विजय उरांव
बंजारा समुदाय की भाषा गोर बोली को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग एक बार फिर चर्चा में है. तेलंगाना विधानसभा इस मांग के समर्थन में प्रस्ताव पारित कर चुकी है. मामला संसद तक पहुंचने के बाद केंद्र सरकार के जवाब ने एक अहम सवाल खड़ा किया है, आखिर किसी भाषा को 8वीं अनुसूची में शामिल करने का फैसला किस आधार पर होगा? सरकार का कहना है कि फिलहाल इसके लिए कोई तय मानदंड नहीं है.
राज्यसभा में सांसद संजय सिंह ने सरकार से पूछा था कि क्या गोर बोली को 8वीं अनुसूची में शामिल करने का कोई प्रस्ताव मिला है और इस दिशा में क्या कदम उठाए जा रहे हैं. 22 जुलाई 2026 को दिए जवाब में जनजातीय कार्य मंत्रालय के राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने गृह मंत्रालय के हवाले से बताया कि गोर बोली समेत कई भारतीय भाषाओं को 8वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग समय-समय पर उठती रही है.
गोर बोली क्या है?
गोर बोली को आम तौर पर बंजारा समुदाय की मातृभाषा माना जाता है. अलग-अलग क्षेत्रों में इसे गोर बोली, गोरबोली, गोरु, गोरवानी, बंजारी, लमाणी और लम्बाड़ी जैसे नामों से भी जाना जाता है.
बंजारा समुदाय देश के कई राज्यों में फैला है. इसके बोलने वाले मुख्य रूप से तेलंगाना, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में पाए जाते हैं. अलग-अलग राज्यों में भाषा के नाम और वर्गीकरण अलग होने के कारण इसके बोलने वालों की सटीक आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है.
हालांकि, अनौपचारिक अनुमानों में देश में बंजारा समुदाय की आबादी 4 करोड़ से अधिक बताई जाती है. तेलंगाना में केंद्र सरकार की 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार सुगाली, लंबाड़ी और बंजारा समुदाय की आबादी 20.46 लाख है.
8वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग क्यों?
बंजारा समुदाय के लिए गोर बोली सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक पहचान और मौखिक विरासत का हिस्सा है. लोकगीत, कहानियां, परंपराएं और पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक साहित्यिक विरासत इसी भाषा से जुड़ी है.
समुदाय से जुड़े लोगों का मानना है कि 8वीं अनुसूची में शामिल होने से गोर बोली को राष्ट्रीय स्तर पर संवैधानिक पहचान मिलेगी और इसके संरक्षण, विकास तथा प्रचार को मजबूती मिल सकती है.
सरकार का क्या कहना है?
सरकार ने गोर बोली को 8वीं अनुसूची में शामिल करने की कोई घोषणा नहीं की है. गृह मंत्रालय के अनुसार, फिलहाल भाषाओं को 8वीं अनुसूची में शामिल करने के लिए कोई निश्चित मानदंड तय नहीं हैं. सरकार के इस जवाब का सीधा मतलब है कि फिलहाल ऐसा कोई तय नियम नहीं है, जिसके आधार पर यह तय किया जा सके कि किसी भाषा को 8वीं अनुसूची में शामिल किया जाए या नहीं. यानी भाषा बोलने वालों की संख्या, उसका इतिहास, साहित्य या दूसरे आधारों को लेकर कोई निश्चित पैमाना तय नहीं है. ऐसे में हर भाषा को शामिल करने की मांग पर अलग-अलग पहलुओं को देखते हुए फैसला किया जाता है.
सरकार ने बताया कि मानदंड तय करने की कोशिश पहले पाहवा समिति और सीताकांत महापात्र समिति के जरिए की गई थी, लेकिन दोनों प्रयास किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सके. सरकार का तर्क है कि भाषा और बोलियों का विकास लगातार बदलने वाली प्रक्रिया है. सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक बदलावों के साथ भाषाएं भी बदलती रहती हैं. इसलिए सभी भाषाओं के लिए एक निश्चित और स्थायी पैमाना तय करना मुश्किल है.
हालांकि, सरकार ने कहा है कि 8वीं अनुसूची में दूसरी भाषाओं को शामिल करने की मांग से जुड़ी भावनाओं और जरूरतों से वह अवगत है और ऐसे मामलों पर प्रासंगिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विचार किया जाएगा.
भाषा संरक्षण के लिए क्या कदम?
संस्कृति मंत्रालय के मुताबिक, संकटग्रस्त और जनजातीय भाषाओं के संरक्षण और प्रचार के लिए साहित्य अकादमी ने भाषा विकास बोर्ड बनाया है. इसके तहत भाषा सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है. 10-11 सितंबर 2022 को हैदराबाद में दो दिवसीय बंजारा भाषा सम्मेलन भी आयोजित किया गया था.
इसके अलावा साहित्य अकादमी गैर-मान्यता प्राप्त भाषाओं के विकास में योगदान देने वाले विद्वानों को भाषा सम्मान देती है. जनजातीय और मौखिक साहित्य के संरक्षण के लिए NECOL और COTLIT जैसे केंद्र भी स्थापित किए गए हैं.
फिलहाल गोर बोली की 8वीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है. ऐसे में बंजारा समुदाय के सामने सवाल सिर्फ संवैधानिक मान्यता का नहीं, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक विरासत के संरक्षण का भी है.
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