मुस्कान चौधरी
एक तरफ हजारों दर्शकों से भरा स्टेडियम, करोड़ों रुपये की टीमें, देश-विदेश के स्टार खिलाड़ी और चमचमाती ट्रॉफियां. दूसरी तरफ गांव का कच्चा मैदान, चारों ओर खड़े ग्रामीण, ढोल-नगाड़ों की आवाज और इनाम में एक खस्सी (बकरा). पहली नजर में ये दोनों दुनिया बिल्कुल अलग लगती हैं, लेकिन दोनों को जोड़ता है सिर्फ एक नाम, फुटबॉल.
झारखंड के गांवों में आज भी फुटबॉल सिर्फ खेल नहीं, बल्कि परंपरा, पहचान और भाईचारे का उत्सव है. यहां जब कोई टीम खस्सी कप जीतती है, तो उसे सिर्फ बकरा नहीं मिलता, बल्कि पूरे गांव का सम्मान भी मिलता है. यही वजह है कि ग्रामीण इलाकों में आज भी लोग कहते हैं, “ट्रॉफी घर की शोभा बढ़ाती है, लेकिन खस्सी पूरे गांव को एक साथ बैठकर जश्न मनाने का मौका देती है.”
अब संयोग देखिए कि जिस राज्य की पहचान खस्सी टूर्नामेंट जैसी अनोखी खेल संस्कृति से रही है, वहीं पहली बार एशिया के सबसे पुराने फुटबॉल टूर्नामेंट डूरंड कप के मुकाबले भी आयोजित हो रहे हैं. यानी गांव के मिट्टी वाले मैदान से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम तक, झारखंड का फुटबॉल सफर एक नई पहचान बना रहा है.
क्या होता है खस्सी टूर्नामेंट?
झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड के ग्रामीण व आदिवासी इलाकों में आयोजित होने वाली पारंपरिक फुटबॉल प्रतियोगिताओं को स्थानीय लोग खस्सी कप या खस्सी टूर्नामेंट कहते हैं. यहां विजेता टीम को ट्रॉफी या बड़ी नकद राशि नहीं, बल्कि एक खस्सी (बकरा) पुरस्कार के रूप में दिया जाता है. बड़े आयोजनों में विजेता को जोड़ा खस्सी और उपविजेता को भी एक बकरा दिया जाता है.
लेकिन इस प्रतियोगिता की सबसे खूबसूरत परंपरा पुरस्कार मिलने के बाद शुरू होती है. विजेता टीम, आयोजक और गांव के लोग उसी खस्सी का सामूहिक भोज करते हैं. यह सिर्फ जीत का जश्न नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, भाईचारे और साझा संस्कृति का प्रतीक माना जाता है.
इन प्रतियोगिताओं में मुख्य रूप से फुटबॉल और हॉकी खेली जाती है. कई गांवों में कबड्डी, कुश्ती और वॉलीबॉल के मुकाबले भी कराए जाते हैं. स्थानीय खेल समितियां मामूली एंट्री फीस लेकर इनका आयोजन करती हैं. वर्षों से यही प्रतियोगिताएं ग्रामीण युवाओं की प्रतिभा को निखारने का बड़ा मंच रही हैं.
अब झारखंड पहुंचा डूरंड कप
जहां गांवों में खस्सी कप की अपनी पहचान है, वहीं अब झारखंड को भारतीय फुटबॉल की सबसे बड़ी विरासत की मेजबानी का अवसर भी मिला है. डूरंड कप के मुकाबलों के आयोजन से राज्य के खिलाड़ियों को बड़े मंच पर अपने खेल को देखने और समझने का मौका मिल रहा है.
एशिया का सबसे पुराना फुटबॉल टूर्नामेंट है डूरंड कप
डूरंड कप, जिसे इंडियनऑयल डूरंड कप भी कहा जाता है, भारत का सबसे प्रतिष्ठित और एशिया का सबसे पुराना फुटबॉल टूर्नामेंट है. इसकी शुरुआत वर्ष 1888 में ब्रिटिश भारत के शिमला के ऐनाडेल मैदान में हुई थी. यह दुनिया के सबसे पुराने सक्रिय फुटबॉल टूर्नामेंटों में भी शामिल है.
इस प्रतियोगिता की स्थापना तत्कालीन ब्रिटिश विदेश सचिव सर हेनरी मोर्टिमर डूरंड ने की थी. शुरुआत में इसमें केवल ब्रिटिश भारतीय सेना और सैन्य इकाइयों की टीमें हिस्सा लेती थीं. बाद में नागरिक क्लबों की एंट्री हुई और यह भारतीय फुटबॉल की सबसे प्रतिष्ठित प्रतियोगिता बन गया.
1940 में इसका आयोजन शिमला से नई दिल्ली स्थानांतरित किया गया. आजादी के बाद इसे भारत में ही बनाए रखा गया और अब इसका संचालन डूरंड फुटबॉल टूर्नामेंट सोसाइटी (DFTS) तथा अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (AIFF) संयुक्त रूप से करते हैं.
2022 से इंडियन सुपर लीग (ISL) के सभी क्लबों की भागीदारी अनिवार्य कर दी गई. अब इसमें आई-लीग और भारतीय सशस्त्र बलों की टीमें भी खेलती हैं. इसी कारण इसे भारतीय फुटबॉल सीजन की शुरुआत करने वाला सबसे बड़ा टूर्नामेंट माना जाता है.
138 साल का गौरवशाली सफर
1888: डूरंड कप की शुरुआत सेना के टूर्नामेंट के रूप में शिमला में हुई. इसका उद्देश्य सैनिकों में अनुशासन, फिटनेस और खेल भावना को बढ़ावा देना था.
1925: मोहन बागान पहली भारतीय क्लब टीम बनी जिसने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. इसके बाद भारतीय क्लबों ने अपने शानदार प्रदर्शन से टूर्नामेंट की तस्वीर बदल दी.
1947 के बाद: आजादी के बाद डूरंड कप राष्ट्रीय स्तर का प्रतिष्ठित क्लब टूर्नामेंट बन गया. मोहन बागान, ईस्ट बंगाल और मोहम्मडन स्पोर्टिंग जैसे क्लबों ने इस पर वर्षों तक अपना दबदबा बनाए रखा. इस प्रतियोगिता की सबसे खास परंपरा यह है कि विजेता टीम को डूरंड कप, शिमला ट्रॉफी और राष्ट्रपति कप समेत तीन ट्रॉफियां एक साथ दी जाती हैं.
2019 के बाद: भारतीय सेना की पूर्वी कमान के संरक्षण में टूर्नामेंट का विस्तार हुआ. अब इसका आयोजन पश्चिम बंगाल के अलावा असम, मेघालय, मणिपुर और झारखंड जैसे राज्यों में भी किया जा रहा है.
देश-विदेश के खिलाड़ी बढ़ाते हैं रोमांच
डूरंड कप केवल भारतीय क्लबों का टूर्नामेंट नहीं है. इसमें इंडियन सुपर लीग (ISL) और आई-लीग (I-League) की शीर्ष टीमें हिस्सा लेती हैं. मोहन बागान सुपर जायंट, ईस्ट बंगाल, जमशेदपुर एफसी, नॉर्थईस्ट यूनाइटेड, एफसी गोवा और पंजाब एफसी जैसे बड़े क्लब हर साल इसमें उतरते हैं.
इन टीमों के साथ भारतीय राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ी भी मैदान पर दिखाई देते हैं. सुनील छेत्री, अनिरुद्ध थापा, संदीश झिंगन और गुरप्रीत सिंह संधू जैसे कई स्टार खिलाड़ी इस टूर्नामेंट में खेल चुके हैं.
सिर्फ भारतीय ही नहीं, बल्कि ब्राजील, स्पेन, अर्जेंटीना, नाइजीरिया, घाना समेत कई देशों के विदेशी पेशेवर खिलाड़ी भी भारतीय क्लबों की ओर से खेलते हैं. समय-समय पर नेपाल और बांग्लादेश की सैन्य या क्लब टीमें भी इस प्रतियोगिता में आमंत्रित की जाती रही हैं.
डूरंड कप ने भारत को दिए कई सितारे
डूरंड कप सिर्फ एक टूर्नामेंट नहीं, बल्कि भारतीय फुटबॉल की प्रतिभाओं की सबसे बड़ी प्रयोगशाला भी रहा है. पी.के. बनर्जी, चुन्नी गोस्वामी, भाईचुंग भूटिया, आई.एम. विजयन, सुनील छेत्री, गुरप्रीत सिंह संधू और संदीश झिंगन जैसे कई दिग्गज खिलाड़ियों ने इस मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया और आगे चलकर भारतीय फुटबॉल के बड़े सितारे बने.
मिट्टी के मैदान से अंतरराष्ट्रीय पहचान तक
झारखंड में खस्सी कप और डूरंड कप, दोनों की अपनी अलग पहचान है. एक गांव की परंपरा, संस्कृति और सामुदायिक एकता का प्रतीक है, तो दूसरा भारतीय फुटबॉल की 138 साल पुरानी गौरवशाली विरासत का. आज जब झारखंड डूरंड कप की मेजबानी कर रहा है, तब यह केवल एक टूर्नामेंट नहीं, बल्कि इस बात का भी संकेत है कि राज्य की फुटबॉल संस्कृति गांव के कच्चे मैदानों से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच रही है. यही सफर झारखंड की फुटबॉल पहचान की सबसे खूबसूरत कहानी है.
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