सचिन झा शेखर
बिना किसी मजबूत विचारधारा के होने वाला आंदोलन लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए हमेशा अच्छा नहीं होता. अन्ना आंदोलन के दौरान शीला दीक्षित से लेकर सुरेश कलमाड़ी तक कई बड़े राजनीतिक चेहरे नप गए. पूरा देश भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर था. लेकिन 15 साल बाद सवाल वही है. व्यवस्था कितनी बदली? भ्रष्टाचार कितना खत्म हुआ? क्या हमने सिस्टम बदला, या सिर्फ कुछ चेहरे बदल दिए?
यहीं से आंदोलन और भीड़ के बीच का फर्क शुरू होता है.
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई किसी एक मंत्री, एक अफसर या एक सरकार के खिलाफ नहीं होती. यह उस व्यवस्था के खिलाफ होती है जो भ्रष्टाचार पैदा करती है. इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का लक्ष्य किसी एक व्यक्ति का इस्तीफा नहीं, बल्कि सामाजिक और नीतिगत परिवर्तन होना चाहिए. और नीतिगत परिवर्तन बिना किसी स्पष्ट विचारधारा के संभव नहीं है.
भारत में आज भी तीन प्रमुख वैचारिक धाराएं सक्रिय हैं, गांधीवादी, राष्ट्रवादी और मार्क्सवादी. तीनों से सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन तीनों के पास समाज, अर्थव्यवस्था और शासन को लेकर अपना दृष्टिकोण है. यदि इनमें से कोई आंदोलन करता है और सत्ता तक पहुंचता है, तो कम-से-कम यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह किस तरह के कानून बनाएगा, किस आर्थिक मॉडल पर चलेगा और समाज को किस दिशा में ले जाएगा. यानी उनके पास एक रोडमैप है.
लेकिन आज जो आंदोलन सिर्फ भावनाओं के सहारे खड़े किए जा रहे हैं, उनका रोडमैप क्या है? उनका विजन क्या है? उनका वैकल्पिक मॉडल क्या है? क्या पूरा आंदोलन सिर्फ इसलिए था कि एक मंत्री इस्तीफा दे दे?
राजनीति में घटनाओं का सच हमेशा उसी दिन सामने नहीं आता. हो सकता है दो साल बाद कोई दस्तावेज, कोई जांच या कोई राजनीतिक खुलासा बताए कि धर्मेंद्र प्रधान किसी जनदबाव से नहीं, बल्कि भाजपा के अंदरूनी शक्ति संघर्ष का शिकार हुए थे. तब आज सिर्फ इस्तीफे पर जश्न मनाने वाले लोग किस बात पर गर्व करेंगे?
आंदोलनकारियों को कभी समझौतावादी नहीं होना चाहिए. किसी आंदोलन की ऊंचाई उसकी भीड़ नहीं, उसकी मांगें तय करती हैं. अगर लाखों लोगों की ऊर्जा, महीनों का संघर्ष और जनता का भरोसा अंततः सिर्फ एक इस्तीफे पर खत्म हो जाए, तो यह आंदोलन की सबसे बड़ी वैचारिक हार है. ऐसे इस्तीफे तो कई बार एक मजबूत सोशल मीडिया अभियान या राजनीतिक दबाव से भी हो जाते हैं.
इतने बड़े आंदोलन से शिक्षा सुधार, भ्रष्टाचार पर कठोर संस्थागत व्यवस्था, पारदर्शिता, जवाबदेही, प्रशासनिक सुधार, राजनीतिक सुधार और जनभागीदारी का नया मॉडल निकलना चाहिए था. व्यवस्था परिवर्तन की मांग उठनी चाहिए थी, न कि केवल व्यक्ति परिवर्तन की.
इतिहास गवाह है कि जिन आंदोलनों के पास विचारधारा नहीं होती, वे या तो भीड़ में बदल जाते हैं या किसी राजनीतिक दल की सीढ़ी बन जाते हैं. स्थायी परिवर्तन हमेशा विचारों ने किया है, नारों ने नहीं.
व्यक्ति परिवर्तन आसान है. व्यवस्था परिवर्तन कठिन है. और व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई बिना विचारधारा के कभी नहीं जीती जा सकती.
इस आंदोलन ने सरकार से मांग मनवाने के हथकंडों को बेहद कठिन कर दिया। इतने बड़े आंदोलन से तो सामाजिक और नीतिगत बदलाव की एक नई तस्वीर निकलनी चाहिए थी.
(लेखक पत्रकार हैं. इंडियन कॉमरेड एके रॉय, हीरो ऑफ ग्राउंड पॉलिटिक्स नामक किताब के लेखक हैं.)
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