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    Home»जोहार ब्रेकिंग»ओपिनियन : जनता के सवालों का जवाब दें मोदी, भाषणों से नहीं चलेगा काम : शिवानंद तिवारी
    जोहार ब्रेकिंग

    ओपिनियन : जनता के सवालों का जवाब दें मोदी, भाषणों से नहीं चलेगा काम : शिवानंद तिवारी

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkOctober 23, 2026No Comments5 Mins Read2
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    प्रधानमंत्री जी, जनता के सवालों का जवाब दीजिए. प्रधानमंत्री जी कांग्रेस और राहुल गांधी पर जमकर हमला कर रहे हैं. लेकिन सच्चाई तो यह है कि पूरे देश में नौजवानों का जो क्रोध दिखाई दे रहा है, जगह-जगह जो असंतोष उभर रहा है, उससे प्रधानमंत्री जी विचलित हैं. पहली बार उन्होंने इस मसले पर अपना मुँह खोला है, लेकिन यह नहीं बताया कि चुनाव आयोग पर लग रहे आरोप सही हैं या गलत.

    इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में मतदाता सूची से तेरह करोड़ लोगों के नाम हटाए जाने का मामला सामने आया है. इससे बड़ा सवाल लोकतंत्र में क्या हो सकता है? वोट देना प्रत्येक नागरिक का बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार है. अगर इतने बड़े पैमाने पर लोगों के नाम हटाए गए हैं, प्रधानमंत्री जी इस पर चुप क्यों हैं?

    सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक समिति की व्यवस्था की थी, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शामिल थे. लेकिन मोदी जी की सरकार ने उसको बदलकर मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया. अब समिति में प्रधानमंत्री, उनके द्वारा चुना गया एक मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल हैं. आखिर ऐसा क्यों किया गया? इसके बाद चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक काम के लिए कानूनी कार्रवाई से आजीवन संरक्षण देने की व्यवस्था भी कर दी गई. पहले कभी आयोग के सदस्यों को इस तरह की सुरक्षा की जरूरत क्यों नहीं महसूस हुई? क्या यह सब इसलिए किया गया कि चुनाव आयोग सरकार के मनमुताबिक निडर होकर काम कर सके? इन सवालों का जवाब प्रधानमंत्री जी को देश के सामने देना चाहिए था जो उन्होंने नहीं दिया.

    प्रधानमंत्री जी को यह भी बताना चाहिए कि देश की हालत इतनी खराब क्यों है. महँगाई बढ़ रही है, बेरोजगारी बढ़ रही है और नौजवानों के सामने भविष्य का सवाल खड़ा है. पढ़ाई का इंतजाम ऐसा है कि गरीब आदमी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दिला सकता. इलाज इतना महँगा हो गया है कि परिवार में कोई बीमार पड़ जाए तो पूरा परिवार कर्ज के बोझ तले दब जाता है. दवाइयों के दाम आसमान छू रहे हैं और उनके कारोबार में कितना मुनाफा हो रहा है, इसका कोई हिसाब नहीं दिखाई दे रहा है. बाजार में खाने-पीने की चीजों की शुद्धता की गारंटी नहीं है. यहाँ तक कि सजावट के सामान से लेकर गणेश जी की मूर्तियों तक के लिए हम चीन पर निर्भर हैं.आखिर देश में उत्पादन और रोजगार बढ़ाने के आपके दावों का क्या हुआ?

    देश में जो असंतोष दिखाई दे रहा है, उसके पीछे ये सारे सवाल हैं. प्रधानमंत्री जी अगर सोचते हैं कि राहुल गांधी पर आरोप लगाकर नौजवानों के इस आक्रोश को ठंडा कर देंगे, तो यह उनकी ग़लतफ़हमी है. लोगों को अपने सवालों का जवाब चाहिए, केवल भाषण नहीं.

    प्रधानमंत्री जी, आप इतने वर्षों से जनता को अपने मन की बातें सुना रहे हैं. कभी जनता के मन की बात सुनने की ज़हमत आपने उठाई है?कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस करके पत्रकारों के सीधे सवालों का सामना आपने नहीं किया. क्यों ? मनमोहन सिंह जी जिनको आप मौनी बाबा कहते थे उन्होंने दस साल के अपने कार्यकाल में 117 मर्तबा प्रेस कान्फ्रेंस किया था.

    अगर जनता के मन की बातों को आपने कभी सुना होता तो यह नौबत ही नहीं आती. लोकतंत्र में संवाद एकतरफा नहीं होता. जनता की ओर से प्रेस वाले प्रधानमंत्री से सवाल पूछते है और प्रधानमंत्री को उसका जवाब देना पड़ता है. दुनिया भर की लोकतांत्रिक व्यवस्था में यही परंपरा है.

    आज लोगों के मन में यह आशंका पैदा हो रही है कि मतदाताओं को उनके अधिकार से वंचित करके सत्ता पर स्थायी पकड़ बनाने की आप के द्वारा कोशिश हो रही है. कुछ गिने-चुने पूँजीपतियों के हाथों में देश की संपत्ति और संसाधनों का बढ़ता केंद्रीकरण भी चिंता का विषय है. प्रधानमंत्री जी को बताना चाहिए कि सरकार आम लोगों के हित में क्या कर रही है.

    आपको याद रखना चाहिए कि इस देश में अब तक कई सरकारें बदली हैं. लोकतंत्र में सरकारें बदलना कोई असामान्य बात नहीं है. जनता अपने अनुभवों के आधार पर फैसला करती है. सत्ता किसी की निजी जागीर नहीं है. प्रधानमंत्री जी को अपने काम का हिसाब देना होगा. केवल भाषणों और विपक्ष पर हमलों से जनता के सवाल खत्म नहीं होंगे.

    आज देश के नौजवान जागरूक हैं. वे अपने मताधिकार और भविष्य की सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उस संघर्ष को आप अमानुषिक बल प्रयोग द्वारा कुचलने का प्रयास कर रहे हैं. लेकिन आपकी मनसा पूरी होती दिखाई नहीं दे रही है. लोकतंत्र बचाने के इस संघर्ष में जिस प्रकार लड़कियां अगले मोर्चा पर दिखाई दे रहीं हैं वह अभूतपूर्व है! इस संघर्ष को आप दमन से नहीं दबा सकते हैं.

    याद कीजिए देश में इमरजेंसी लगी हुई थी. इंदिरा जी ने देश में लोकसभा का चुनाव करवाया था. उस वक्त मैं जेल में मीसा के तहत नज़रबंद था. लेकिन चुनाव की निष्पक्षता का यही प्रमाण है कि इंदिरा जी स्वयं चुनाव हार गईं. उस चुनाव की निष्पक्षता का सबसे बड़ा प्रमाण यही है. इंदिरा जी ने बग़ैर ना-नुकर किए सत्ता मुरार जी भाई को सौंप दिया. प्रधानमंत्री जी याद रखिए !सरकार जनता के लिए होती है, जनता सरकार के लिए नहीं. सत्ता का अंतिम फैसला जनता करती है और जनता के फैसले का सम्मान करना ही लोकतंत्र है. आप इसे पलटने का प्रयास मत कीजिए !!

    (लेखक वरिष्ठ राजनेता हैं. पूर्व राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं. साथ ही नीतिश कुमार और लालू प्रसाद यादव के प्रमुख सहयोगी रहे हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

    Also Read : Opinion : जंतर-मंतर के आंदोलन में नेहा बोरा का तेवर नई राजनीतिक संभावना का संकेत : शिवानंद तिवारी

    प्रधानमंत्री मोदी जी राजनीति राहुल गांधी
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