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    Home»झारखंड»जामताड़ा में सोहराय पर्व की धूम, संथाल समाज ने निभाईं सदियों पुरानी परंपराएं
    झारखंड

    जामताड़ा में सोहराय पर्व की धूम, संथाल समाज ने निभाईं सदियों पुरानी परंपराएं

    Team JoharBy Team JoharJanuary 11, 2026Updated:January 11, 2026No Comments2 Mins Read3
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    सोहराय
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    Jamtara : जामताड़ा जिले में आदिवासी संथाल समाज का प्रमुख पर्व सोहराय पूरे उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व केवल प्रकृति पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि भाई-बहन के प्रेम और सामाजिक एकता का भी प्रतीक माना जाता है। सोहराय पर्व पांच दिनों तक चलता है और मकर संक्रांति के दिन शिकार के साथ समाप्त होता है।

    धान की कटाई के बाद पौष माह में सोहराय पर्व की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। पर्व से पहले लोग अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं और खेती में इस्तेमाल होने वाले औजारों की भी पूजा करते हैं। इस दौरान महिलाएं घर की दीवारों पर पारंपरिक चित्र बनाती हैं, जिसे सोहराय कला कहा जाता है। सोहराय पर्व हर दिन अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है। पहले दिन को उम कहा जाता है, जिसमें नायकी हडाम द्वारा गोंड धान की पूजा की जाती है और बलि की परंपरा निभाई जाती है। दूसरे दिन दकाय में घर और गोहाल में चित्र बनाए जाते हैं तथा माझी हडाम द्वारा पूजा की जाती है।

    तीसरे दिन को खूनटाव कहा जाता है। इस दिन पशुओं को धान की बालियों से बनी माला पहनाई जाती है और ढोल-नगाड़ों के साथ उत्सव मनाया जाता है। चौथे दिन जाली में मछली पकड़ने और आपसी मेल-मिलाप की परंपरा होती है। वहीं, अंतिम दिन हाकोकाटम में शिकार किया जाता है और इसी के साथ मकर संक्रांति के दिन पर्व का समापन होता है। सोहराय पर्व को भाई-बहन के प्रेम का भी प्रतीक माना जाता है। परंपरा के अनुसार, भाई अपनी बहन को घर आने का निमंत्रण देता है और बहन इसे स्वीकार कर भाई के घर जाती है। मान्यता है कि इसी दिन बहन ने अपने भाई की जान बचाई थी।

    आदिवासी समाज के संथाली साहित्यकार और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित सेवानिवृत्त शिक्षक सुनील बास्की ने बताया कि सोहराय पर्व आदिवासी समाज का सबसे बड़ा पर्व है। इसमें प्रकृति और कृषि से जुड़ी सभी चीजों की पूजा की जाती है। उन्होंने बताया कि पहले यह पर्व अगहन पूर्णिमा में मनाया जाता था, लेकिन समय के साथ यह पौष माह में मनाया जाने लगा।

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