Close Menu
Johar LIVE
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Johar LIVEJohar LIVE
    • होम
    • क्राइम
    • राजनीति
    • बिजनेस
    • झारखंड
    • आदिवासी
    • बिहार
    • स्वास्थ्य
    • पर्यावरण
    • स्पेशल स्टोरी
    • खेल-सिनेमा
    • होम
    • क्राइम
    • राजनीति
    • बिजनेस
    • झारखंड
    • आदिवासी
    • बिहार
    • स्वास्थ्य
    • पर्यावरण
    • स्पेशल स्टोरी
    • खेल-सिनेमा
    Johar LIVE
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Home»जोहार ब्रेकिंग»क्या बदला इस छात्र आंदोलन से?
    जोहार ब्रेकिंग

    क्या बदला इस छात्र आंदोलन से?

    Joharlive NetworkBy Joharlive NetworkJuly 27, 2026No Comments5 Mins Read0
    Share Facebook Twitter Telegram WhatsApp Email Copy Link
    Student Protest
    Share
    Facebook Twitter Telegram WhatsApp Email Copy Link

    सत्यम श्रीवास्तव

    2 मार्च 2024 को राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा मध्य प्रदेश के सीहोर ज़िले के आष्टा से होकर गुज़र रही थी. हज़ारों लोगों की भीड़ के बीच दो छोटे-से बच्चे आगे आते हैं. उनके हाथ में कोई ज्ञापन नहीं है, कोई राजनीतिक प्रस्ताव नहीं है, कोई मांग नहीं है. उनके हाथ में है-एक छोटी-सी गुल्लक. वे अपनी गुल्लक राहुल गांधी को भेंट कर देते हैं.

    शायद उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह दृश्य भारतीय लोकतंत्र के सबसे मार्मिक दृश्यों में से एक बन जाएगा. बच्चे राजनीति नहीं समझते. वे विचारधाराएं नहीं पढ़ते. वे घोषणापत्रों का विश्लेषण नहीं करते. वे बस किसी के प्रति अपना स्नेह व्यक्त करते हैं. जिस सहजता से वे किसी क्रिकेटर, अभिनेता या शिक्षक को पसंद करते हैं, उसी सहजता से किसी नेता को भी पसंद कर सकते हैं.

    लेकिन उस समय का भारत शायद इस सहजता के लिए तैयार नहीं था. मानो एक अलिखित फ़रमान जारी हो चुका था कि इस देश में सार्वजनिक रूप से राजनीतिक अनुराग की भी एक स्वीकृत दिशा है. नरेंद्र मोदी के प्रति प्रशंसा सामान्य मानी जाएगी लेकिन किसी दूसरे नेता के प्रति वही भाव अचानक राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर लेगा.

    यही वजह थी कि आष्टा के उन दो बच्चों की गुल्लक केवल गुल्लक नहीं रह गई. वह राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गई. उसके बाद घटनाएं जिस दिशा में बढ़ीं, वे बेहद दुखद थीं. परिवार पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई हुई. स्थानीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप चले. फिर दिसंबर 2024 में उन बच्चों ने अपने माता-पिता-मनोज परमार और नेहा परमार को खो दिया.

    उस त्रासदी के कारणों पर अलग-अलग दावे हैं और उनका अंतिम निर्णय इतिहास तथा न्यायिक प्रक्रिया का विषय है. लेकिन उस घटना ने एक ऐसा प्रश्न हमारे सामने छोड़ दिया जिसे कोई न्यायालय अकेले हल नहीं कर सकता. क्या किसी लोकतंत्र में बच्चों की मासूम राजनीतिक पसंद भी भय का कारण बन सकती है?

    साहित्य हमें सिखाता है कि कोई आत्महत्या केवल एक निजी घटना नहीं होती. हर असामान्य मृत्यु अपने समय की भी गवाही देती है. वह अपने पीछे कुछ ऐसे प्रश्न छोड़ जाती है जिनका उत्तर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में नहीं मिलता.

    मुझे उस घटना में सबसे अधिक बेचैन करने वाली बात यह नहीं लगी थी कि बच्चों ने राहुल गांधी को अपनी गुल्लक दी. मुझे बेचैन यह बात करती रही कि दो बच्चों का सहज अनुराग भी एक राजनीतिक घटना बन गया.

    असर सवाल यह नहीं है कि बच्चे अपनी गुल्लक किसे दें. असल सवाल यह है कि क्या वे बिना भय के अपनी गुल्लक किसी को भी दे सकते हैं. लोकतंत्र की शुरुआत शायद यहीं से होती है.

    यहीं से इस छात्र आंदोलन का महत्व शुरू होता है. बहुत लोग इसकी सफलता सीटों, चुनावों या सरकारों से मापेंगे. मैं इसे वहां नहीं मापता. मैं इसे इस बात से मापता हूं कि आज देश के विश्वविद्यालयों में जेन-ज़ी के छात्र बिना किसी झिझक के राहुल गांधी के समर्थन में नारे लगा रहे हैं. उतनी ही खुलकर दूसरे छात्र उनके विरोध में भी बोल रहे हैं. वे अपनी राजनीतिक पसंद को छिपाकर नहीं, सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर रहे हैं.

    यह परिवर्तन छोटा नहीं है. लोकतंत्र में भय हमेशा जेलों से पैदा नहीं होता. कई बार वह वातावरण से पैदा होता है. धीरे-धीरे लोग बोलना बंद कर देते हैं. फिर वे केवल वही कहना शुरू करते हैं जो सुरक्षित हो. उसके बाद वे केवल उसी को पसंद करना शुरू कर देते हैं जिसे पसंद करना सुरक्षित समझा जाए.

    सबसे ख़तरनाक समय वह नहीं होता जब किसी एक नेता को सबसे अधिक वोट मिल रहे हों. सबसे ख़तरनाक समय वह होता है जब समाज यह मानने लगे कि बच्चों को भी उसी नेता से प्रेम करना चाहिए. ऐसे समय में असहमति केवल राजनीतिक नहीं रह जाती; वह सामाजिक जोखिम बन जाती है.

    मुझे लगता है कि इस छात्र आंदोलन ने सबसे पहले इसी मनोवैज्ञानिक व्यवस्था को तोड़ा है. उसने राहुल गांधी को पसंद करना अनिवार्य नहीं बनाया. उसने राहुल गांधी को पसंद करना संभव बनाया. यह दोनों बातें अलग-अलग हैं.

    लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि सब राहुल गांधी को पसंद करें. लोकतंत्र का अर्थ यह भी नहीं कि सब नरेंद्र मोदी को पसंद करें. लोकतंत्र का अर्थ केवल इतना है कि एक बच्चा अपनी गुल्लक, एक छात्र अपनी आवाज़ और एक नागरिक अपना मत, बिना भय के, अपनी इच्छा से, किसी को भी दे सके.

    अगर इस आंदोलन ने युवाओं के भीतर यह विश्वास लौटाया है कि वे बिना डरे अपनी राजनीतिक पसंद व्यक्त कर सकते हैं, तो मेरे लिए यह उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है. सरकारें बदलना इतिहास की घटना है. लेकिन भय का टूटना सभ्यता की घटना.

    (यह लेखक के निजी विचार हैं. लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, पर्यावरण सहित अन्य मुद्दों पर लिखते रहते हैं. वर्तमान में भोपाल में निवास करते हैं.)

    Also Read : राहुल गांधी का अमित शाह से सवालः छात्रों पर ‘गोली’ चलाने का आदेश किसने दिया?

    सत्यम श्रीवास्तव
    Follow on Facebook Follow on X (Twitter) Follow on Instagram Follow on YouTube Follow on WhatsApp Follow on Telegram
    Share. Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Telegram WhatsApp Email Copy Link
    Previous Articleआपकी EMI बढ़ेगी या घटेगी? RBI की ब्याज दर को लेकर आया बड़ा अनुमान

    Related Posts

    जोहार ब्रेकिंग

    आपकी EMI बढ़ेगी या घटेगी? RBI की ब्याज दर को लेकर आया बड़ा अनुमान

    July 27, 2026
    जोहार ब्रेकिंग

    1939 से आज तक… कैसे भारत की सबसे बड़ी सुरक्षा ढाल बनी सीआरपीएफ

    July 27, 2026
    जोहार ब्रेकिंग

    LGBTQ समाज का हिस्सा, उन्हें सम्मान और समान स्थान मिलना चाहिए: मोहन भागवत

    July 27, 2026
    क्राइम

    झारखंड: JPSC घोटाला, ट्रांसफर होने के बावजूद श्वेता कुमारी करती थी परीक्षा नियंत्रक का काम

    July 27, 2026
    जोहार ब्रेकिंग

    कोकरॉच जनता पार्टी के बाद दिखा E20 जनता पार्टी, मांगा 100 प्रतिशत पेट्रोल

    July 26, 2026
    जोहार ब्रेकिंग

    खस्सी कप से डूरंड कप तक… झारखंड की फुटबॉल संस्कृति की अनोखी कहानी

    July 26, 2026
    Latest Posts

    क्या बदला इस छात्र आंदोलन से?

    July 27, 2026

    आपकी EMI बढ़ेगी या घटेगी? RBI की ब्याज दर को लेकर आया बड़ा अनुमान

    July 27, 2026

    1939 से आज तक… कैसे भारत की सबसे बड़ी सुरक्षा ढाल बनी सीआरपीएफ

    July 27, 2026

    LGBTQ समाज का हिस्सा, उन्हें सम्मान और समान स्थान मिलना चाहिए: मोहन भागवत

    July 27, 2026

    झारखंड: JPSC घोटाला, ट्रांसफर होने के बावजूद श्वेता कुमारी करती थी परीक्षा नियंत्रक का काम

    July 27, 2026
    Facebook X (Twitter) Instagram
    © 2026 Johar LIVE. | About Us | AdSense Policy | Privacy Policy | Terms and Conditions | Contact Us

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.