जोहार लाइव ब्यूरो
झारखंड में अदालतों में लंबे समय से लंबित मामलों के निपटारे के लिए अब मध्यस्थता यानी Mediation पर खास जोर दिया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट की Mediation and Conciliation Project Committee (MCPC) की ओर से चलाए जा रहे “Mediation for the Nation 3.0” अभियान के तहत देशभर के साथ झारखंड में भी 90 दिनों का विशेष मेडिएशन ड्राइव चलाया जाएगा.
झारखंड सरकार के विधि विभाग ने सभी अपर मुख्य सचिव, प्रधान सचिव, सचिव, महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक को पत्र भेजकर इस अभियान के सफल संचालन में सहयोग करने को कहा है. पत्र में झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार यानी JHALSA की ओर से भेजे गए निर्देशों का भी हवाला दिया गया है.
1 अक्टूबर से शुरू होगा 90 दिनों का अभियान
अभियान की शुरुआत 1 अक्टूबर 2026 से होगी. इससे पहले 30 सितंबर तक ऐसे लंबित मामलों की पहचान करने का निर्देश दिया गया है, जिनमें समझौते की संभावना है और जिन्हें मेडिएशन के लिए भेजा जा सकता है. निर्देश के मुताबिक, चिन्हित मामलों की सूची अधिक से अधिक संख्या में JHALSA के मेंबर सेक्रेटरी कार्यालय को भेजी जानी है. इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत इन मामलों को मेडिएशन सेंटरों तक भेजा जाएगा.
अभियान के दौरान मामलों से जुड़ा डेटा भी तय फॉर्मेट में MCPC को भेजा जाएगा. इसके लिए 30 अक्टूबर, 30 नवंबर 2026 और 2 जनवरी 2027 की रिपोर्टिंग टाइमलाइन तय की गई है.
लेकिन आगे बढ़ने से पहले समझिए कि इसमें JHALSA, DLSA और NALSA क्या हैं?
- JHALSA यानी Jharkhand State Legal Services Authority. यह झारखंड में लोगों को कानूनी सहायता और लोक अदालत, मेडिएशन जैसी वैकल्पिक विवाद समाधान सेवाओं से जोड़ने वाली राज्य स्तरीय संस्था है.
- वहीं DLSA यानी District Legal Services Authority. यह जिला स्तर पर काम करती है और लोगों को कानूनी सहायता, लोक अदालत और मेडिएशन जैसी सेवाओं तक पहुंचाने में मदद करती है.
- और NALSA यानी National Legal Services Authority, राष्ट्रीय स्तर की संस्था है, जो देशभर में कानूनी सेवा और न्याय तक पहुंच से जुड़े कार्यक्रमों का समन्वय करती है.
किन मामलों को मेडिएशन के लिए भेजा जा सकता है?
SOP में ऐसे मामलों की कई श्रेणियां बताई गई हैं, जिनमें समझौते की गुंजाइश होने पर मेडिएशन कराया जा सकता है. इनमें वैवाहिक विवाद, दुर्घटना से जुड़े दावे, चेक बाउंस मामले, कंपाउंडेबल क्रिमिनल केस, उपभोक्ता विवाद, कर्ज वसूली और SARFAESI मामले, एग्जीक्यूशन प्रोसीडिंग्स, आर्बिट्रेशन से जुड़े मामले और व्यावसायिक विवाद शामिल हैं.
इसके अलावा सर्विस केस, बंटवारे के मामले, बेदखली के मामले, भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामले, लेबर एक्ट केस और अन्य उपयुक्त सिविल मामलों को भी मेडिएशन के लिए चिन्हित किया जा सकता है. हालांकि, किसी मामले को मेडिएशन में भेजने का आधार यह होगा कि उसमें समझौते की वास्तविक संभावना मौजूद हो.
ऑनलाइन या आमने-सामने हो सकेगी मेडिएशन
अभियान के दौरान पक्षकारों की सुविधा को भी ध्यान में रखा गया है. SOP के मुताबिक, मेडिएशन ऑफलाइन, ऑनलाइन या हाइब्रिड मोड में कराया जा सकता है. जो पक्षकार ऑनलाइन माध्यम से शामिल होना चाहते हैं, उन्हें इसकी सुविधा दी जाएगी. संबंधित तालुका या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ऑनलाइन मेडिएशन की प्रक्रिया में मदद करेगा.
इसके अलावा जरूरत के मुताबिक सप्ताह के सभी सात दिनों में मेडिएशन सेटलमेंट की कोशिश की जा सकती है, ताकि पक्षकारों की सुविधा के अनुसार मामलों को निपटाने का प्रयास किया जा सके.
ज्यादा से ज्यादा मामलों की पहचान पर जोर
अभियान के तहत सिर्फ पहले से चिन्हित कुछ खास श्रेणियों तक ही कार्रवाई सीमित नहीं रहेगी. SOP में कहा गया है कि हाईकोर्ट की मेडिएशन कमेटी अपनी सुविधा के अनुसार किसी खास श्रेणी पर ज्यादा ध्यान दे सकती है, लेकिन अगर किसी दूसरी श्रेणी के मामले में भी समझौते की संभावना है, तो उसे भी चिन्हित कर मेडिएशन के लिए भेजा जा सकता है.
इसके लिए मौजूदा मेडिएटर्स की सेवाएं लेने के साथ नए प्रशिक्षित मेडिएटर्स को भी जरूरत के अनुसार लगाया जा सकता है. रेफरल जजों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने का भी प्रावधान किया गया है.
लोगों को क्या फायदा होगा?
1. लंबे समय से चल रहे केस में जल्दी समाधान की कोशिश.
2. कोर्ट आने-जाने का समय और खर्च कम हो सकता है.
3. आमने-सामने बातचीत का रास्ता.
4. घर बैठे ऑनलाइन मेडिएशन की सुविधा.
5. सिर्फ एक तरह के केस नहीं.
6. सप्ताह के सातों दिन समाधान की कोशिश.
अभियान के असर का भी होगा आकलन
Mediation for the Nation 3.0 अभियान खत्म होने के बाद इसके असर का आकलन भी किया जाएगा. हाईकोर्ट की मेडिएशन कमेटी को रेफरल, सफल मेडिएशन, असफल मेडिएशन और जिन मामलों में प्रक्रिया शुरू ही नहीं हो सकी, उनका impact assessment तैयार करना होगा.
इस रिपोर्ट को अभियान पूरा होने के 30 दिनों के भीतर MCPC को भेजना होगा. इस 90 दिनों के अभियान का मकसद लंबित मामलों में जहां समझौते की गुंजाइश है, वहां पक्षकारों की सहमति से विवाद का समाधान कराने और अदालतों पर लंबित मामलों के बोझ को कम करने की दिशा में प्रयास करना है.
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