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    Home»जोहार ब्रेकिंग»झारखंड का काला सच : कोयला माफिया की सुरंगों में दफन जिंदगियां और खोता राजस्व
    जोहार ब्रेकिंग

    झारखंड का काला सच : कोयला माफिया की सुरंगों में दफन जिंदगियां और खोता राजस्व

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkJune 22, 2026No Comments6 Mins Read3
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    झारखंड
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    • हजारीबाग से रामगढ़ तक लगातार हादसे दे रहे चेतावनी, फिर भी नहीं थम रहा अवैध उत्खनन
    • बड़ा सवाल- कब टूटेगा ‘कोल माफिया’ और प्रशासनिक निष्क्रियता का गठजोड़?

    Ranchi/Hazaribagh : झारखंड देश का एक प्रमुख कोयला उत्पादक राज्य है। राज्य की अर्थव्यवस्था, औद्योगिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा में कोयले की बड़ी भूमिका है। लेकिन इसी कोयले ने झारखंड के कई इलाकों में एक समानांतर और खतरनाक अर्थव्यवस्था भी खड़ी कर दी है- अवैध खनन की अर्थव्यवस्था। हजारीबाग, रामगढ़, बोकारो और उत्तरी छोटानागपुर के कई क्षेत्रों में वर्षों से चल रहा अवैध कोयला उत्खनन अब केवल राजस्व हानि का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह मानव जीवन, पर्यावरण, कानून व्यवस्था और शासन क्षमता के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। ताजा मामला हजारीबाग जिले के बड़कागांव क्षेत्र का है, जहां बीते रविवार को कथित अवैध कोयला खदान में चाल धंसने और मलबा गिरने से एक मजदूर की मौत हो गई, जबकि दो अन्य घायल हो गए। यह हादसा राउतपारा क्षेत्र के समीप अवैध उत्खनन के दौरान हुआ। घटना के बाद शव को हटाकर मामले को दबाने की चर्चाएं भी सामने आईं। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में लंबे समय से अवैध खनन और कोयला तस्करी का संगठित नेटवर्क सक्रिय है। यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में हजारीबाग और आसपास के जिलों में अवैध खनन से जुड़ी कई दुर्घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें दर्जनों लोगों की जान जा चुकी है। इसके बावजूद अवैध खनन का कारोबार लगातार जारी है।

    नहीं थम रहा हादसों का सिलसिला

    बड़कागांव की इस हालिया घटना से कुछ ही दिन पहले बगल के रामगढ़ जिले के अरगड्डा क्षेत्र में बंद खदान के समीप अवैध सुरंग में उतरे चार युवकों की ऑक्सीजन की कमी और जहरीली गैस के कारण मौत हो गई। इससे पहले हजारीबाग के बरियातू-खावा क्षेत्र में अवैध खदान में नदी का पानी घुसने से तीन लोगों की जान चली गई थी। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन घटनाओं की प्रकृति अलग-अलग हो सकती है, जैसे कहीं चाल धंसती है, कहीं गैस से दम घुटता है, कहीं पानी भर जाता है, लेकिन मूल कारण एक ही है- असुरक्षित और अवैध खनन। कोल क्षेत्र के विशेषज्ञों के अनुसार, बिना वैज्ञानिक योजना, सुरक्षा मानकों और तकनीकी निगरानी के संचालित खदानें “टिकिंग टाइम बम” जैसी होती हैं। इनमें काम करने वाले अधिकांश मजदूर गरीब परिवारों से आते हैं और कुछ सौ रुपये की दैनिक आय के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं।

    हजारीबाग: अवैध कोयला कारोबार का नया केंद्र

    पिछले कई वर्षों की कार्रवाई और रिपोर्टे बताती हैं कि हजारीबाग विशेष रूप से बड़कागांव, गोंदलपुरा, बादम, मोहनपुर, चनारो, बुच्चाडीह, चुरचू, आंगो और केरेडारी जैसे क्षेत्रों में अवैध कोयला कारोबार लगातार चर्चा में रहा है।

    • 2021 में बड़कागांव पुलिस ने 10 अवैध खदानों पर डोजरिंग की कार्रवाई की।
    • 2022 में पुलिस ने कई जंगल क्षेत्रों में सर्च अभियान चलाया।
    • 2024 में वन विभाग ने राउतपारा जंगल से 34 टन अवैध कोयला जब्त किया।
    • 2025 में गोंदलपुरा क्षेत्र में 65 टन अवैध कोयला बरामद किया गया।
    • एक वर्ष पूर्व वन विभाग ने 32 अवैध खदानों के मुहाने बंद किए थे।
    • 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार केवल छह माह में अवैध खनन से जुड़े 50 से अधिक एफआईआर दर्ज किए गए थे।

    इन कार्रवाइयों से यह स्पष्ट है कि समस्या कोई नई नहीं है। सवाल यह है कि लगातार छापेमारी और जब्ती के बावजूद यह कारोबार समाप्त क्यों नहीं हो पा रहा?

    अवैध खनन आखिर फल-फूल क्यों रहा है?

    खनन विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं।

    • पहला, झारखंड में विशाल कोयला भंडार और उसकी लगातार मांग। ईंट भट्ठों, छोटे उद्योगों और स्थानीय बाजारों में सस्ते कोयले की मांग बनी रहती है।
    • दूसरा, बंद पड़ी या अभी तक औपचारिक खनन शुरू न हुई खदानों के आसपास सुरक्षा और निगरानी की कमी।
    • तीसरा, ग्रामीण बेरोजगारी। कई इलाकों में सीमित आय के अवसर होने के कारण स्थानीय लोग जोखिम उठाकर अवैध खनन में शामिल हो जाते हैं।
    • चौथा, संगठित परिवहन और तस्करी नेटवर्क। स्थानीय स्तर पर कोयला निकालने से लेकर डंपिंग और अन्य राज्यों तक आपूर्ति की व्यवस्था वर्षों से विकसित हो चुकी है।
    • पांचवां, कार्रवाई और पुनरावृत्ति का चक्र। खदानें सील होती हैं, लेकिन कुछ समय बाद नए स्थानों पर फिर उत्खनन शुरू हो जाता है।

    राजस्व का भारी नुकसान

    अवैध खनन केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि यह राज्य के राजस्व पर भी सीधा हमला है। खनन क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि वैध खनन शुरू होने पर राज्य सरकार को रॉयल्टी, डीएमएफटी, जीएसटी और अन्य करों के रूप में बड़ी आय होती है। अकेले गोंदलपुरा जैसी परियोजना से हर वर्ष सैकड़ों करोड़ रुपये के राजस्व की संभावना बताई जाती रही है। इसके विपरीत अवैध खनन से निकला कोयला बिना किसी कर या रॉयल्टी के बाजार तक पहुंचता है। परिणामस्वरूप राज्य को राजस्व हानि होती है, जबकि अवैध नेटवर्क आर्थिक रूप से मजबूत होता जाता है।

    पर्यावरण और वन क्षेत्र भी खतरे में

    अवैध खनन केवल जमीन के नीचे नहीं हो रहा, बल्कि इसका असर जंगलों और जल स्रोतों पर भी पड़ रहा है। कई मामलों में वन भूमि के भीतर सुरंगें बनाकर कोयला निकाला जाता है। इससे मिट्टी कटाव, भू-स्खलन, भूजल स्तर में बदलाव और जैव विविधता को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और अदालतों के समक्ष झारखंड में अवैध खनन से जुड़े कई मामले लंबित हैं। हाल ही में झारखंड हाईकोर्ट ने भी अवैध खनन को लेकर प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर टिप्पणियां की थीं।

    खनन उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ मानते हैं कि जहां कोल ब्लॉक आवंटित हो चुके हैं, वहां पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से वैध खनन शुरू होने से रोजगार, राजस्व और निगरानी- तीनों में सुधार हो सकता है। वैध परियोजनाओं में सुरक्षा मानक, पर्यावरणीय शर्तें, सामाजिक दायित्व और सरकारी निगरानी लागू होती है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल नई परियोजनाएं शुरू कर देना पर्याप्त नहीं होगा। अवैध खनन पर प्रभावी रोक के लिए कानून प्रवर्तन, स्थानीय रोजगार, तकनीकी निगरानी और जवाबदेही तंत्र को भी मजबूत करना होगा।

    झारखंड के लिए चेतावनी

    बड़कागांव, बरियातू, अरगड्डा और अन्य क्षेत्रों की घटनाएं संकेत देती हैं कि अवैध खनन अब अलग-थलग घटनाओं का मामला नहीं रहा। यह एक ऐसी संरचनात्मक समस्या बन चुकी है, जिसमें हर कुछ महीनों में किसी न किसी मजदूर की जान चली जाती है, जंगल प्रभावित होते हैं, सरकार को राजस्व नुकसान होता है और संगठित अवैध नेटवर्क मजबूत होते जाते हैं। जब तक अवैध खनन की पूरी श्रृंखला- उत्खनन, परिवहन, भंडारण और बिक्री, पर एक साथ कार्रवाई नहीं होगी, तब तक डोजरिंग, जब्ती और छापेमारी जैसी कार्रवाइयां केवल अस्थायी राहत ही दे पाएंगी। झारखंड के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अगली दुर्घटना का इंतजार किया जाएगा, या फिर इस बार अवैध खनन के खिलाफ स्थायी और व्यापक कार्रवाई की जाएगी।

    Also Read : झारखंड : आखिर जिलों के एसपी से क्यों नाराज चल रहा पुलिस मुख्यालय, जानिये पूरा मामला

    The Dark Truth of Jharkhand: Lives Buried in Coal Mafia Tunnels and Lost Revenue झारखंड झारखंड का काला सच : कोयला माफिया की सुरंगों में दफन जिंदगियां और खोता राजस्व
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