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    Home»जोहार ब्रेकिंग»झारखंड हाईकोर्ट की सरकार को फटकार, कहा- सरकारी सुस्ती को नहीं मिलेगी कानूनी छूट
    जोहार ब्रेकिंग

    झारखंड हाईकोर्ट की सरकार को फटकार, कहा- सरकारी सुस्ती को नहीं मिलेगी कानूनी छूट

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyAugust 6, 2026No Comments3 Mins Read4
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    रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कार्यशैली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए 255 दिनों की देरी से दायर की गई अपील को खारिज कर दिया. मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि सरकारी विभागों की फाइलों का एक टेबल से दूसरे टेबल तक घूमते रहना देरी का वैध कारण नहीं हो सकता. अदालत ने दो टूक कहा कि आधुनिक तकनीक के दौर में सरकारी सुस्ती, लापरवाही और लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया को कानून के तहत राहत देने का आधार नहीं बनाया जा सकता.

    यह मामला स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग की ओर से दायर एक अपील से जुड़ा था. राज्य सरकार ने एकलपीठ के 29 अगस्त 2024 के फैसले को चुनौती देने में 255 दिन की देरी की थी और इस देरी को माफ करने की मांग की थी. लेकिन अदालत ने पाया कि आवेदन में देरी के लिए कोई ठोस और संतोषजनक कारण नहीं बताया गया. केवल यह उल्लेख किया गया कि कानूनी राय ली गई, रिकॉर्ड जुटाए गए और विभागीय प्रक्रिया पूरी की गई. अदालत ने कहा कि इन प्रक्रियाओं में कितना समय लगा और देरी क्यों हुई, इसका कोई स्पष्ट हिसाब नहीं दिया गया.

    सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पाया कि 29 अगस्त 2024 को फैसला आने के बाद लगभग दो महीने तक विभाग ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया. बाद में भी फाइल कई अधिकारियों के बीच घूमती रही. 25 नवंबर 2024 से 9 जनवरी 2025 तक केवल फाइल आगे बढ़ाने में 45 दिन लग गए, जिसका भी कोई उचित कारण नहीं बताया गया. अदालत ने इसे सरकारी तंत्र की घोर लापरवाही और निष्क्रियता करार दिया.

    कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अक्टूबर 2024 से मार्च 2025 के बीच फाइल नौ बार अंडर सेक्रेटरी और आठ बार अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष भेजी गई. पांच महीने से अधिक समय सिर्फ विभागीय स्तर पर फाइल के आवागमन में बीत गया. अदालत ने कहा कि इस तरह की नौकरशाही प्रक्रिया को ‘पर्याप्त कारण’ नहीं माना जा सकता और यह सीमा अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत है.

    हाईकोर्ट ने इस दौरान सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण फैसलों का भी हवाला दिया. अदालत ने कहा कि सरकार भी सीमा अधिनियम से ऊपर नहीं है और केवल यह कह देना कि फाइल विभागों में चलती रही या कानूनी राय ली जा रही थी, देरी माफ कराने के लिए पर्याप्त नहीं है. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकारी मशीनरी की सुस्ती को न्यायालय संरक्षण नहीं दे सकता.

    अंत में खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार यह साबित करने में पूरी तरह असफल रही कि उसने मामले में पर्याप्त सतर्कता और तत्परता दिखाई. इसलिए 255 दिनों की देरी को माफ करने का कोई आधार नहीं बनता. अदालत ने देरी माफी की अंतरिम याचिका खारिज कर दी. इसके साथ ही संबंधित अपील और उससे जुड़ी सभी अंतरिम अर्जियां भी स्वतः समाप्त हो गईं.

     

    Also Read : झारखंड : ट्रैफिक पुलिसकर्मियों को अदाणी फाउंडेशन ने दिए छाते, बारिश से मिलेगी राहत

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