बिहार की कानून-व्यवस्था को लेकर एक बार फिर सियासी बवाल खड़ा हो गया है. इस बार निशाना साधा है. खुद सत्ताधारी गठबंधन के एक सांसद शंभू शरण पटेल ने राज्य की पुलिस व्यवस्था पर तीखे सवाल उठाते हुए कहा कि अपराधियों के भीतर से कानून का भय पूरी तरह खत्म हो चुका है.
सांसद शंभू शरण पटेल ने अपने बयान में कहा,
“अपराधियों में कानून का भय नहीं है. बिहार में पुलिस व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है.”
उनका यह बयान बिहार की मौजूदा कानून-व्यवस्था की तस्वीर पर एक गंभीर टिप्पणी माना जा रहा है, खासकर इसलिए कि यह बयान किसी विपक्षी नेता की ओर से नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ गठबंधन के घटक दल भाजपा के ही एक सांसद की ओर से आया है.
पटेल ने अपने बयान में इस बात पर विशेष जोर दिया कि जब अपराधियों के मन से कानून का डर ही निकल जाए, तो यह पूरी पुलिसिंग व्यवस्था के लिए एक बड़ा और गंभीर प्रश्न बन जाता है. उन्होंने राज्य की मौजूदा पुलिसिंग व्यवस्था को पूरी तरह विफल करार दिया.
शंभू शरण पटेल को 2022 में बिहार से राज्यसभा के लिए भाजपा उम्मीदवार बनाया गया था, और तभी से वे राज्यसभा में बिहार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. पार्टी के भीतर से आया यह बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि यह दिखाता है कि कानून-व्यवस्था का मुद्दा अब केवल विपक्ष तक सीमित नहीं रह गया है.
सांसद पटेल का यह बयान ऐसे समय आया है जब बिहार में अपराध और कानून-व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस पहले से ही गरम है. हाल के दिनों में विपक्ष लगातार राज्य सरकार को इस मुद्दे पर घेरता रहा है.
राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रदेश प्रवक्ता एजाज अहमद ने भी हाल ही में आरोप लगाया था कि राज्य सरकार बिहार में अपराध और अपराधियों पर नियंत्रण करने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है, और शासन-प्रशासन का इस्तेमाल राजनीतिक हित साधने के लिए किया जा रहा है, जिससे कानून-व्यवस्था कमजोर हो रही है. उनका कहना था कि अपराधियों का मनोबल बढ़ा हुआ है और पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई में निष्पक्षता की कमी दिख रही है.
जमुई में हुई एक छेड़छाड़ की घटना के बाद कांग्रेस नेताओं ने भी सरकार पर हमला बोला था, जिसमें कहा गया कि महिलाओं के प्रति अपराध पहले भी होते रहे हैं, लेकिन कड़ी कार्रवाई न होने से अपराधियों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं.
एक सत्तापक्ष के सांसद की ओर से आया यह बयान बिहार की कानून-व्यवस्था पर छिड़ी बहस को और तेज़ कर सकता है. जहां विपक्ष लंबे समय से राज्य सरकार को इस मुद्दे पर घेरता आया है, वहीं अब सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर से ही उठी यह आवाज़ आने वाले दिनों में सियासी हलचल बढ़ा सकती है.
Also Read : एशियन गेम्स मैराथनः कौन है वो सेना का जवान, जिसने 44 साल बाद दिलाया भारत को पदक

