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    Home»जोहार ब्रेकिंग»खनिज व खान विधेयक: खनिज पर सेस नहीं लगा सकेगा झारखंड, 14.6 हजार करोड़ पर संकट
    जोहार ब्रेकिंग

    खनिज व खान विधेयक: खनिज पर सेस नहीं लगा सकेगा झारखंड, 14.6 हजार करोड़ पर संकट

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkAugust 13, 2026Updated:August 13, 2026No Comments4 Mins Read5
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    झारखंड की जमीन के नीचे सिर्फ कोयला, लोहा और दूसरे खनिज नहीं हैं, बल्कि सरकार की बड़ी कमाई भी छिपी है. वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में झारखंड ने Mineral Bearing Land Cess से करीब ₹14,656 करोड़ की कमाई का अनुमान लगाया है. अब केंद्र सरकार के नए Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 में इसी तरह के सेस पर शर्तें और सीमाएं लगाने का प्रस्ताव है. ऐसे में बड़ा सवाल है, क्या झारखंड अपनी खनिज वाली जमीन से मिलने वाले इस हजारों करोड़ के राजस्व पर पहले जैसा अधिकार रख पाएगा?

    लेकिन पहले समझिए कि ₹14,656 करोड़ आखिर है क्या?

    यह कोई अलग से मिलने वाला केंद्र का पैसा नहीं है. यह झारखंड सरकार की अनुमानित कमाई है, जो खनिज वाली जमीन पर लगाए जाने वाले Mineral Bearing Land Cess से आएगी. बजट के अलग-अलग राजस्व मदों में इस सेस की रकम दर्ज है, जिसे जोड़ने पर करीब ₹14,656 करोड़ का अनुमान बनता है.

    Mineral Bearing Land को समझे

    नाम थोड़ा मुश्किल है, लेकिन बात सीधी है. जिस जमीन के नीचे तय मानकों के मुताबिक कोयला, लौह अयस्क या दूसरे खनिज मौजूद हैं, उसे Mineral Bearing Land कहा जाता है.
    झारखंड ने ऐसी जमीन पर सेस लगाने की व्यवस्था की है. यही सेस राज्य के लिए कमाई का बड़ा जरिया बन गया है.
    अब केंद्र का बिल क्या बदल रहा है? केंद्र सरकार MMDR Amendment Bill, 2026 लेकर आई है. इसमें नया Section 9D जोड़ने का प्रस्ताव है.

    सीधी भाषा में समझें तो राज्य खनिज अधिकार या Mineral Bearing Land पर टैक्स, सेस या दूसरी लेवी लगा सकता है, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा तय की जाने वाली शर्तों और सीमाओं के भीतर. यानी झारखंड के पास सेस लगाने की व्यवस्था तो रहेगी, लेकिन उसकी दर, तरीका या आधार अगर केंद्र की तय सीमा से बाहर हुआ, तो उस पर रोक लग सकती है.

    यहीं से पूरे मामले की गंभीरता समझ आती है. झारखंड को डर किस बात का है?

    झारखंड ने 2026-27 में इस सेस से करीब ₹14,656 करोड़ मिलने का अनुमान लगाया है. अब अगर केंद्र की शर्तों के कारण सेस की दर कम होती है या वसूली प्रभावित होती है, तो राज्य के खजाने में आने वाली रकम भी घट सकती है. और इसका असर सिर्फ एक बजट हेड पर नहीं पड़ेगा.
    सरकार के पास पैसा कम हुआ तो उसे दूसरे स्रोतों से पैसा जुटाना होगा या खर्च की प्राथमिकताएं बदलनी पड़ सकती हैं.

    मंईयां सम्मान, अबुआ आवास से लेकर अस्पताल तक असर?

    इसका मतलब यह नहीं है कि कोई योजना सीधे बंद हो जाएगी. लेकिन राज्य की कमाई घटती है तो सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ेगा. मंईयां सम्मान योजना, अबुआ आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल और ग्रामीण विकास जैसी योजनाओं में लगातार पैसा चाहिए. ऐसे में कम राजस्व का मतलब होगा, सरकार को तय करना पड़ेगा कि कहां कितना पैसा खर्च किया जाए. यानी असर अप्रत्यक्ष हो सकता है, लेकिन बड़ा हो सकता है.

    पुराने बकाये पर भी नजर

    नए बिल में सिर्फ आगे लगने वाले सेस की बात नहीं है. पुराने बकाये को लेकर भी प्रावधान है. अगर कोई पुराना सेस राज्य को मिल चुका है, तो उसे वापस नहीं करना होगा. लेकिन जो रकम अभी तक राज्य को मिली ही नहीं और जिसे सरकार वसूल भी नहीं पाई है, उसके अमान्य होने की स्थिति बन सकती है. इसका मतलब है कि पुराने बकाये को लेकर भी राज्य के सामने चुनौती खड़ी हो सकती है.

    क्या झारखंड के ₹14,656 करोड़ खत्म हो जाएंगे?

    नहीं. अभी ऐसा कहना सही नहीं होगा. सबसे जरूरी बात यही है कि बिल में झारखंड का पूरा Mineral Bearing Land Cess तुरंत खत्म करने की बात नहीं है. असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि केंद्र सरकार आगे कौन-सी शर्तें और सीमाएं तय करती है.
    अगर शर्तें सख्त हुईं और सेस की वसूली सीमित हुई, तो झारखंड की कमाई प्रभावित हो सकती है. अगर पर्याप्त गुंजाइश छोड़ी गई, तो असर कम भी हो सकता है.

    असली सवाल सिर्फ पैसे का नहीं. इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल केंद्र और राज्य के अधिकार का है.
    झारखंड का तर्क हो सकता है कि खनिज राज्य की जमीन में हैं, खनन का सामाजिक और पर्यावरणीय असर राज्य को झेलना पड़ता है, इसलिए उससे मिलने वाले राजस्व पर राज्य का अधिकार होना चाहिए. वहीं केंद्र का तर्क यह हो सकता है कि अलग-अलग राज्यों में भारी सेस लगाने से खनिज महंगे होंगे और इसका असर उद्योग और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.

    इसलिए MMDR Amendment Bill, 2026 झारखंड के लिए सिर्फ खनन कानून में बदलाव नहीं है. यह सवाल है कि झारखंड अपने खनिज संसाधनों से कितनी कमाई कर पाएगा और उस कमाई पर फैसला लेने का अधिकार आखिर किसके पास रहेगा.

    Also Read: झारखंड : अस्पताल से सत्याग्रह स्थल लौटना चाहते हैं देवेंद्र महतो, सिविल सर्जन से मांगी अनुमति

    खनिज व खान विधेयक
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