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    Home»जोहार ब्रेकिंग»कौन थीं कादंबिनी गांगुली? भारत की पहली महिला डॉक्टर
    जोहार ब्रेकिंग

    कौन थीं कादंबिनी गांगुली? भारत की पहली महिला डॉक्टर

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyJuly 18, 2026No Comments6 Mins Read4
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    कादंबिनी गांगुली
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    मुस्कान चौधरी 

    आज बेटियां डॉक्टर बन रही हैं, बड़े अस्पताल चला रही हैं और जटिल ऑपरेशन कर रही हैं. लेकिन 19वीं सदी में हालात बिल्कुल अलग थे. उस समय लड़कियों के लिए पढ़ाई से ज्यादा शादी जरूरी मानी जाती थी. ऐसे माहौल में एक महिला ने समाज की हर पुरानी सोच को चुनौती दी. उनका नाम था कादंबिनी गांगुली. उन्होंने सिर्फ डॉक्टर बनकर इतिहास नहीं रचा, बल्कि यह भी साबित किया कि अगर हौसला हो तो समाज की सबसे ऊंची दीवार भी गिराई जा सकती है.

    करीब 140 साल पहले एक महिला ने इस सोच को खुली चुनौती दी. उनका नाम था कादंबिनी गांगुली. उन्होंने सिर्फ डॉक्टर बनने का सपना नहीं देखा, बल्कि उस दौर में उसे पूरा भी किया, जब लड़कियों की पढ़ाई तक का विरोध होता था. उनकी जिंदगी संघर्ष, साहस और आत्मसम्मान की ऐसी मिसाल है, जिसने आने वाली पीढ़ियों की महिलाओं के लिए रास्ता बनाया.

    पिता ने कहा, बेटी भी पढ़ेगी

    साल 1861 में बिहार के भागलपुर में जन्मी कादंबिनी गांगुली ऐसे दौर में बड़ी हुईं, जब लड़कियों की पढ़ाई को बेकार समझा जाता था. समाज की सोच साफ थी. बेटियां जितनी जल्दी बड़ी हों, उनकी शादी कर दी जाए. स्कूल और किताबें लड़कों के लिए मानी जाती थीं.

    लेकिन कादंबिनी के पिता ब्रजकिशोर बसु ने समाज की इस सोच को नहीं माना. ब्रह्म समाज से जुड़े ब्रजकिशोर महिलाओं की शिक्षा और समान अधिकारों के प्रबल समर्थक थे. उन्होंने अपनी बेटी को वही आजादी दी, जो उस समय बहुत कम लड़कियों को मिलती थी. पढ़ने की आजादी, आगे बढ़ने की आजादी और अपने सपनों को पूरा करने की आजादी. यही एक फैसला आगे चलकर भारतीय इतिहास में महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण की नई इबारत लिखने वाला साबित हुआ.

    जब मेडिकल कॉलेज में लड़कियों के लिए पर्दा लगाया जाता था

    साल 1884 में कादंबिनी ने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया. यह अपने आप में ऐतिहासिक घटना थी, क्योंकि उस समय मेडिकल की पढ़ाई लड़कियों के लिए लगभग असंभव मानी जाती थी. कॉलेज में भी उनका सफर आसान नहीं था. पुरुष और महिला छात्रों का एक साथ पढ़ना समाज को स्वीकार नहीं था. इसलिए कक्षाओं में कादंबिनी और दूसरी छात्राओं को पर्दे (पर्दानशीं व्यवस्था) के पीछे बैठाया जाता था, ताकि पुरुष छात्र उन्हें देख न सकें. हर दिन उन्हें यह एहसास कराया जाता था कि वे यहां की नहीं हैं. लेकिन उन्होंने किसी की बातों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया.

    शादी हुई, लेकिन सपने नहीं रुके

    इसी दौरान उनकी शादी समाज सुधारक द्वारकानाथ गांगुली से हुई. वे विधुर थे और कादंबिनी से करीब 17 साल बड़े थे. उस दौर में शादी का मतलब अक्सर महिलाओं की पढ़ाई और करियर का अंत माना जाता था. लेकिन कादंबिनी की जिंदगी में ऐसा नहीं हुआ. उनके पति ने हर कदम पर उनका साथ दिया. शादी के बाद भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी, डॉक्टर बनीं और आठ बच्चों की मां बनने के बावजूद अपने पेशे से कभी पीछे नहीं हटीं.

    साल 1886 में कादंबिनी गांगुली भारत की पहली महिला डॉक्टरों में शामिल हो गईं, जिन्हें पश्चिमी चिकित्सा पद्धति से इलाज करने का लाइसेंस मिला. इसी दौर में आनंदीबाई जोशी का नाम भी इतिहास में दर्ज हुआ. लेकिन कादंबिनी यहीं नहीं रुकीं. उन्हें लगा कि अभी और आगे बढ़ना है.

    अकेले इंग्लैंड गईं, वहां भी बनाया इतिहास

    साल 1893 में कादंबिनी अकेले इंग्लैंड चली गईं. उस समय किसी भारतीय महिला का अकेले विदेश जाना समाज के लिए असामान्य बात थी. वहां उन्होंने एडिनबर्ग, ग्लासगो और डबलिन से मेडिसिन, सर्जरी और गायनेकोलॉजी में प्रतिष्ठित ट्रिपल डिप्लोमा हासिल किया. ऐसा करने वाली वह पहली भारतीय महिला बनीं. भारत लौटने के बाद उनकी पहचान सिर्फ एक महिला डॉक्टर के रूप में नहीं, बल्कि एक बेहद योग्य चिकित्सक के रूप में होने लगी.

    जिन्हें इलाज नहीं मिलता था, उनके लिए बनीं सहारा

    कादंबिनी गांगुली के लिए डॉक्टर बनना सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि लोगों की सेवा का माध्यम था. उस दौर में कई महिलाएं पुरुष डॉक्टरों के पास जाने से झिझकती थीं. कादंबिनी ने ऐसी महिलाओं का इलाज किया और उनका भरोसा जीता. उन्होंने बंगाल की कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूरों की भी सेवा की. उनकी काबिलियत को देखते हुए नेपाल की राजमाता ने उन्हें अपना निजी चिकित्सक नियुक्त किया. कहा जाता है कि बच्चे को जन्म देने के सिर्फ 13 दिन बाद ही वे फिर से मरीजों का इलाज करने लौट आई थीं. यही उनका अपने पेशे के प्रति समर्पण था.

    जब अखबार ने चरित्र पर उठाया सवाल

    डॉक्टर बनने के बाद भी कादंबिनी को समाज की तंग सोच का सामना करना पड़ा. साल 1891 में बंगाल के रूढ़िवादी अखबार बंगबासी ने सिर्फ इसलिए उनके चरित्र पर सवाल उठाए, क्योंकि वे घर से बाहर निकलकर काम करती थीं. उस दौर में ऐसी बातें सुनकर ज्यादातर महिलाएं चुप रह जाती थीं, लेकिन कादंबिनी ने ऐसा नहीं किया.

    उन्होंने अखबार के संपादक के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया. अदालत ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया, संपादक को सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ी और छह महीने की सजा भी हुई. यह उन शुरुआती घटनाओं में से एक थी, जब किसी भारतीय महिला ने अपने सम्मान के लिए अदालत में लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की.

    राजनीति में भी महिलाओं की आवाज बनीं

    कादंबिनी गांगुली का योगदान सिर्फ चिकित्सा क्षेत्र तक सीमित नहीं था. साल 1889 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने वाली पहली छह महिला प्रतिनिधियों में शामिल हुईं. इसके बाद कांग्रेस के एक सत्र को संबोधित करने वाली पहली महिला भी बनीं.

    उस दौर में जब महिलाओं का सार्वजनिक मंचों पर बोलना भी असामान्य माना जाता था, कादंबिनी ने बेखौफ होकर महिलाओं की शिक्षा, सम्मान और बराबरी के अधिकार की आवाज उठाई. उन्होंने साबित किया कि महिलाएं सिर्फ घर ही नहीं, देश की दिशा तय करने वाली बहसों का भी हिस्सा बन सकती हैं.

    आखिरी सांस तक निभाया डॉक्टर होने का फर्ज

    कादंबिनी गांगुली ने जिंदगी के आखिरी दिन तक मरीजों की सेवा नहीं छोड़ी. साल 1923 में एक मरीज का इलाज करके घर लौटने के कुछ ही देर बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और उनका निधन हो गया. उनकी आखिरी पहचान भी एक ऐसी डॉक्टर की रही, जो अंत तक अपने फर्ज पर डटी रहीं.

    उन्होंने सिर्फ इतिहास नहीं बनाया, सोच भी बदल दी

    कादंबिनी गांगुली की सबसे बड़ी उपलब्धि सिर्फ डॉक्टर बनना नहीं थी. उन्होंने उस दौर की सोच को चुनौती दी, जब महिलाओं की जगह सिर्फ घर तक सीमित मानी जाती थी. पढ़ाई करने पर सवाल उठे, नौकरी करने पर ताने मिले और चरित्र पर भी हमला हुआ, लेकिन उन्होंने हर मुश्किल का डटकर सामना किया.

    आज देश की हजारों महिलाएं डॉक्टर, सर्जन और मेडिकल विशेषज्ञ के रूप में अपनी पहचान बना रही हैं. उनके लिए यह रास्ता आसान इसलिए है, क्योंकि कादंबिनी गांगुली जैसी महिलाओं ने समाज की पुरानी सोच को बदलने की हिम्मत दिखाई और साबित किया कि सपनों और काबिलियत का कोई लिंग नहीं होता.

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