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    Home»जोहार ब्रेकिंग»केरल: ईसाई पादरी के घर में हिंदू विधान से हुआ महिला का अंतिम संस्कार
    जोहार ब्रेकिंग

    केरल: ईसाई पादरी के घर में हिंदू विधान से हुआ महिला का अंतिम संस्कार

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkAugust 26, 2026No Comments3 Mins Read0
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    Parvathi payamma
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    केरल के एर्नाकुलम जिले से इंसानियत और रिश्ते की एक बेहद खास कहानी सामने आई है. चोट्टानिक्करा में एक ईसाई पादरी के घर सोमवार को वैदिक मंत्र गूंजे, दीप जलाए गए और हिंदू रीति-रिवाजों के साथ 88 साल की पार्वती उर्फ पयम्मा को अंतिम विदाई दी गई. लेकिन खास बात ये है कि पयम्मा हिंदू थीं और जिस घर में उनकी अंतिम रस्में हुईं, वह घर ऑर्थोडॉक्स चर्च के पादरी फादर ओ. जे. जैकब का है.

    26 साल पहले घर में काम करने आई थीं

    पार्वती की कहानी जैकब के परिवार में साल 2000 से शुरू होती है, जब पार्वती जैकब के घर में काम करने आई थी. उस समय पार्वती की जीवन आसान नहीं थी. क्योंकि पार्वती ने महज 9 साल की उम्र में अपने माता-पिता को खो दिया था. इसके बाद उन्होंने कई घरों में काम किया और करीब 35 साल तक घरेलू कामगार के तौर पर जिंदगी बिताई.

    लेकिन जैकब परिवार के घर आने के बाद उनकी जिंदगी बदल गई. छह साल की बच्ची के लिए मां जैसी बन गईं. दरअसल, उस समय फादर जैकब की पत्नी का निधन हो चुका था. उनकी छह साल की बेटी मेरिन की जिम्मेदारी अकेले फादर जैकब पर थी. पार्वती ने मेरिन की देखभाल शुरू की. धीरे-धीरे दोनों के बीच ऐसा रिश्ता बना कि मेरिन उन्हें घर की काम करने वाली महिला नहीं, बल्कि मां जैसा मानने लगीं.

    द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, फादर जैकब ने को बताया कि उनकी बेटी पार्वती को प्यार से ‘पयम्मा’ कहती थी. समय के साथ पयम्मा इस परिवार का इतना अहम हिस्सा बन गईं कि जब मेरिन की शादी हुई, तब भी वह चर्च में उनके साथ मां की तरह खड़ी रहीं.

    मौत के बाद भी परिवार ने निभाया रिश्ता

    पयम्मा की तबीयत करीब एक हफ्ते से खराब थी और वह पेलिएटिव केयर में थीं. रविवार रात 88 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. इसके बाद जैकब परिवार ने तय किया कि पयम्मा की अंतिम विदाई उसी हिंदू परंपरा के अनुसार होगी, जिसे वह (पयम्मा) मानती थीं.

    घर पर हिंदू पुरोहित ने मंत्र पढ़े, धार्मिक रस्में हुईं और पयम्मा के दूर के रिश्तेदारों ने हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार की रस्में पूरी कीं. फादर जैकब ने कहा कि 26 साल तक साथ रहने के बाद पयम्मा धीरे-धीरे उनके घर की सदस्य बन गई थीं.

    सिर्फ एक परिवार की नहीं थीं पयम्मा

    पयम्मा का रिश्ता सिर्फ जैकब परिवार तक सीमित नहीं था. चोट्टानिक्करा पंचायत सदस्य अलीना जॉर्ज ने बताया कि इलाके के कई बच्चे भी पयम्मा को मां की तरह मानते थे. लोग उन्हें पार्वती के बजाय प्यार से ‘पयम्मा’ कहते थे.

    सोमवार को उनकी अंतिम विदाई के लिए इलाके की कई लड़कियां भी पहुंचीं. ये वही लड़कियां थीं, जो पयम्मा के प्यार और देखभाल के बीच बड़ी हुई थीं. धर्म अलग था, रिश्ता अपना था. पयम्मा की कहानी बहुत सीधी है. वह 26 साल पहले एक घर में काम करने आई थीं. लेकिन वक्त के साथ वह उसी घर की सदस्य बन गईं.

    और जब आखिरी विदाई का वक्त आया, तो उस परिवार ने उनके धर्म को नहीं, उनकी पहचान और उनकी भावनाओं को सम्मान दिया. शायद यही वजह है कि पयम्मा की आखिरी विदाई सिर्फ एक परिवार का अंतिम संस्कार नहीं थी, बल्कि एक ऐसे रिश्ते की कहानी थी, जो धर्म से नहीं, अपनापन और इंसानियत से बना था.

    Also Read : दिल्ली दंगा 2020: ताहिर हुसैन ने उम्रकैद की सजा को दिल्ली हाईकोर्ट में दी चुनौती

    एर्नाकुलम जिले केरल चोट्टानिक्करा पयम्मा पार्वती
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