देश में E20 पेट्रोल को ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है. लेकिन वर्तमान में इसकी सबसे बड़ी कीमत कौन चुका रहा है? पेट्रोल भरवाने वाला वाहन मालिक, सरकारी खजाना या दोनों? संसद में सरकार के अपने जवाब इस सवाल को और बड़ा बना देते हैं.
अगर E20 इतना फायदेमंद है तो पेट्रोल सस्ता क्यों नहीं हुआ?
E20 लागू होने के बाद कई वाहन मालिक माइलेज कम होने और पुराने वाहनों की अनुकूलता को लेकर चिंता जता रहे हैं. एथनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है, इसलिए विशेषज्ञ भी मानते हैं कि कुछ वाहनों में माइलेज पर असर पड़ सकता है.
इसके बावजूद पेट्रोल की कीमत में कोई अलग राहत नहीं मिली.
सरकार एथनॉल को रियायत क्यों दे रही है?
राज्यसभा में सरकार ने बताया कि 2024-25 और 2025-26 में एथनॉल उत्पादन के लिए FCI के 52-52 लाख मीट्रिक टन चावल आवंटित किए गए. इनमें से 2024-25 में 31.83 लाख मीट्रिक टन और 3 दिसंबर 2025 तक 2025-26 में 3.45 लाख मीट्रिक टन चावल डिस्टिलरी उठा चुकी हैं.
सरकार ने जनवरी 2025 में एथनॉल बनाने वाली डिस्टिलरी को FCI का चावल ₹2,250 प्रति क्विंटल में दिया. जबकि सामान्य OMSS ई-नीलामी में यही चावल ₹2,800 प्रति क्विंटल में बिक रहा था. यानी ₹550 प्रति क्विंटल कम कीमत पर चावल उपलब्ध कराया गया.
अगर सिर्फ 2024-25 में डिस्टिलरी द्वारा उठाए गए 31.83 लाख मीट्रिक टन चावल पर ही यह अंतर जोड़ा जाए, तो बाजार मूल्य के मुकाबले करीब ₹1,750 करोड़ कम कीमत पर चावल दिया गया.
यहीं मामला और बड़ा हो जाता है. FCI धान खरीदने, मिलिंग, भंडारण और परिवहन पर भी खर्च करती है. विभिन्न सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक FCI की आर्थिक लागत करीब ₹37-40 प्रति किलो तक बैठती है, जबकि एथनॉल उत्पादन के लिए चावल करीब ₹22.50 प्रति किलो में उपलब्ध कराया गया. इस आधार पर विशेषज्ञों का अनुमान है कि कुल आर्थिक बोझ करीब ₹10,000 करोड़ तक हो सकता है. हालांकि सरकार ने इस संबंध में कोई आधिकारिक नुकसान का आंकड़ा जारी नहीं किया है.
जब एथनॉल पेट्रोल से महंगा है तो बचत कहां हो रही है?
सरकार पहले ही संसद में स्वीकार कर चुकी है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर कई मामलों में तेल कंपनियां जिस कीमत पर एथनॉल खरीद रही हैं, वह पेट्रोल से भी ज्यादा है.
यानी सरकार रियायत देकर एथनॉल उत्पादन बढ़ा रही है, तेल कंपनियां महंगा एथनॉल खरीद रही हैं, लेकिन इसका फायदा उपभोक्ता को पेट्रोल की कीमत में नहीं दिख रहा.
इस पूरी नीति की कीमत कौन चुका रहा है?
सरकार का कहना है कि E20 का मकसद तत्काल सस्ता पेट्रोल देना नहीं, बल्कि आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना, विदेशी मुद्रा बचाना और किसानों के लिए नया बाजार बनाना है.
लेकिन फिलहाल कई सवाल बने हुए हैं.
अगर सरकार एथनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए रियायत दे रही है…
अगर तेल कंपनियां महंगा एथनॉल खरीद रही हैं…
अगर उपभोक्ता को न पेट्रोल सस्ता मिल रहा है और E20 को लेकर वाहन मालिकों की चिंताएं भी बनी हुई हैं…
तो इस पूरी नीति की आर्थिक कीमत आखिर कौन चुका रहा है?
सरकार भविष्य के फायदे की बात कर रही है. लेकिन आज का सवाल यही है—E20 का सबसे बड़ा बोझ जनता उठा रही है, सरकारी खजाना या दोनों?
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