साल 1980 के दशक से भारत सरकार संयुक्त राष्ट्र (UN) में कहती रही है कि भारत में अलग से कोई स्वदेशी समुदाय नहीं है. मैं इस दावे को नहीं मानता. भारत 705 अनुसूचित जनजातियों और करीब 14 करोड़ आदिवासियों का देश है. संयुक्त राष्ट्र के मंच से बांसवाड़ा (राजस्थान) के सांसद राजकुमार रोत ने यह बात कही. उन्होंने कहा कि भारत की अनुसूचित जनजातियों को ही देश के वास्तविक स्वदेशी यानी Indigenous Peoples के रूप में माना जाना चाहिए. उनके इस बयान के बाद आदिवासी पहचान को लेकर एक बार फिर नई बहस शुरू हो गई है.
अनुसूचित जनजातियां ही भारत के असली आदिवासी समुदाय
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के तहत आयोजित Expert Mechanism on the Rights of Indigenous Peoples (EMRIP) के 18वें सत्र में बोलते हुए राजकुमार रोत ने कहा कि भारत सरकार कई दशकों से यह कहती आ रही है कि देश में अलग से कोई Indigenous People नहीं हैं. लेकिन उनका मानना है कि यह बात इतिहास और सामाजिक सच्चाई से मेल नहीं खाती.
उन्होंने कहा कि भारत में रहने वाले आदिवासी समुदायों को भारतीय संविधान के तहत 705 अनुसूचित जनजातियों के रूप में मान्यता मिली हुई है. करीब 14 करोड़ लोग इन समुदायों से जुड़े हैं. यही समुदाय भारत के वास्तविक Indigenous Peoples हैं.
रोत ने अपने भाषण में सुप्रीम कोर्ट के कैलास बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि इस फैसले में तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने अनुसूचित जनजातियों को भारत के मूल निवासियों का वंशज बताया था. हालांकि, भारत में Indigenous Peoples नाम से कोई अलग संवैधानिक श्रेणी नहीं है और इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का रुख अलग है.
भारत सरकार क्यों नहीं मानती अलग Indigenous श्रेणी?
भारत सरकार का कहना है कि भारत का कोई भी समुदाय ऐसा नहीं है जिसे बाद में आकर बसने वाला माना जाए. इसलिए किसी एक समुदाय को अलग से Indigenous Peoples की कानूनी मान्यता देना सही नहीं होगा. सरकार का यह भी कहना है कि संविधान पहले से ही अनुसूचित जनजातियों को आरक्षण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, पांचवीं और छठी अनुसूची, वनाधिकार कानून और कई दूसरे संवैधानिक अधिकार देता है.
संयुक्त राष्ट्र ने भी अब तक Indigenous Peoples की कोई तय कानूनी परिभाषा नहीं दी है. आम तौर पर जिन समुदायों का किसी क्षेत्र से पुराना संबंध हो, जिनकी अपनी अलग संस्कृति, भाषा और परंपराएं हों और जिन्होंने लंबे समय तक भेदभाव या विस्थापन झेला हो, उन्हें Indigenous Peoples माना जाता है.
भारत में अनुसूचित जनजाति एक संवैधानिक श्रेणी है, जबकि Indigenous Peoples अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून की अवधारणा है. कई आदिवासी संगठन दोनों को एक ही मानते हैं, जबकि भारत सरकार दोनों को अलग-अलग मानती है. यही वजह है कि यह मुद्दा लगातार बहस का विषय बना हुआ है.
झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, राजस्थान, गुजरात और पूर्वोत्तर के आदिवासी बहुल राज्यों में इस बहस को काफी अहम माना जा रहा है. फिलहाल राजकुमार रोत के इस भाषण से सरकार की नीति में कोई बदलाव नहीं होने वाला है, लेकिन आदिवासी पहचान और अधिकारों को लेकर देश और दुनिया में चर्चा जरूर तेज हो सकती है.
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