Ranchi : आदिवासियत की पहचान, संस्कृति और अधिकारों को लेकर सोमवार को रांची के पुराना विधानसभा सभागार में राज्यभर के कई आदिवासी और झारखंडी संगठनों के प्रतिनिधि एक मंच पर जुटे. “आदिवासियत संरक्षण संवाद” के नाम से आयोजित इस बैठक में वक्ताओं ने दावा किया कि आदिवासी समाज की स्वतंत्र पहचान पर लगातार हमले हो रहे हैं. कार्यक्रम के अंत में साझा घोषणा की गई कि इन मुद्दों के खिलाफ गांव से लेकर राजधानी तक लंबा जनअभियान चलाया जाएगा. साथ ही अक्टूबर-नवंबर में रांची में “आदिवासियत बचाओ महारैली” आयोजित करने का भी फैसला लिया गया. बैठक में झारखंड जनाधिकार महासभा, आदिवासी अधिकार मंच, गांव गणराज्य परिषद, आदिवासी संघर्ष मोर्चा, आदिवासी समन्वय समिति, संयुक्त ग्राम सभा, विस्थापित मुक्ति वाहिनी, जोहार, झारखंड क्षेत्रीय पड़हा समिति और आदिवासी बचाओ मोर्चा समेत कई संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे.
‘आदिवासी पहचान खत्म करने की कोशिश हो रही है’
संवाद की शुरुआत एक आधार पत्र के पाठ से हुई. इसके बाद वक्ताओं ने कहा कि हाल के वर्षों में आदिवासी समाज की अलग सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को कमजोर करने की कोशिशें तेज हुई हैं. उन्होंने कहा कि आदिवासियों को “वनवासी” कहकर उनकी अलग पहचान को नकारा जा रहा है. साथ ही सरना धर्म को अलग धार्मिक मान्यता और जनगणना में अलग धार्मिक कोड देने की लंबे समय से चली आ रही मांग की अनदेखी की जा रही है. वक्ताओं ने आरोप लगाया कि RSS यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े कुछ संगठन आदिवासी समाज की स्वतंत्र पहचान को खत्म करने की दिशा में काम कर रहे हैं. उनका कहना था कि आदिवासी समाज को हिंदू वर्ण व्यवस्था के दायरे में समेटने की कोशिश की जा रही है. कई प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों के उदाहरण देते हुए कहा कि पारंपरिक आदिवासी धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों का स्वरूप बदलने की घटनाएं भी सामने आई हैं. बैठक में यह भी कहा गया कि “सरना-सनातन एक” जैसे नारों के जरिए आदिवासी समाज की अलग धार्मिक पहचान को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है. वक्ताओं ने ईसाई आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति सूची से बाहर करने की मांग का भी विरोध किया और इसे आदिवासी समाज की एकता तोड़ने की कोशिश बताया.
गांव से राजधानी तक चलेगा अभियान
वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी दर्शन जल, जंगल और जमीन से गहरे जुड़ाव, सामूहिकता, बराबरी, स्वतंत्रता और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की सोच पर आधारित है. उनका कहना था कि इन मूल्यों की रक्षा के लिए समाज के सभी जनपक्षीय लोगों को एकजुट होना होगा. बैठक के अंत में निर्णय लिया गया कि आने वाले दिनों में प्रमंडल और जिला स्तर पर सम्मेलन आयोजित किए जाएंगे. इसके बाद रांची में अक्टूबर-नवंबर के दौरान “आदिवासियत बचाओ महारैली” निकाली जाएगी. इसके जरिए आदिवासी पहचान, संस्कृति और अधिकारों से जुड़े मुद्दों को व्यापक स्तर पर उठाया जाएगा.
कार्यक्रम में बहादुर उरांव, बिंदु सोरेन, बहा लिंडा, चंद्र प्रभात मुंडा, दयामनी बरला, देवकी नंदन बेदिया, दामु मुंडा, ज्योति कुजूर, कुमार चंद्र मार्डी, प्रकाश पूर्ति, प्रकाश टोप्पो, रजनी मुर्मू, रेनू उरांव, रोज खाखा, सिद्धेश्वर सरदार, सुशीला बोदरा, सुषमा बिरूली और श्यामल मार्डी समेत कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे. कार्यक्रम का संचालन बासींग हस्सा, डेमका सोय, एलिना होरो, रमेश जेराई, सुखनाथ लोहरा और साधु हो ने किया.
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