केन्या के आदिवासी समुदायों के बीच भी असम के आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता प्रनब डोले की गिरफ्तारी का मुद्दा जोर-शोर से गूंज रहा है. जंगल, जमीन और आदिवासी अधिकारों की लंबी लड़ाई लड़ने वाले डोले को जुलाई में गिरफ्तार किया गया था.
उनकी यह गिरफ्तारी काजीरंगा नेशनल पार्क के पास प्रस्तावित एक लग्जरी होटल परियोजना के तीखे विरोध से जुड़ी है. डोले की हिरासत को लेकर न सिर्फ भारत में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आदिवासी अधिकार संगठनों ने भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं.
कौन हैं प्रनब डोले और क्या था काजीरंगा विवाद?
प्रनब डोले असम के एक जाने-माने आदिवासी और भूमि अधिकार कार्यकर्ता हैं. वह Greater Kaziranga Land and Human Rights Protection Committee के संयोजक हैं और असम के मूलनिवासी समुदायों के जमीन व संसाधनों से जुड़े अधिकारों के लिए मुखर होकर आवाज उठाते रहे हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना की ‘Indigenous Rights and Protected Areas Initiative’ ने भी उन्हें मिजिंग समुदाय के ‘Indigenous human rights defender’ के तौर पर मान्यता दी है.
विवाद की शुरुआत असम के काजीरंगा नेशनल पार्क के पास ‘इंग्ले पथर’ (Inglay Pathar) इलाके में प्रस्तावित एक लग्जरी होटल परियोजना को लेकर हुई. यहां लगभग 60 बीघा कृषि भूमि पर होटल बनाने की योजना थी, जिसका स्थानीय लोगों और कार्यकर्ताओं ने कड़ा विरोध किया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस जमीन पर लंबे समय से करीब 45 आदिवासी परिवार खेती करते आ रहे थे. डोले और उनके साथियों का साफ आरोप था कि इस परियोजना से स्थानीय समुदायों के जमीन और आजीविका के पारंपरिक अधिकार छिन जाएंगे.
गिरफ्तारी और जमानत के बाद NSA का शिकंजा
होटल परियोजना के खिलाफ 28-29 जून 2026 को बड़ा प्रदर्शन हुआ था, जिसके बाद पुलिस ने प्रनब डोले समेत कई अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया. आखिरकार 12 जुलाई को डोले को गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर गैरकानूनी जमावड़ा, दंगा, सरकारी काम में बाधा और आपराधिक धमकी जैसी विभिन्न धाराएं लगाई गईं.
मामले में नया मोड़ तब आया जब 29 जुलाई को अदालत ने प्रनब डोले को जमानत दे दी, लेकिन इसके ठीक अगले ही दिन असम सरकार ने उन पर कड़ा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगा दिया. सरकार का तर्क था कि उनकी गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य की सुरक्षा के लिए प्रतिकूल थीं. इसी वजह से अदालत से जमानत मिलने के बावजूद उनकी रिहाई नहीं हो सकी और हिरासत जारी रही.
असम से लेकर केन्या और संयुक्त राष्ट्र तक विरोध की गूंज
प्रनब डोले की गिरफ्तारी के खिलाफ असम में लगातार प्रदर्शन जारी रहे. गुवाहाटी में 23 अगस्त को विभिन्न भूमि अधिकार संगठनों ने प्रदर्शन कर उनकी बिना शर्त रिहाई और NSA हटाने की मांग की. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि आदिवासी इलाकों में जमीन के हक की आवाज दबाने के लिए इस तरह के कठोर कानूनों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए.
यह मामला अब वैश्विक स्तर पर फैल चुका है. संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने जुलाई में ही डोले समेत पांच स्वदेशी मानवाधिकार रक्षकों (Indigenous human rights defenders) की गिरफ्तारी पर गहरी चिंता जताई थी. विशेषज्ञों का कहना था कि इस तरह की कार्रवाई से नागरिक और आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने का स्पेस सीमित होता है.
दूसरी ओर, केन्या के आदिवासी समुदायों की लड़ाई भी लंबे समय से जमीन, जंगल और संरक्षण परियोजनाओं से जुड़ी रही है, जिसके चलते डोले का यह मामला अंतरराष्ट्रीय आदिवासी अधिकार आंदोलन का एक बड़ा प्रतीक बन गया है. यह घटना अब एक बड़े वैश्विक सवाल को जन्म देती है कि क्या वन्यजीवों और पर्यावरण संरक्षण के नाम पर पीढ़ियों से जंगलों में रह रहे आदिवासियों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है?
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