया. बाद में उनकी आवाज में गाए शादी के गीत घर-घर पहुंचे.
यह संयोग अपने आप में बेहद खूबसूरत है. जिस लड़की ने अपनी ही विदाई में गीत गाया था, वही आगे चलकर हजारों-लाखों बेटियों की विदाई की आवाज बन गईं. शायद यही वजह थी कि उनके गीतों में सिर्फ सुर और मिठास नहीं थी, उनमें रिश्तों की कसक, बिछड़ने का दर्द और अपनों से दूर होने का एहसास भी साफ सुनाई देता था.

उनकी आवाज में लोक की सादगी थी, लेकिन सुरों में शास्त्रीय अनुशासन. यही वजह थी कि जब वह गाती थीं तो गीत सिर्फ सुना नहीं जाता था, महसूस किया जाता था. उन्होंने फिल्मों के लिए भी गीत गाए. ‘मैंने प्यार किया’ का “कहे तोसे सजना” हो या ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर-2’ का “तार बिजली”, उनकी आवाज ने लोक और मुख्यधारा के संगीत के बीच की दूरी को कम किया. लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी छठ गीतों से.
छठ और शारदा सिन्हा, जैसे एक-दूसरे के पर्याय
छठ पूजा के गीतों को उन्होंने सिर्फ गाया नहीं, उन्हें पीढ़ियों की स्मृति में स्थायी जगह दिलाई. “पाहिले-पहिल छठी मईया”, “सुपवो ना मिले माई”, “केलवा के पात पर”, “बहंगी लचकत जाए”, “पटना के घाट पर” जैसे गीतों ने शारदा सिन्हा की आवाज को बिहार और पूर्वांचल के घर-घर तक पहुंचाया.

उनके गीतों में कोई बनावटीपन नहीं था. वह लोक को लोक की ही भाषा में गाती थीं. शायद यही कारण है कि उनके गीत सुनते हुए लोगों को लगता था कि कोई बड़ी कलाकार नहीं, बल्कि उनके अपने घर की कोई महिला, मां, बहन या दादी वही गीत गा रही है. भारत सरकार के पद्म सम्मान से जुड़ी आधिकारिक जानकारी भी बताती है कि छठ से जुड़े उनके गीत कई पीढ़ियों से लोगों की स्मृतियों का हिस्सा बने रहे.
आखिरी वक्त तक नहीं टूटा छठ से रिश्ता
जिंदगी के आखिरी दौर में भी शारदा सिन्हा की आवाज छठ से जुड़ी रही. एम्स में इलाज के दौरान उन्होंने अपना अंतिम छठ गीत ‘दुखवा मिटाई छठी मइया’ रिकॉर्ड किया. छठ से कुछ दिन पहले यह गीत सामने आया था.
5 नवंबर 2024 को 72 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ. लेकिन उनकी आवाज वहीं रह गई, जहां से उनका सफर शुरू हुआ था-लोकगीतों में, घरों में और छठ के घाटों पर. आज भी छठ आते ही जब कहीं दूर से शारदा सिन्हा की आवाज सुनाई देती है, तो लगता है जैसे कोई बहुत अपना पुकार रहा हो.
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