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    Home»जोहार ब्रेकिंग»World Hepatitis Day 2026: क्या है हेपेटाइटिस, क्यों कहा जाता है साइलेंट किलर और कैसे करें बचाव
    जोहार ब्रेकिंग

    World Hepatitis Day 2026: क्या है हेपेटाइटिस, क्यों कहा जाता है साइलेंट किलर और कैसे करें बचाव

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyJuly 28, 2026No Comments8 Mins Read1
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    विश्व हेपेटाइटिस दिवस
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    “अगर मैं आपसे कहूं कि दुनिया में हर 30 सेकेंड में एक व्यक्ति हेपेटाइटिस से जुड़ी बीमारी के कारण अपनी जान गंवा देता है, तो शायद यह आंकड़ा आपको चौंका दे. लेकिन यही हकीकत है.”

    हर साल 28 जुलाई को विश्व हेपेटाइटिस दिवस मनाया जाता है. इसका उद्देश्य लोगों को हेपेटाइटिस के प्रति जागरूक करना, समय पर जांच के लिए प्रेरित करना और इस बीमारी से होने वाली मौतों को कम करना है. यह दिन नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ. बारूक ब्लमबर्ग की जयंती पर मनाया जाता है. उन्होंने हेपेटाइटिस बी वायरस की खोज की और इसकी वैक्सीन विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया में करोड़ों लोग हेपेटाइटिस बी और सी से संक्रमित हैं, लेकिन उनमें से बड़ी संख्या को यह तक नहीं पता कि वे इस बीमारी से पीड़ित हैं. यही वजह है कि हेपेटाइटिस को अक्सर ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है.

    WHO के आंकड़े बताते हैं बीमारी की गंभीरता

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के World Hepatitis Day 2026 अभियान के अनुसार, वर्ष 2024 में दुनिया भर में 28.7 करोड़ (287 मिलियन) लोग क्रॉनिक हेपेटाइटिस बी या सी के साथ जीवन जी रहे थे. चिंता की बात यह भी है कि सिर्फ 45 प्रतिशत नवजात शिशुओं को जन्म के 24 घंटे के भीतर हेपेटाइटिस-बी का टीका मिल पाया, जबकि यही टीका मां से बच्चे में संक्रमण रोकने का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है. वहीं, वर्ष 2024 में हेपेटाइटिस बी और सी से जुड़ी जटिलताओं के कारण 13 लाख (1.3 मिलियन) लोगों की मौत हुई. ये आंकड़े बताते हैं कि समय पर जांच, टीकाकरण और इलाज की सुविधा बढ़ाना आज भी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती है.

    आखिर क्या है हेपेटाइटिस?

    हेपेटाइटिस एक ऐसी बीमारी है, जिसमें लिवर में सूजन आ जाती है. इसके पीछे वायरस, अत्यधिक शराब का सेवन, कुछ दवाएं, जहरीले रसायन या ऑटोइम्यून बीमारियां जिम्मेदार हो सकती हैं. हालांकि, सबसे अधिक चिंता वायरल हेपेटाइटिस की होती है.

    हेपेटाइटिस A : दूषित भोजन और पानी के जरिए फैलता है.

    हेपेटाइटिस B : संक्रमित खून, असुरक्षित यौन संबंध और संक्रमित मां से नवजात शिशु में फैल सकता है.

    हेपेटाइटिस C : संक्रमित खून के संपर्क से फैलता है.

    हेपेटाइटिस D : केवल उन लोगों में होता है, जो पहले से हेपेटाइटिस बी से संक्रमित होते हैं.

    हेपेटाइटिस E : दूषित पानी के कारण फैलता है और गर्भवती महिलाओं के लिए अधिक खतरनाक माना जाता है.

    क्यों कहा जाता है ‘साइलेंट किलर’?

    हेपेटाइटिस को ‘साइलेंट किलर’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके शुरुआती चरण में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते. कई लोग वर्षों तक सामान्य जीवन जीते रहते हैं, जबकि इस दौरान वायरस धीरे-धीरे उनके लिवर को नुकसान पहुंचाता रहता है. जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक कई मामलों में लिवर गंभीर रूप से प्रभावित हो चुका होता है.

    बीमारी बढ़ने पर लगातार थकान, भूख कम लगना, मतली या उल्टी, पेट में दर्द, आंखों और त्वचा का पीला पड़ जाना यानी पीलिया, पेशाब का गहरा रंग होना और तेजी से वजन घटना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. यदि समय रहते जांच और इलाज न कराया जाए, तो हेपेटाइटिस आगे चलकर लिवर सिरोसिस, लिवर फेलियर और लिवर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का कारण बन सकता है.

    भारत में कितनी गंभीर है स्थिति?

    भारत उन देशों में शामिल है, जहां हेपेटाइटिस का बोझ काफी अधिक है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, देश में लाखों लोग हेपेटाइटिस बी और सी से संक्रमित हैं. इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जिन्हें अपने संक्रमण की जानकारी तक नहीं होती.

    ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी, समय पर जांच न होना, असुरक्षित इंजेक्शन का इस्तेमाल, बिना जांच के रक्त चढ़ाना और संक्रमण नियंत्रण के नियमों का सही तरीके से पालन न होना इस समस्या को और गंभीर बना देता है.

    सरकार ने राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम (NVHCP) के तहत मुफ्त जांच और इलाज की सुविधा शुरू की है, लेकिन अब भी देश की बड़ी आबादी तक इन सेवाओं की प्रभावी पहुंच सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है.

    झारखंड में क्या है स्थिति?

    विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने झारखंड में भी हेपेटाइटिस को लेकर चिंता जताई है. उनका कहना है कि राज्य के ग्रामीण इलाकों में स्क्रीनिंग की सुविधा होने के बावजूद जागरूकता की कमी के कारण बड़ी संख्या में मरीजों की समय पर पहचान नहीं हो पाती. यही वजह है कि वर्ष 2030 तक देश से हेपेटाइटिस-सी के उन्मूलन के लक्ष्य को हासिल करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है.

    स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल द्वारा इस वर्ष मार्च में राज्यसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में पिछले पांच वित्तीय वर्षों के दौरान हेपेटाइटिस-बी से 41 लोगों की मौत हुई है. इनमें वर्ष 2020-21 में सबसे अधिक 15 मौतें दर्ज की गईं. इसके अलावा 2019-20 और 2023-24 में दो-दो, 2021-22 में सात, 2022-23 में 11 तथा 2024-25 में दिसंबर 2024 तक चार मौतें दर्ज की गईं.

    विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, क्योंकि दूरदराज के इलाकों में कई मरीजों की न तो समय पर जांच हो पाती है और न ही उनकी रिपोर्टिंग हो पाती है.

    झारखंड में राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम (NVHCP) की पूर्व नोडल अधिकारी डॉ. उमा सिन्हा का कहना है कि राज्य के सभी जिलों में इलाज की सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में लोग बीमारी के लक्षणों और इसकी गंभीरता से अनजान रहते हैं. उन्होंने कहा कि कम स्क्रीनिंग के कारण संक्रमण की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ पाती.

    डॉ. उमा सिन्हा के अनुसार, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में कई बार जन्म के 24 घंटे के भीतर लगाई जाने वाली हेपेटाइटिस-बी की ‘जीरो डोज’ वैक्सीन उपलब्ध नहीं होती. यह भी संक्रमण रोकने की दिशा में एक बड़ी चुनौती है.

    उन्होंने बताया कि झारखंड में वर्तमान में 27 उपचार केंद्र संचालित हैं. अकेले रांची के RIMS में ही हेपेटाइटिस-बी के लगभग 3,000 और हेपेटाइटिस-सी के करीब 500 मरीजों का इलाज चल रहा है.

    वहीं, RIMS के मेडिसिन विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रश्मि सिन्हा के अनुसार, हाल के वर्षों में अस्पताल में हेपेटाइटिस-बी के मरीजों की संख्या बढ़ी है. हालांकि शहरी स्वास्थ्य केंद्रों में स्क्रीनिंग बेहतर होने से मरीजों की समय पर पहचान भी पहले की तुलना में अधिक हो रही है.

    किन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा?

    हेपेटाइटिस किसी भी व्यक्ति को हो सकता है, लेकिन कुछ लोगों में इसका खतरा सामान्य लोगों की तुलना में अधिक होता है. इनमें बार-बार रक्त चढ़ाने वाले मरीज, डायलिसिस कराने वाले लोग, डॉक्टर, नर्स और अन्य स्वास्थ्यकर्मी, संक्रमित व्यक्ति के परिवार के सदस्य, असुरक्षित यौन संबंध बनाने वाले लोग तथा संक्रमित सुई या सिरिंज का इस्तेमाल करने वाले लोग शामिल हैं. यदि गर्भवती महिला हेपेटाइटिस-बी से संक्रमित है, तो जन्म के समय यह संक्रमण बच्चे तक भी पहुंच सकता है.

    बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय

    हेपेटाइटिस से बचाव संभव है, खासकर हेपेटाइटिस-बी से. इसके लिए सुरक्षित और प्रभावी वैक्सीन उपलब्ध है. जन्म के 24 घंटे के भीतर नवजात को हेपेटाइटिस-बी का पहला टीका लगाना बेहद जरूरी माना जाता है. इसके अलावा स्वच्छ भोजन और सुरक्षित पेयजल का उपयोग, नई डिस्पोजेबल सिरिंज का इस्तेमाल, जांचा हुआ रक्त चढ़ाना, व्यक्तिगत वस्तुएं साझा न करना, सुरक्षित यौन संबंध अपनाना और समय-समय पर जांच कराना संक्रमण से बचाव के प्रभावी उपाय हैं.

    इलाज भी है संभव

    हेपेटाइटिस A और E के अधिकांश मरीज उचित इलाज और देखभाल से ठीक हो जाते हैं. हेपेटाइटिस-बी को दवाओं की मदद से लंबे समय तक नियंत्रित रखा जा सकता है, जबकि आधुनिक एंटीवायरल दवाओं से हेपेटाइटिस-सी का इलाज अधिकांश मामलों में सफलतापूर्वक संभव है, यदि बीमारी का समय पर पता चल जाए.

    क्या है विश्व हेपेटाइटिस दिवस 2026 की थीम?

    इस वर्ष विश्व हेपेटाइटिस दिवस 2026 की थीम है “Hepatitis: Let’s Break It Down”. इसका संदेश है कि हेपेटाइटिस से जुड़ी हर बाधा, चाहे वह जागरूकता की कमी हो, जांच में देरी हो या इलाज तक पहुंच की समस्या, उसे मिलकर दूर करना होगा.

    हेपेटाइटिस केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती है. इसके खिलाफ लड़ाई तभी जीती जा सकती है, जब सरकार, स्वास्थ्य संस्थान और आम लोग मिलकर समय पर जांच, टीकाकरण और इलाज को प्राथमिकता दें.

    अगर आपको लंबे समय से थकान, पीलिया या लिवर से जुड़ी कोई समस्या महसूस हो रही है, तो इसे नजरअंदाज न करें. तुरंत डॉक्टर से सलाह लें और जरूरत पड़ने पर हेपेटाइटिस की जांच कराएं.

    याद रखिए, समय पर जांच, सही इलाज और टीकाकरण ही हेपेटाइटिस से बचाव का सबसे मजबूत हथियार है. विश्व हेपेटाइटिस दिवस केवल एक दिन नहीं, बल्कि लाखों जिंदगियां बचाने का एक संकल्प है.

     

    Also Read : जेपीएससी घोटाला: पूर्व अध्यक्ष एल. ख्यांग्ते को 28 जुलाई को पूछताछ के लिए सीआईडी का समन

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