पटना के बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में अब सभी उम्मीदवार मैदान में उतर चुके हैं. यह सीट लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ रही है. वर्तमान उपचुनाव इसलिए हो रहा है क्योंकि नितिन नवीन ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है. उनसे पहले उनके पिता नवीन किशोर लगातार तीन बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे और हर चुनाव में उनकी जीत का अंतर बढ़ता गया. नितिन नवीन ने भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाया.
बांकीपुर को भाजपा का सबसे मजबूत शहरी गढ़ माना जाता है. यह भी धारणा रही है कि यहां कायस्थ मतदाताओं का प्रभाव सबसे अधिक है और लंबे समय से इसी सामाजिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार चुनाव जीतते रहे हैं. लेकिन इस बार परिस्थितियां कुछ अलग नजर आ रही हैं. एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में इस चुनाव में प्रशांत किशोर का पलड़ा मुझे भारी दिखाई दे रहा है.
इसके पीछे पहला कारण महागठबंधन की स्थिति है. राष्ट्रीय जनता दल ने फिर उसी महिला उम्मीदवार को मैदान में उतारा है, जो पिछला चुनाव हार चुकी थीं. इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव के सबसे निर्णायक समय में महागठबंधन के प्रमुख नेता, विदेश प्रवास पर चले गए हैं. जब किसी दल का शीर्ष नेतृत्व अपने उम्मीदवार के चुनाव प्रचार को प्राथमिकता नहीं दे रहा है तो उसका असर कार्यकर्ताओं के मनोबल और मतदाताओं के विश्वास पर पड़ना स्वाभाविक है. राजनीति केवल संगठन का ही नहीं, बल्कि मनोविज्ञान का भी खेल है.
भाजपा का प्रत्याशी चयन प्रबुद्ध मतदाताओं का अपमान जैसा है.
दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने भी उम्मीदवार चयन में जिस प्रकार का भ्रम और असमंजस दिखाया, उसने कई सवाल खड़े किए हैं. यह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा खाली की गई प्रतिष्ठित सीट है. पहले घोषित उम्मीदवार को हटाना पड़ा और फिर दूसरे उम्मीदवार को सामने लाया गया, उनको सुनने के बाद भाजपा पर आश्चर्य होता है. कहा जाता है कि सबसे ज़्यादा प्रबुद्ध मतदाता इस विधानसभा क्षेत्र में रहते हैं. ऐसे क्षेत्र से ऐसे उम्मीदवार का चयन तो उन प्रबुद्ध मतदाताओं का अपमान है. इतनी महत्वपूर्ण सीट पर इस प्रकार की स्थिति भाजपा जैसी संगठित पार्टी से अपेक्षित नहीं थी.
इसके विपरीत प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी ताकत उनकी राजनीतिक रणनीति और चुनावी प्रबंधन का लंबा अनुभव है. उन्होंने कई राज्यों में चुनावी रणनीतिकार के रूप में सफल अभियान चलाए हैं. इसलिए यह मानना कठिन है कि उन्होंने बिना गहन अध्ययन और ठोस राजनीतिक गणना के बांकीपुर जैसी सीट से स्वयं चुनाव लड़ने का निर्णय लिया होगा. यह निश्चित रूप से एक बड़ा जोखिम है, क्योंकि अब तक भाजपा यहां 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करती रही है. लेकिन बड़े राजनीतिक परिवर्तन अक्सर ऐसे ही जोखिमों से शुरू होते हैं.
ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा इस चुनाव को लेकर कुछ अधिक आत्मविश्वास में है. यह मान लेना कि केवल सामाजिक समीकरणों के आधार पर यह सीट आसानी से जीत ली जाएगी, शायद गलत साबित हो सकता है. यह सही है कि यहां कायस्थ मतदाताओं का प्रभाव है, लेकिन सिर्फ़ कायस्थ ही मतदाता भाजपा को चुनाव जीत दिलवाते हैं, ऐसा भी नहीं है. इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी रहते हैं, जिन्हें आज भी बुनियादी नागरिक सुविधाएं पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं.
प्रशांत किशोर ने व्यापक विमर्श का मुद्दा बना दिया
प्रशांत किशोर ने इस चुनाव को केवल भाजपा के उम्मीदवार के विरुद्ध नहीं, बल्कि पूरी राज्य सरकार के विरुद्ध जनमत संग्रह के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है. वे लगातार कह रहे हैं कि उनका मुकाबला किसी एक प्रत्याशी से नहीं, बल्कि सरकार से है. इस रणनीति ने चुनाव को स्थानीय मुकाबले से ऊपर उठाकर व्यापक राजनीतिक विमर्श का विषय बना दिया है.
यदि प्रशांत किशोर यह चुनाव जीतते हैं, तो उसके राजनीतिक प्रभाव केवल बांकीपुर तक सीमित नहीं रहेंगे. आगामी विधानसभा चुनाव में विपक्ष की धुरी बदल सकती है और प्रशांत किशोर एक प्रमुख विकल्प के रूप में उभर सकते हैं. इस आकलन का आधार किसी प्रकार का सर्वेक्षण नहीं है. बल्कि एक पुराने राजनीतिक कार्यकर्ता की समझ पर आधारित है.
(लेखक वरिष्ठ राजनेता हैं. पूर्व राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं. साथ ही नीतिश कुमार और लालू प्रसाद यादव के प्रमुख सहयोगी रहे हैं. यह उनके निजी विचार हैं)

