आज से ठीक 48 साल पहले, 7 सितंबर 1978 को, ब्रिटेन के ITV चैनल पर एक ऐसी डॉक्यूमेंट्री प्रसारित हुई थी, जिसने मेडिकल साइंस को लेकर लोगों की सोच बदल दी. नाम था “To Mrs Brown… A Daughter”.यह कहानी थी लुईस जॉय ब्राउन की, जो दुनिया की पहली सफल IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक से जन्मी बच्ची थीं. उस दौर में जब बांझपन का कोई भरोसेमंद इलाज मौजूद नहीं था और IVF जैसी नई तकनीक को लेकर समाज में डर और सवाल दोनों थे, इस 25 मिनट की फिल्म ने आम लोगों को पहली बार करीब से दिखाया कि विज्ञान की यह उपलब्धि किस तरह लाखों दंपतियों के लिए उम्मीद की नई किरण बन सकती है.
दो डॉक्टरों की मेहनत और लेस्ली ब्राउन का सफर
लुईस की मां लेस्ली ब्राउन की फैलोपियन ट्यूब में रुकावट थी, जिसके कारण वे प्राकृतिक तरीके से गर्भधारण नहीं कर पा रही थीं. वे और उनके पति जॉन ब्राउन लंबे समय से संतान की उम्मीद लगाए बैठे थे. इसी बीच गायनोकोलॉजिस्ट डॉ. पैट्रिक स्टेपटो और फिजियोलॉजिस्ट डॉ. रॉबर्ट एडवर्ड्स ने मिलकर इस चुनौती का हल निकालने की ठानी. स्टेपटो ने लेस्ली के शरीर से अंडाणु निकाला, जिसे एडवर्ड्स की टीम ने लैब में शुक्राणु के साथ मिलाकर भ्रूण तैयार किया और फिर लेस्ली के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया. नतीजा दुनिया के सामने आया 25 जुलाई 1978 को, जब लेस्ली ने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया. यही लुईस जॉय ब्राउन, दुनिया की पहली IVF बेबी. इस उपलब्धि के लिए डॉ. एडवर्ड्स को 2010 में नोबेल पुरस्कार मिला; डॉ. स्टेपटो का 1988 में निधन हो चुका था, इसलिए उन्हें यह सम्मान नहीं मिल सका.
टीवी पर दिखी लुईस की कहानी
लुईस का जन्म खुद में एक बड़ी खबर था, पर लोगों के मन में यह सवाल था कि क्या यह बच्ची बाकी बच्चों जैसी सामान्य जिंदगी जी पाएगी. इसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए जन्म के करीब छह हफ्ते बाद, 7 सितंबर 1978 को थेम्स टेलीविजन ने प्रोड्यूसर पीटर विलियम्स की बनाई करीब 25 मिनट की डॉक्यूमेंट्री “To Mrs Brown… A Daughter” प्रसारित की. इसमें ब्राउन दंपति की कहानी के साथ डॉक्टरों के काम को भी दिखाया गया. उस दौर में IVF को लेकर समाज में डर और नैतिक सवाल दोनों मौजूद थे, ऐसे में इस फिल्म ने आम लोगों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि यह तकनीक डरावनी नहीं, बल्कि उम्मीद की नई किरण है. डेली मेल और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबारों ने फिल्म की तारीफ की, वहीं गार्डियन की समीक्षक नैंसी बैंक्स-स्मिथ ने हल्की आलोचना के बावजूद इसकी लैप्रोस्कोपी फुटेज को दिलचस्प बताया. आगे चलकर यही सीरीज “This Week” और बाद में “TV Eye” के नाम से मशहूर हुई.
लुईस ब्राउन बड़ी होकर सामान्य जीवन जीने लगीं और बाद में उन्होंने प्राकृतिक रूप से खुद भी संतान को जन्म दिया. 48 साल बाद आज IVF लाखों परिवारों के लिए उम्मीद की तकनीक बन चुकी है, और लुईस की कहानी याद दिलाती है कि विज्ञान असंभव को भी संभव बना सकता है.
इस फिल्म का नाम था “To Mrs Brown… A Daughter”
थेम्स टेलीविजन की इस डॉक्यूमेंट्री को प्रोड्यूसर पीटर विलियम्स ने बनाया था. करीब 25 मिनट की इस फिल्म में लेस्ली और जॉन ब्राउन की कहानी के साथ-साथ डॉक्टर पैट्रिक स्टेपटो और रॉबर्ट एडवर्ड्स के काम को भी दिखाया गया. उस समय IVF लोगों के लिए बिल्कुल नई तकनीक थी. कई लोग इसे लेकर डरे हुए थे और कुछ लोग इसे नैतिक रूप से गलत भी मानते थे. ऐसे समय में इस डॉक्यूमेंट्री ने लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि IVF कोई डरावनी चीज नहीं, बल्कि उन दंपतियों के लिए एक नई उम्मीद हो सकती है जो प्राकृतिक रूप से बच्चे पैदा नहीं कर पा रहे हैं.
लुईस के जन्म ने बदल दी IVF की दुनिया
लुईस ब्राउन का जन्म सिर्फ एक बच्ची का जन्म नहीं था. यह मेडिकल साइंस के लिए एक बड़ी सफलता थी. उनके जन्म के बाद IVF तकनीक पर दुनिया भर में काम तेजी से आगे बढ़ा. धीरे-धीरे इस तकनीक में सुधार हुआ और लाखों परिवारों के लिए माता-पिता बनने का रास्ता खुला. इस महत्वपूर्ण काम के लिए डॉ. रॉबर्ट एडवर्ड्स को 2010 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उनके साथी डॉ. पैट्रिक स्टेपटो का 1988 में निधन हो चुका था, इसलिए उन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जा सका.
48 साल बाद भी खास है 7 सितंबर की तारीख
आज 7 सितंबर 2026 है. इस दिन की खास बात यह है कि ठीक 48 साल पहले, 7 सितंबर 1978 को, लुईस ब्राउन पर बनी ऐतिहासिक डॉक्यूमेंट्री पहली बार ITV पर प्रसारित हुई थी. उस समय यह फिल्म सिर्फ एक टीवी कार्यक्रम नहीं थी. यह आम लोगों और नई मेडिकल तकनीक के बीच एक पुल की तरह थी. लोगों ने पहली बार टीवी पर देखा कि IVF से जन्मी बच्ची भी बिल्कुल सामान्य और स्वस्थ हो सकती है. आज IVF दुनिया के कई हिस्सों में बांझपन के इलाज का एक जाना-पहचाना तरीका है. लेकिन 1978 में यह तकनीक लोगों के लिए बिल्कुल नई और विवादित थी.
लुईस ब्राउन बड़ी हुईं और उन्होंने सामान्य जीवन जिया. बाद में उन्होंने प्राकृतिक रूप से अपने बच्चों को भी जन्म दिया. उनकी जिंदगी इस बात का एक अहम उदाहरण बनी कि IVF से जन्म लेने वाला बच्चा आगे चलकर सामान्य जीवन जी सकता है और उसके अपने बच्चे भी हो सकते हैं.
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