New Delhi : आज बच्चों की दुनिया एनिमेशन से भरी हुई है. रामायण से लेकर महाभारत और कृष्ण की कहानियां भी अब एनिमेटेड फिल्मों और सीरीज के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंच रही हैं. ऐसे में सवाल उठा कि अगर भगवान जगन्नाथ को भी एनिमेटेड रूप में दिखाया जाए, तो क्या इससे श्रद्धालुओं की आस्था प्रभावित होगी? यही सवाल सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचा. कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ कुछ लोगों के नाराज होने से किसी फिल्म पर रोक नहीं लगाई जा सकती. इसी के साथ भगवान जगन्नाथ पर बनी एनिमेटेड फिल्म ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ की रिलीज पर रोक लगाने की मांग भी खारिज कर दी.
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की बेंच ने ओडिशा सरकार और श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन की उन अर्जियों को खारिज कर दिया, जिनमें 17 जुलाई के आदेश में बदलाव की मांग की गई थी. उसी आदेश में कोर्ट ने रथ यात्रा खत्म होने के बाद फिल्म रिलीज करने की अनुमति दी थी.
क्या है पूरा मामला?
17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि भगवान जगन्नाथ की वार्षिक रथ यात्रा खत्म होने के बाद फिल्म ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ को 28 जुलाई 2026 या उसके बाद पूरे देश में रिलीज किया जा सकता है. कोर्ट ने कहा था कि सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद फिल्म को पहले ही रिलीज की मंजूरी दे चुका है. इसलिए रथ यात्रा के बाद फिल्म रिलीज करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है. इसके बाद ओडिशा सरकार ने कई अर्जियां दाखिल कर इस आदेश में बदलाव की मांग की. वहीं, फिल्म से जुड़ी मुख्य रिट याचिका अभी भी ओडिशा हाई कोर्ट में लंबित है.
कोर्ट बोला- ऐसा हुआ तो रामायण-महाभारत पर भी फिल्में नहीं बन पाएंगी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि अगर कुछ लोगों के नाराज होने के आधार पर फिल्मों पर रोक लगाई जाने लगे, तो भविष्य में रामायण, महाभारत और हिंदू देवी-देवताओं पर आधारित किसी भी रचना का निर्माण मुश्किल हो जाएगा. जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि अदालतें सिर्फ इसलिए कलात्मक अभिव्यक्ति पर रोक नहीं लगा सकतीं कि किसी वर्ग की भावनाएं आहत होने का दावा किया जा रहा है.
उन्होंने कहा-
“अगर यही तर्क मान लिया जाए तो रामायण, महाभारत और हिंदू देवी-देवताओं के सभी चित्रणों पर सवाल उठने लगेंगे. साहित्य, टेलीविजन, मूर्तिकला और एनिमेशन सभी रचनात्मक अभिव्यक्ति का हिस्सा हैं. कलाकारों को हर व्यक्ति की व्यक्तिगत भावनाओं का बंधक नहीं बनाया जा सकता.”
CBFC पहले ही दे चुका है सर्टिफिकेट
जस्टिस आर. महादेवन ने भी कहा कि फिल्म को CBFC पहले ही प्रमाणपत्र दे चुका है. ऐसे में फिल्म की रिलीज रोकने का कोई आधार नहीं बनता. बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर निर्माता फिल्म में कोई बदलाव करना चाहते हैं, तो यह पूरी तरह उनका अपना फैसला होगा. कोर्ट उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता.
एक दिन पहले यानी मंगलवार को भी सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पूछा था कि क्या भगवान जगन्नाथ को एनिमेटेड रूप में दिखाने से सच में श्रद्धालुओं की आस्था कम हो जाएगी.
जस्टिस नागरत्ना ने कहा था-
“क्या बच्चों के लिए यह फिल्म रिलीज होने से भगवान जगन्नाथ के प्रति उनकी भक्ति कम हो जाएगी? ऐसा नहीं होगा. फिल्म दिखाना अलग बात है. एनिमेशन बच्चों को ज्यादा आकर्षित करेगा.”
कोर्ट ने तब भी कहा था कि याचिकाकर्ता अपने मामले का दायरा जरूरत से ज्यादा बढ़ा रहे हैं.
ओडिशा सरकार और मंदिर प्रशासन की क्या थी आपत्ति?
ओडिशा सरकार और श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन का कहना था कि फिल्म में भगवान जगन्नाथ को कार्टून या एनिमेटेड रूप में दिखाया गया है, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं. मंदिर प्रशासन की ओर से एडवोकेट जनरल पीतांबर आचार्य ने कहा कि रिलीज से पहले उनकी आपत्तियों पर CBFC को दोबारा विचार करना चाहिए.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि मंदिर प्रशासन पहले ही अपनी आपत्तियां CBFC के सामने रख चुका है. इसलिए बोर्ड को उन पर स्वतंत्र रूप से फैसला करने का मौका मिलना चाहिए.
फिल्म निर्माताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने इन अर्जियों का विरोध किया. उन्होंने कहा कि जिन मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही फैसला दे चुका है, उन्हीं पर दोबारा सुनवाई की मांग की जा रही है. उन्होंने दलील दी कि यह आदेश बदलने का नहीं, बल्कि पुराने फैसले की समीक्षा कराने का प्रयास है.
बुधवार को सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सभी अर्जियां खारिज कर दीं और साफ कर दिया कि 17 जुलाई का आदेश बरकरार रहेगा. यानी ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ की रिलीज पर कोई रोक नहीं लगेगी और फिल्म पहले से तय शर्तों के अनुसार रिलीज की जा सकेगी.

