देश की आधी आबादी पिछले चार दशक से संसद और विधानसभाओं में बराबर की हिस्सेदारी का इंतजार कर रही है. कानून भी बन गया, लेकिन आज तक महिलाओं को उसका फायदा नहीं मिल सका है. अब इसी मुद्दे पर महिला संगठनों ने एक बार फिर मोर्चा खोल दिया है. उनका कहना है कि महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन की शर्तों में उलझाने के बजाय तुरंत लागू किया जाए, ताकि लाखों महिलाओं को राजनीति में बराबरी का मौका मिल सके. संसद के मानसून सत्र से पहले इस मांग को लेकर देशभर में अभियान तेज हो गया है.
मानसून सत्र से पहले सरकार पर बढ़ाया दबाव
ऑल इंडिया फेमिनिस्ट अलायंस (ALIFA) ने नेशनल कोएलिशन फॉर विमेंस रिजर्वेशन (NCWR) के देशव्यापी अभियान का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार से मांग की है कि महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 को बिना किसी शर्त के तत्काल लागू किया जाए. संगठन का कहना है कि महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए जनगणना और परिसीमन को शर्त बनाना उचित नहीं है. इसके लिए संविधान में संशोधन कर महिला आरक्षण को इन दोनों प्रक्रियाओं से अलग किया जाना चाहिए.
‘महिलाओं के नाम पर राजनीति बंद हो’
ALIFA का कहना है कि महिला आरक्षण महिलाओं का संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार है, न कि किसी राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का जरिया. संगठन ने आरोप लगाया कि लोकसभा सीटों के विस्तार और परिसीमन के मुद्दे को महिला आरक्षण से जोड़कर सरकार राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रही है.
संगठन ने साफ कहा कि अगर महिला आरक्षण के बहाने देश के संघीय ढांचे और संसदीय लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश हुई तो इसका देशभर के महिला और लोकतांत्रिक संगठन मिलकर विरोध करेंगे.
’40 साल का इंतजार अब खत्म होना चाहिए’
ALIFA ने कहा कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की लड़ाई नई नहीं है. 1980 के दशक से महिला आरक्षण की मांग लगातार उठती रही है. 2023 में संसद ने महिला आरक्षण कानून पास भी कर दिया, लेकिन उसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ देने के कारण अब तक लागू नहीं किया गया.
संगठन का कहना है कि महिलाओं ने बहुत लंबा इंतजार कर लिया है. अब अगले ही चुनाव से संसद और राज्य विधानसभाओं की मौजूदा सीटों पर 33 फीसदी आरक्षण लागू किया जाना चाहिए.
आरक्षण में भी सामाजिक न्याय की मांग
संगठन ने कहा कि महिला आरक्षण तभी सार्थक होगा, जब उसमें सभी वर्गों की महिलाओं को बराबर प्रतिनिधित्व मिले. इसके लिए पिछड़े वर्ग, दलित, आदिवासी और ट्रांसजेंडर समुदाय की महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत है. उनका कहना है कि आरक्षण के भीतर भी सामाजिक न्याय और समावेशी व्यवस्था होनी चाहिए.
संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी अब भी बेहद कम
ALIFA ने महिला प्रतिनिधित्व के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 2019 की लोकसभा में अब तक सबसे ज्यादा 78 महिला सांसद चुनी गई थीं, जो कुल सांसदों का सिर्फ 14.4 प्रतिशत थीं. राज्यसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी 13 से 16 प्रतिशत के बीच रही, जबकि अधिकांश राज्य विधानसभाओं में यह आंकड़ा करीब 10 प्रतिशत है.
संगठन ने कहा कि दुनिया के 185 देशों में संसद में महिलाओं की भागीदारी के मामले में भारत 151वें स्थान पर है. ऐसे में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करने वाले देश के लिए यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय है.
फेडरल ढांचे से समझौता नहीं
ALIFA का कहना है कि परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसका सीधा असर राज्यों के राजनीतिक संतुलन और संघीय व्यवस्था पर पड़ता है. इसलिए इसे सभी राज्यों और संबंधित पक्षों से व्यापक चर्चा के बाद ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए. महिला आरक्षण लागू करने के लिए परिसीमन को अनिवार्य शर्त बनाना लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ है.

संगठन ने केंद्र सरकार से मांग की है कि संसद के आगामी मानसून सत्र में आवश्यक संवैधानिक संशोधन लाकर महिला आरक्षण कानून को तुरंत लागू किया जाए. उनका कहना है कि देश की आधी आबादी को अब और इंतजार नहीं कराया जाना चाहिए.


